Friday, October 14, 2011
मैं नारी हूं या महज स्तनों का एक जोड़ा..
Tuesday, October 4, 2011
एक लम्हा !
और उन में भी वही एक लम्हा
जिसमे दो बोलती आँखें
चाय की प्याली से जब उठे
तो दिल में डूबें
डूब के दिल में कहें
आज तुम कुछ न कहो
आज मैं कुछ न कहूँ
बस युहीं बैठे रहो
हाथ में हाथ लिए
गम की सौगात लिए..
गर्मी-ए जज़्बात लिए..
कौन जाने कि इस लम्हे में
दूर परबत पे कहीं
बर्फ पिघलने ही लगे....
ब्लॉग कानपुर मासिक पत्रिका से साभार.....
तू मचलता क्यों नहीं ?
तू उछलता क्यों नहीं .
साहिलों को तोड़ के बाहर निकलता क्यों नहीं
तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं
तेरे साहिल पर सितम की बस्तियाँ आबाद हैं,
शहर के मेमार’ सारे खानमाँ-बरबाद’ हैं
ऐसी काली बस्तियों को तू निगलता क्यों नहीं
तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं
तुझ में लहरें हैं न मौज न शोर..
जुल्म से बेजार दुनिया देखती है तेरी ओर
तू उबलता क्यों नहीं
तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं
ऐ थके हारे समंदर
तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं
ब्लॉग कानपुर मासिक पत्रिका से साभार.....
ये रिश्ता क्या कहलाता है ?
रिश्तो की डोर रिश्तो से है कमज़ोर
रिश्ते ही थामे है जीवन की बागडोर
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है
कभी अपनों को सहलाता कभी है बहलाता
...कभी हाथ मिलाकर कभी गले लगाकर
कभी हस कर तो कभी रो कर
रिश्ते अपनों की याद दिलाते
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है ...
फिर क्यों रिश्ते टूटते जाते है
रिश्ते क्यों बदनाम होते जाते है ..
कभी गुरु का शिष्य से कभी पिता का पुत्री से
कभी भगवान का भक्त से कभी इन्सान का इन्सान से
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है ? ...
ब्लॉग कानपुर मासिक पत्रिका से साभार.....
ख़लील ज़िब्रान की एक कविता का अंश !
सिर्फ आपके बच्चे नहीं।
आपके जरिये वे इस धरती पर
आये जरूर हैं
पर पूरे के पूरे आपके नहीं।
आप उन्हें प्यार दे सकते हैं
पर उनके विचारों को
नियंत्रित नहीं कर सकते
उनके रक्त-मांस के शरीर को
पाल-पोसकर इत्ते-से इत्ता बना सकते हैं
पर उनकी आत्मा को बांध नहीं सकते।
इसलिए उन्हें अपने सांचे में
ढालने की कोशिश कभी न करें;
बल्कि चाहें तो कोशिश करें
खुद उनकी तरह बनने की।
माँ तुम में सब कुछ है ॥
आज उसी मां को देखते है सरे राह तडपते हुए
रोती थी वो बिलखती थी वो सारी रात
पर पहले नहीं थे उसके ऐसे हालात
अपनी इज्ज़त अपने घर में ही तो है ऐसा कहते थे वो
लेकिन अपनी माँ को नीलाम घर पर ही तो करते थे वो
इन चंद नेताओ ने कर दिया अपनी माँ का सौदा
क्या कभी कोई बेटा करता था ऐसा
इन मतलबी लोगों ने कर दिया अपनी माँ को नीलाम
क्या उस माँ ने पाला था ऐसा अरमान
जो देती थी भूखे पेट को भरी हुई थाली
आज उसी माँ को देते है वो गाली
कभी रोते हुए बेटो को दिया करती थी अपनी अंचल का छाव
आज वही दिया करते उस छाती पर तरह तरह के घाव
गर्मी की तेज़ धुप हो जाड़े की सर्द राते
आज लगती है उनको बेमानी वो राते
क्योंकि उनको मिला किसी और का साथ
इसलिए ही तो छोड़ दिया अपनी माँ का साथ......
ब्लॉग कानपुर मासिक पत्रिका से साभार.....
आखिर क्यों .....?
आखिर क्यों सभी चिल्लाते है पोस्टर लगाते है कहते है " सेव द गर्ल चाइल्ड " आखिर क्यों क्या इसलिए की लड़की कभी माँ बन कर कभी बहन बन कर और कभी पत्नी बन कर इन इंसानों के अत्याचारों को सहे... क्या इसलिए की आज का इन्सान अकेला पा कर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ता है न उम्र देखता है न सम्बन्ध सिर्फ इस लिए की मैं एक लड़की हु.... इस समाज में लड़की होना एक जुर्म हो गया है ..विधायक हो या पुलिस शिक्षक हो या पिता क्या सभी के मस्तिष्क में एक ही विचार है .....क्या करुँगी मैं इस दुनिया में आकार जब मैं पहले से ही देखती हु अरुशी को दिव्या शीलू और कविता के रूप में अपने आप को , और न जाने कितनी वो जो अखबारों की सुर्खिया न बन पाई ...आखिर क्योँ आऊँ और मैं इस दुनिया में क्या इसलिए की माँ बन कर बच्चो का पालन करू और बच्चे बड़े हो कर मुझे ही सड़क पर छोड़ दे तडपने के लिए ... क्या इसलिए की बहन बन कर भाई का प्यार बनू और वही भाई पैसो के खातिर मुझे ही बेच दे ... क्या इसलिए की एक बेटी बन कर आऊं वही पिता अपनी ही बेटी को हवस का शिकार बना डाले आखिर क्यों आऊँ । आखिर क्यों आऊँ मैं इस दुनिया में जब मैं अन्दर से ही सुनती हु और देखती हु अपनी माँ को दादी के ताने देते हुए की गर लड़की हुई तो घर से बाहर कर दूंगी और पापा भी लड़की होने के पीछे भी माँ को ही दोष देते है और पंडित से भी तो मेरे न आने के लिए ही उपाय किये जाते है , और देवी मंदिरों में जा कर लोग लड़का ही तो मांगते है लेकिन शायद वो उस समय ये भूल जाते है की वो देवी भी एक लड़की का स्वरूप है .... 21 शदी में भी आने के बाद क्या आज भी लड़की एक अभिशाप है क्या सब कुछ बदल रहा है पर इन्सान की सोच लडकियों के बारे में क्यों नहीं बदलती ... कभी कूडे के ढेर में तो कभी रेलवे ट्रेक पर तो कभी अस्पताल की छत पर सेफैक दी जाती हु मैं क्यों क्या माँ निर्दयी होती है नहीं लेकिन समाज की नजरे और सोच उस समय एक माँ को कातिल कुमाता जैसे शब्दों से बुलाते है लेकिन वो ममता की देवी जानती है की अभी मर गई तो एक बार ही मरेगी लेकिन अगर जी गए तो न जाने कितने बार मर मर कर जीना पडे ...क्योंकि समाज के भेड़िये के सामने बेटी को पालना कितना कष्ट कारक होगा ....घर से लेकर स्कूल तक लड़की कही भी सुरक्षित न रह पायेगी ...वो समय न देखना पडे इस लिए ही तो मैं आज तुम्हे मुक्त कर रही हुई ...माँ ने मार दिया मुझको .... क्योंकि अन्दर से हर लड़की अपनी माँ से यही कहती है " माँ मार दो मुझको " .... आखिर क्यों लड़की के साथ ही धोखा होता है ... मुझे याद है की जब मैं जन्मी थी उस समय मेरी माँ और पापा की आखो से आंशु छलके थे सभी बड़े रो रहे थे मुझे ख़ुशी हुई की मैं इस दुनिया में आई लेकिन जब मैने सबकी बाते सुनी तो मेरे भी आखो से आंशु निकलने लगे मैं भी जोर जोर से रोने लगी .. क्योंकि वो माँ और पिता के ख़ुशी के आंशु नहीं थे वो तो लड़की के पैदा होने के दुःख के आंशु थे .. सभी मुझे किनारे लगाने की बात कर रहे थे और रात के अंधेरे में मुझे मेरे पापा कूड़े के ढेर में फैक आए और रात भरमैं शर्द रातो में रोती रही चीखती रही की भगवान क्यों मुझे भेजा इस दुनिया में .... सुबह होते ही सभी उस कूडे के ढेर के पास से निकले और देखना तो दूर सभी मुह्ह मे कपडा लगाय ही थे क्योंकि मैं वहा पड़ी थी नहीं जहा जोर दार बदबू थी लोग उस जगह के पास से निकलना की भी नहीं सोचते है मैने तो एक रात वहा बिताई है ......और कुत्ते सुबह होते भोजन की तलाश में कूडे के ढेर में मुह मारते है लेकिन कुछ ही पालो में उनको मेरी गंध लग जाती है और सभी मुझे नोचने लगते है और मैं चीखती रहती हु लेकिन मैं खुश भी थी की मैं मौत के मुह में जा रही हु कम से कम उन इंसानी कुतो के मुह्ह से तो बच गई जो बार बार मार के भी जीने पर मजबूर करते ... आखिर ये समाज चहाता क्या है न ही हमे पडने दे रहा है न ही आगे बडने दे रहा है और न इस धरती पर जन्म लेने दे रहा है फिर मैं क्योँ जन्म लू इस धरती पर ॥
अगर आकडे देख ले तो लगातार इस भारत में लडकियों की संख्या कम होती जा रही है लेकिन फिर भी किसी को चिंता ही नहीं है लेकिन जो बची है उनके साथ तो अन्याय मत करो लेकिन नहीं ये समाज की मानसिकता है ये शायद नहीं बदलेगी तभी तो अनुराधा और सोनाली ने इन समाज की नजरो से अपने को बचाया वही इनके अपनों ने इनका साथ नहीं दिया क्योँ .. आखिर क्योँ उनके साथ ऐसा हुआ जो सात महीने तक और न जाने कितने दिनों तक और बंद रहती वो .. क्या उसके भाई का फ़र्ज़ ये नहीं था की वो अपनी बहनों को ख्याल रखता जिन बहनों ने अपने जीवन के बारे में न सोच कर अपने करिएर के बारे में न सोच कर अपने छोटे भाई को पाला लेकिन छोटा जब बड़ा हुआ तो छोड़ दिया उनको उनके हालतों पर, मैं पूछना चाहती हु की जब बचपन में एक बार में कोई चीज़ समझ में नहीं आती थी तो सोनाली और अनुराधा दस बार समझाती थी तब उन्होने एक बार भी नहीं कहा की मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाऊँगी उन्होने तो तुम्हारे सपनो में अपने सपने देखे थे .. लेकिन उन्हे नहीं मालूम था सपने चाहे खुली आखो से देखो या बंद सपने सपने ही होते है .. इसलिए ही तो भाई जब काबिल हो गया तो छोड़ दिया बहनों को मरने के लिए ..अब जब ये हालात है लडकियों के तो क्या करू मैं जन्म ले कर... आखिर क्यों समाज के ठेकेदार नेता और अभिनेता सभी ये गुजारिश करते है की " सेव द गर्ल चाइल्ड " आखिर क्यों ये सवाल मैं आप सब से पूछती हु और माँ से यही कहती हु " माँ मार दो मुझको " माँ मार दो मुझको............ माँ मार दो मुझको...........
भारत की जन संख्या २०११ के मुताबिक
| जनसंख्या | कुल | 1,210,193,422 |
| पुरुष | 623,724,248 | |
| महिलायें | 586,469,174 | |
| साक्षरता | कुल | 74.04% |
| पुरुष | 82.14% | |
| महिलायें | 65।46% |
ब्लॉग कानपुर मासिक पत्रिका से साभार.....
" माँ मार दो मुझको अभी....."
तनहा थी जबकि मैं बैठी थी अपनों में ....
आवाज़ दी मुझको किसी ने पर वहा कोई न था
गूंज मेरे कानो में गूंजती फिर भी रही
मनो मुझसे कह रही हो माँ मुझे तुम मत बुलाओ
दुनिया की इस आग में घुट - घुट के मुझे मत जलाओ
मानव रूपी दानव मुझे समाज में जीने न देगा
मस्त परिंदे की तरह मुझे आकाश में उड़ने न देगा
रौंदकर देह मेरी कुचलेगा सपनो को मेरे
काट देगा पंख मेरे छोड़ देगा रक्त रंजित ,
रक्तरंजित.........
क्या मेरे इस दर्द को तब सहन कर पाओगी ?
मेरे ह्रदय की वेदना को दुनिया से कह पाओगी ?
माँ अभी हु मैं अजन्मी, जान हू तेरी अभी ,
दिल पर पत्थर रख लो माँ
मार दो मुझको अभी ....
मार दो मुझको अभी अभी अभी अभी ..........
... संध्याशिश त्रिपाठी
Saturday, October 1, 2011
प्रिये ! अब तो आ जाओ !
- ओंकार मणि त्रिपाठी
जाओ तुमको मुक्त किया !
अब आवाज नहीं दूंगा।
यह भी आंखों का धोखा था,
मन को मैं समझा लूंगा।
क्या समझा था,तुम निकले क्या,
... तुम तो सबसे बदतर निकले।
देखा था मैंने एक रुप,
पर,रुप तेरे कितने निकले।
है खेल खेलना शौक तुम्हारा,
पर,जज्बातों से तुम मत खेलो।
विष दे दो,पर विश्वास न तोडो,
थोडा तुम खुद को बदलो।
- ओंकार मणि त्रिपाठी
मैं !
अमृत की वह पवित्र बूंद
जिसको पीने से ,
... अमरत्व की प्राप्ति होती है ,
पर क्या ,आज भी वह दर्जा आ सकी हूँ मैं ??
जो मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए .
सबको नज़र आता है , तो ,
सिर्फ मेरा रूप ,
टिकती हैं सबकी आँखें ,मेरी आँखें , मेरे होंठ , मेरे वक्ष पर ...
क्या मेरी आँखों में झांक कर देखी है , किसीने , मेरी वेदना , ,
सुना है मेरा मूक चीत्कार ,क्या सुने हैं किसीने ,
मेरे होंठों के अनकहे शब्द ??
क्या किसी ने कभी सोचा ,
कि ,मेरे अंदर एक हृदय है ,जो संवेदनशील है ,
जो धड़कता है , जो धधकता है ,
जब तुम मुझे खुद से ,
छोटा , हीन और कम अक्ल मानते हो .।
क्या तुम कभी माप पाये ,मेरे हृदय की अंतहीन सीमारेखा ?
तुम तो मुझे देवी बना कर पूजते रहे ,
पर देवी तो पाषाण है ,
मैं तो इन्सान हूँ
मगर तुम मुझे इन्सान मानते तो , कभी दोयम दर्जा ना देते .
दोयम मैं हूँ भी नहीं ..
तुम नर हो ,
मुझमें तुमसे दो मात्राएँ अधिक हैं , मैं नारी हूँ ,
तुमसे कहीं अधिक सबल ,तुमसे कहीं अधिक सशक्त ..
मैं पराधीन नहीं मैं पराधीन नहीं ....
- सुलेखा पाण्डेय ...
Thursday, September 29, 2011
जीवन की पहचान !
रैन बसेरा .........
फिर वो बदला ....फिर वो बदला ...
साध लिया अब मन को मैंने
जीवन ज्योत बनी पहचान!!!!!!!!
गाती जाऊं फिर मैं गुनगुन -
लौट आई है वो मुस्कान---
जीवन ज्योत बनी पहचान'..
एक घनेरी छाया ढूँढू -
बैठ करूँ मैं कुछ विश्राम --
मंदिर की घंटी सुन जागी -
श्रवण श्रुति सुन नींद यूँ भागी ....
आ गए फिर मन में प्राण ...!!!!
लौट आई फिर वो मुस्कान ......
साध लिया अब मन को मैंने -
जीवन ज्योत बनी पहचान'' -!
- प्रकृति राय
Sunday, September 25, 2011
शेषधर तिवारी जी की कुछ कवितायेँ !!
मिला करता है अपने आप से भी बेरुखी से
मिला करता है अपने आप से भी बेरुखी से
बहुत मायूस हो बैठा है शायद ज़िंदगी से
अँधेरा ओढकर सूरज को झुठलाता मैं कब तक
निकल आया हूँ अब मैं जामे जम की तीरगी से
ख़याल अच्छा रहा होगा कभी, बहलाने को दिल
नहीं रिश्ता कोई सहरा का अब भी तिश्नगी से
खुदा आये न कोई ऐब मेरी शख्सियत में
मुतासिर सोच हो जाती है अंपनी ही कमी से
अदब में क्यूँ सियासत हो कि हो फिरकापरस्ती
कलम के जो सिपाही हैं लड़ा करते इन्ही से
हमारी खामुशी की चीख सुन लेता है मौला
मिला करता सदाए हक़, सदाक़त की हिसी से
समंदर पर भरोसा क्यूँ नहीं होता क़मर को
किये ही जा रहा तौज़ीन जाने किस सदी से
चलो हम आज इक दूजे में कुछ ऐसे सिमट जाएँ
चलो हम आज इक दूजे में कुछ ऐसे सिमट जाएँ
हम अपनी रंजिशों, शिकवाए ख्वारी से भी नट जाएँ
मेरी ख्वाहिश नहीं है वो अना की जंग में हारें
मगर दिल चाहता है आके वो मुझसे लिपट जाएँ
हमारी ज़िंदगी में तो मुसलसल जंग है जारी
है बेहतर भूल हमको आप खुद ही पीछे हट जाएँ
अलग हों रास्ते तो क्या है मंजिल एक ही सबकी
नहीं होता ये मुमकिन हम उसूलों से उलट जाएँ
चलें हम प्रेम और सौहार्द के रस्ते पे गर मिल के
तो झगडे बीच के खुद ही सलीके से निपट जाएँ
हमें तो चाह कर भी आप पर गुस्सा नहीं आता
कहीं गुस्से में जो खुद आप वादे से पलट जाएँ
भरोसा है हमें इक दूसरे पर ये तो अच्छा है
गुमां इतना न हो इसका कि हम दुनिया से कट जाएँ
मैं ही भगिनी मैं ही भार्या मैं जननी बन आई हूँ
मैं ही भगिनी मैं ही भार्या मैं जननी बन आई हूँ
जो चाहे कह लो मैं अपने साजन की परछाई हूँ
जोहूँ उनकी बाट बिछाऊँ पलकें उनकी राहों में
मेरा सारा दर्द मिटे जब सिमटूं उनकी बाहों में
कौन राम है कौन कृष्ण है मैं तो इनको न जानूँ
मेरे तो आराध्य देव मेरे प्रियतम हैं ये मानूँ
क्या बतलाऊँ कैसे साजन बिन हैं मेरे दिन कटते
मेरी तड़प सही न जाती देख मुझे बादल फटते
मेरी जुल्फें देख घनेरे बादल कारे हो जाते
मैं जिसकी भी ओर निहारूँ वारे न्यारे हो जाते
मेरा तेजस मुखमंडल सूरज को भी शर्माता है
दावा सूरज का झूठा वो चंदा को चमकाता है
चंदा होता दीप्तिमान बस देख हमारा ही मुखड़ा
दिन मेरा अहसानमंद अँधियारा रोता है दुखड़ा
कांति-श्रोत हैं मेरे प्रियतम मैं तो बस परछाई हूँ
तन-गागर में प्रियतम-प्रेम-सुधा भरकर बौराई हूँ
मेरे मन की अमराई में प्रेम-सिक्त हैं बौर खिले
साजन से बस मेरे साजन मुझे न कोई और मिले
आजमाइश की हदों को आजमाना चाहिए
मुश्किलों से लड़ इन्हें आसां बनाना चाहिए
तैर कर दरयाब के उस पार जाना चाहिए
जिस्म पर तम्गों कि सूरत जो हैं जख्मों के निशां
दिल में इनको अब करीने से सजाना चाहिए
ज़िंदगी जब जख्म पर दे जख्म तो हंस कर हमें
आजमाइश की हदों को आजमाना चाहिए
आईना कहता है क्या हो फिक्र इसकी क्यूँ हमें
अब ज़मीर-ओ-दिल को आईना बनाना चाहिए
देख ली दुनिया बहुत अब देखे ले दुनिया हमें
मौत को भी ज़िंदगी के गुर सिखाना चाहिए
क्या हुआ जो हमसफ़र कोई नहीं है साथ में
अब तो तनहा कारवाँ बनकर दिखाना चाहिए
ज़िंदगी खुद्दारियों के साथ जीने के लिए
जह्र पीकर शिव सा हमको मुस्कराना चाहिए
जिसके हर इक शेर ने तुम को नुमाया कर दिया
उस ग़ज़ल को ज़िंदगी भर गुनगुनाना चाहिए
उस ग़ज़ल को ज़िंदगी भर गुनगुनाना चाहता हूँ
मुश्किलों से लड़ इन्हें आसां बनाना चाहता हूँ
तैर कर दरयाब के उस पार जाना चाहता हूँ
जिस्म पर जो हैं निशां जख्मों के, हैं तम्गों सरीखे
मैं करीने से इन्हें दिल में सजाना चाहता हूँ
ज़िंदगी देती रहे यूँ जख्म मुझको बारहा, मैं
आजमाइश की हदों को आजमाना चाहता हूँ
क्यूँ करूँ मैं फिक्र कोई आईना क्या बोलता है
फैसला अपना मैं दुनियाँ को सुनाना चाहता हूँ
देख ली दुनिया बहुत अब देख ले दुनिया मुझे भी
मौत को भी ज़िंदगी के गुर सिखाना चाहता हूँ
क्या हुआ गर साथ मेरे हमसफ़र कोई नहीं है
मैं अकेले कारवाँ बनकर दिखाना चाहता हूँ
मैं जिऊंगा ज़िंदगी खुद्दार रहकर ज़िंदगी भर
जहर पीकर भी मैं शिव सा मुस्कराना चाहता हूँ
दी मुझे पहचान इक जिसके हसीं अशआर ने, मैं
उस ग़ज़ल को ज़िंदगी भर गुनगुनाना चाहता हूँ
"घूरे के भी दिन फिरते हैं"
हमारा ही लहू पीकर जो लालम लाल हैं देखो
वही सड़कों को कहते ओम् जी के गाल हैं देखो
जब इनके सामने हमने रखा इक आईना, भडके
विशेष अधिकार का लेकर खड़े अब ढाल हैं देखो
किरन जब भी निकलती है अँधेरा दूर होता है
ये नादां रोशनी पर फेंकते अब जाल हैं देखो
समझते थे जिसे थोथा चना वो बन गया "अन्ना"
ये पागल नोचते अब हर किसी के बाल हैं देखो
कहावत है कि "घूरे के भी दिन फिरते हैं" नेताजी
जहीं जो हैं बदल लेते खुद अपनी चाल हैं देखो
जुगनुओं की रोशनी से तीरगी घटती नहीं
जुगनुओं की रोशनी से तीरगी घटती नहीं
चाँद हो पूनम का चाहे पौ मगर फटती नहीं
ज़िंदगी में गम नहीं तो ज़िंदगी का क्या मजा
सिर्फ खुशियों के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं
जैसी मुश्किल पेश आये कोशिशें वैसी करो
आसमां पर फूंकने से बदलियाँ छंटती नहीं
गर मिजाज़ अपना रखें नम दूसरों के वास्ते
शख्सियत अपनी किसी भी आँख से हटती नहीं
झूठ के बल पर कोई चेहरा बगावत क्या करे
आईने की सादगी से झूठ की पटती नहीं
- शेषधर तिवारी
अर्द्धनारीश्वर !
भारत में अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना हिन्दू मिथकों और विशेषकर शिव के अर्द्धनारी और अर्द्ध पुरुष रुप से जुड़े मिथक से पनपी है। यह सिर्फ मानव का लिंग निर्धारण करने वाले अंगों और उनमें किसी किस्म के अभाव आदि से जुड़ी छवि नहीं है बल्कि अर्द्धनारीश्वर रुप में शिव का पूरा शरीर ही स्त्री और पुरुष दो भागों का मिश्रण है।
तो ऐसे में किसी किन्नर को या किसी भी स्त्री या पुरुष को अर्द्धनारीश्वर कहा जाना संदेह उत्पन्न करता है। व्याकरण की दृष्टि से तो पता नहीं परंतु माइथोलॉजी की दृष्टि से तो ऐसा कहना गलत ही लगता है। यह तो ऐसा ही है जैसे किसी भी ब्राह्मण शूरवीर को परशुराम कहने लगो, और क्षत्रिय को राम। राम और परशुराम नाम रखना और बात है या उन जैसा बताना और बात है परन्तु कोई कितना भी शूरवीर क्यों न हो, लोग उन्हे हिन्दू
माइथोलॉजी वाले राम और परशुराम तो नहीं कहने लगेंगे।
अर्द्धनारीश्वर, आधुनिक काल में ज्यादा उपयोग में आने वाले शब्द हरिजन जैसा शब्दमात्र नहीं है। अर्द्धनारीश्वरअर्द्धनारीश्वर के साथ ऐसा नहीं है। अर्द्धनारीश्वर एक अतिविशिष्ट शब्द है और इसके पीछे एक विशिष्ट कथा है, इसके साथ एक विशिष्ट मिथक का जुड़ाव रहा है। यह तो महेश, शंकर और रुद्र की भाँति शिव का ही एक रुप है। कोई खास वर्ग नहीं है। स्त्री, पुरुष और किन्नर तीन अलग अलग वर्ग हैं मनुष्य जाति के, पर
आम आदमी किन्नरों को भले ही एक ही परिभाषा से समझता हो या उनकी प्रकृति से अंजान रहता हो पर व्यवहार में यही देखने में आता है कि किन्नर भी अपने आप को स्त्री किन्नर या पुरुष किन्नर रुप में प्रस्तुत करते हैं हाँलाकि नाचने और गाने वाला काम करते हुये वे अधिकतर स्त्री वेश में ही ज्यादा देखे जाते हैं।
सिर्फ व्यवहार में ही ऐसा नहीं होता कि कोई स्त्री एक पुरुष जैसा व्यवहार करे उस जैसी आदतें और प्रवृति और प्रकृति रखे और कोई पुरुष एक स्त्री जैसा रहे बल्कि अस्तित्व की गहराई में तो हरेक स्त्री के अंदर एक पुरुष भी है और हरेक पुरुष के अंदर एक स्त्री। पुरुषों में ऊपरी सतह पर पुरुष गुण अधिकता में होते हैं और स्त्री में स्त्रियोचित गुणों की अधिकता होती है। पर बने तो दोनों स्त्री पुरुष के संगम से ही हैं।
मूल विषय पर वापिस आयें तो प्रश्न उठता है कि अर्द्धनारीश्वर तो छोड़िये क्या किन्नर को अर्द्धनारी भी कहा जा सकता है?
यदि हाँ तब तो अर्द्धपुरुष भी किन्नरों में ही होने चाहियें?
कोई जानकार इस बारे में कुछ कह पायेगा क्या? हो सकता है लोग अर्द्धनारीश्वर शब्द का प्रयोग किन्नर समुदाय के लोगों के लिये करते रहे हों पर क्या यह उचित है?
ऐसा देखा गया है कि प्राय: हिजड़ा शब्द तब प्रयोग में लाया जाता है जब सामान्य नर नारी किन्नरों को अपने से थोड़ा नीचे का दर्जा देकर देखते हैं और कई लोग तो इस वर्ग को अपमानित करने की मंशा से हिजड़ा शब्द का प्रयोग करते हैं। पुरुषों को अपमानित करने की मंशा से भी उन्हे हिजड़ा शब्द से सम्बोधित किया जाता है और ऐसा वातावरण तैयार करने में साहित्य और खास कर फिल्मों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया है, मानो पुरुष का पौरुष सिर्फ उसकी सैक्सुअल संभावना और क्षमता से मापा जा सकता है!
किन्नर भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चला रहा एक वृहद रुप से स्वीकृत नाम है और क्यों न इसी एक नाम का उपयोग किया जाये इस वर्ग को सम्बोधित करने के लिये!
शास्त्रों के मुताबिक शिव-शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। शिव शक्ति के बल पर तो शक्ति शिव के सहारे जगत का तमाम सुखों से कल्याण करते हैं। जगत की सृजन, पालन व संहार में स्त्री-पुरुष के योगदान व महत्व को उजागर करने वाला शिव-शक्ति चरित्र से जुड़ा अर्द्धनारीश्वर रूप जगत प्रसिद्ध व पूजनीय है।
शिव की महिमा अनंत है। उनके रूप, रंग और गुण अनन्य हैं। समस्त सृष्टि शिवमयहै। सृष्टि से पूर्व शिव हैं और सृष्टि के विनाश के बाद केवल शिव ही शेष रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, परंतु जब सृष्टि का विस्तार संभव न हुआ तब ब्रह्मा ने शिव का ध्यान किया और घोर तपस्या की। शिव अर्द्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपने शरीर के अर्द्धभागसे शिवा (शक्ति या देवी) को अलग कर दिया। शिवा को प्रकृति, गुणमयीमाया तथा निर्विकार बुद्धि के नाम से भी जाना जाता है। इसे अंबिका, सर्वलोकेश्वरी,त्रिदेव जननी, नित्य तथा मूल प्रकृति भी कहते हैं। इनकी आठ भुजाएं तथा विचित्र मुख हैं। अचिंत्य तेजोयुक्तयह माया संयोग से अनेक रूपों वाली हो जाती है। इस प्रकार सृष्टि की रचना के लिए शिव दो भागों में विभक्त हो गए, क्योंकि दो के बिना सृष्टि की रचना असंभव है। शिव सिर पर गंगा और ललाट पर चंद्रमा धारण किए हैं। उनके पांच मुख पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा,दक्षिणा तथा ऊध्र्वाजो क्रमश:हरित,रक्त,धूम्र,नील और पीत वर्ण के माने जाते हैं। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में अभय, शूल, बज्र,टंक, पाश, अंकुश, खड्ग, घंटा, नाद और अग्नि आयुध हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वह त्रिशूल धारी, प्रसन्नचित,कर्पूर गौर भस्मासिक्तकालस्वरूपभगवान हैं। उनकी भुजाओं में तमोगुण नाशक सर्प लिपटे हैं। शिव पांच तरह के कार्य करते हैं जो ज्ञानमय हैं। सृष्टि की रचना करना, सृष्टि का भरण-पोषण करना, सृष्टि का विनाश करना, सृष्टि में परिवर्तनशीलतारखना और सृष्टि से मुक्ति प्रदान करना। कहा जाता है कि सृष्टि संचालन के लिए शिव आठ रूप धारण किए हुए हैं। चराचर विश्व को पृथ्वी रूप धारण करते हुए वह शर्वअथवा सर्व हैं। सृष्टि को संजीवन रूप प्रदान करने वाले जलमयरूप में वह भव हैं। सृष्टि के भीतर और बाहर रहकर सृष्टि स्पंदित करने वाला उनका रूप उग्र है। सबको अवकाश देने वाला, नृपोंके समूह का भेदक सर्वव्यापी उनका आकाशात्मकरूप भीम कहलाता है। संपूर्ण आत्माओं का अधिष्ठाता, संपूर्ण क्षेत्रवासी, पशुओं के पाश को काटने वाला शिव का एक रूप पशुपति है। सूर्य रूप से आकाश में व्याप्त समग्र सृष्टि में प्रकाश करने वाले शिव स्वरूप को ईशान कहते हैं। रात्रि में चंद्रमा स्वरूप में अपनी किरणों से सृष्टि पर अमृत वर्षा करता हुआ सृष्टि को प्रकाश और तृप्ति प्रदान करने वाला उनका रूप महादेव है। शिव का जीवात्मा रूप रुद्र कहलाता है। सृष्टि के आरंभ और विनाश के समय रुद्र ही शेष रहते हैं। सृष्टि और प्रलय, प्रलय और सृष्टि के मध्य नृत्य करते हैं। जब सूर्य डूब जाता है, प्रकाश समाप्त हो जाता है, छाया मिट जाती है और जल नीरव हो जाता है उस समय यह नृत्य आरंभ होता है। तब अंधकार समाप्त हो जाता है और ऐसा माना जाता है कि उस नृत्य से जो आनंद उत्पन्न होता है वही ईश्वरीय आनंद है। शिव,महेश्वर, रुद्र, पितामह, विष्णु, संसार वैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा उनके मुख्य आठ नाम हैं। तेईस तत्वों से बाहर प्रकृति,प्रकृति से बाहर पुरुष और पुरुष से बाहर होने से वह महेश्वर हैं। प्रकृति और पुरुष शिव के वशीभूत हैं। दु:ख तथा दु:ख के कारणों को दूर करने के कारण वह रुद्र कहलाते हैं। जगत के मूर्तिमान पितर होने के कारण वह पितामह, सर्वव्यापी होने के कारण विष्णु, मानव के भव रोग दूर करने के कारण संसार वैद्य और संसार के समस्त कार्य जानने के कारण सर्वज्ञ हैं। अपने से अलग किसी अन्य आत्मा के अभाव के कारण वह परमात्मा हैं। कहा जाता है कि सृष्टि के आदि में महाशिवरात्रि को मध्य रात्रि में शिव का ब्रह्म से रुद्र रूप में अवतरण हुआ, इसी दिन प्रलय के समय प्रदोष स्थिति में शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर दिया। इसीलिए महाशिवरात्रि अथवा काल रात्रि पर्व के रूप में मनाने की प्रथा का प्रचलन है।
Thursday, September 22, 2011
कवि नीलाभ की कुछ कवितायेँ !!

नीलाभ
'संस्मरणारंभ', 'अपने आप से लम्बी बातचीत', 'जंगल खामोश हैं', 'उत्तराधिकार', 'चीजें उपस्थित हैं'. 'शब्दों से नाता अटूट हैं', 'शोक का सुख' , 'खतरा अगले मोड़ की उस तरफ हैं','ईश्वर को मोक्ष' नीलाभ के अब तक प्रकाशित कविता संग्रह हैं.
शेक्सपियर, ब्रेख्त तथा लोर्का के नाटकों के रूपांतर - 'पगला राजा', 'हिम्मत माई', 'आतंक के साये', 'नियम का रंदा', 'अपवाद का फंदा', और 'यर्मा' बहुत बार मंच पर प्रस्तुत हुए हैं. इसके अलावा मृच्छकटिक का रूपांतर 'तख्ता पलट दो' के नाम से. रंगमंच के अलावा टेलीविजन, रेडियो, पत्रकारिता, फिल्म, ध्वनि प्रकाश कार्यक्रमों तथा नृत्य नाटिकाओं के लिए पटकथाएं तथा आलेख.
जीवनानन्द दास, सुकांत भट्टाचार्य, एजरा पाउंड,ब्रेख्त, ताद्युस रोदेविच, नाजिम हिकमत, अर्नेस्तो काडिनल, निकानोर पार्रा, और नेरुदा की कविताओं के अलावा अरुंधती राय के उपन्यास 'डी गाड ऑफ़ स्माल थिन्ग्स' का अनुवाद 'मामूली चीजों का देवता', नेरुदा की लम्बी कविता 'माच्चू पिच्चू के शिखर' का अनुवाद बहुचर्चित। मंटो की कहानियो के प्रतिनिधि चयन 'मंटो की ३० कहानियाँ' का संपादन, २ खंडो में गद्य 'प्रतिमानों की पुरोहिती' और 'पूरा घर है कविता', हिंदी के साहित्यिक विवादों, साहित्यिक केंद्रो, और मौखिक इतिहास पर शोधपरक परियोजना स्मृति संवाद (४ खण्डों में) फिल्म, चित्र कला, जैज, तथा भारतीय कला में ख़ास दिलचस्पी । संपर्क - २१९/९, ब्लोक- ए २, भगत कालोनी, वेस्ट संत नगर, बुराड़ी, दिल्ली, ११००८४ । मोबाइल- ०९९१०१७२९०३, फोन: आवास- ०११- २७६१७६२५
गुज़ारिश
मैं अँधेरे का दस्तावेज़ हूँ
राख को चिडि़या में बदलने की तासीर हूँ
मीर हूँ अपने उजड़े हुए दयार का
परचम हूँ प्यार का
मैं आकाश के पंख हूँ
समन्दर में पलती हुई आग हूँ
राग हूँ जलते हुए देश का
धरती की कोख तक उतरी जड़ें हूँ
अन्तरतारकीय प्रकाश हूँ
मैं लड़ाई का अलम हूँ
सम हूँ मैं ज़ुल्म को रोकने वाला
हर लड़ने वाले का हमदम हूँ
बड़े-बड़ों से बहुत बड़ा
छोटे-से-छोटे से बहुत कम हूँ
हिजरत - 1
हिजरत में है सारी कायनात
एक मुसलसल प्रवास, एक अनवरत जलावतनी
पेड़ जगह बदल रहे हैं, हवाएँ अपनी दिशाएँ,
वर्षा ने रद्द कर दिया है आगमन और प्रस्थान का
टाइमटेबल, वनस्पतियों ने
चुका दिया है आख़िरी भाड़ा पर्वतों को
और बाँध लिये हैं होल्डॉल,
पर्वत भी अब गाहे-बगाहे अलसायी आँखें खोल
अन्दाज़ने लगे हैं समन्दर का फ़ासला
समन्दर सुनामी में बदल रहा है
बदल रहे हैं द्वीप अद्वीपों में
एक हरारत-ज़दा हरकत-ज़दा हैरत-ज़दा कायनात है यह
सबको मिल ही जायेंगे नये ठिकाने मनुष्यों की तरह
और अगर कुछ बीच राह सिधार भी गये तो भी
वे अनुसरण कर रहे होंगे मनुष्यों का ही
जिनके किये से वे हुए थे बेघर
हिजरत - 2
सब लौट कर जाने को तैयार बैठे हैं
पहाड़ से आये कवि, पूरब से आये पत्रकार,
बिहार से आये अध्यापक, केरल से आयी नर्सें,
तमिलनाडु के अफ़सर, तेलंगाना के बाबू,
कर्नाटक के संगीतकार, अवध के संगतकार
यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ से आयी रामकली भी
पिछले बीस बरस नेहरू प्लेस की झुग्गी में
गुज़ारने के बाद बिलासपुर जाने को तैयार है
बाबर को समरकन्द याद आता है,
महमूद को ग़ज़नी, अफ़नासी निकेतिन को ताशकन्द
हरेक को याद हैं अपनी जड़ें या जड़ों के रेशे
या रेशों की स्मृतियाँ या स्मृतियों का लोक
हरेक के दिल में है हिजरत का शोक
लेकिन मैं अब भी सफ़र में हूँ
बम्बई से इलाहाबाद, इलाहाबाद से लन्दन,
लन्दन से दिल्ली
शहरों के नाम कौंधते हैं रेलगाड़ी से देखे
स्टेशनों की तरह
बस दो नाम ग़ायब हैं इनमें
जहाँ मुझे होना था, जहाँ मैं हो सकता था
लाहौर जहाँ जली हुई शक्ल में
अब भी मौजूद है मेरा ननिहाल
और जालन्धर जहाँ पुरखों के घर में आ
बसे हैं ज़मीनों के सौदागर
सीकरी
हमेशा सुनाई देती थी
पैसे की आवाज़
बजता रहता था
लगातार
व्यवसाय का हॉर्न,
या बाज़ार का शोर,
या सिक्कों का संगीत
टूटती थी पनहिया
हमेशा
सीकरी आते-जाते
बिसर जाता था
नाम ही नहीं घर का पता भी
मोतियों से भरे मुँह लिये
लौटते थे कवि अपने देस
फिर गा नहीं पाते थे
अपने गान
सपनों के बारे में कुछ सूक्तियाँ
1.
कुछ सपने कभी पूरे नहीं होते
आते हैं वे हमारी नींद में
पूरे न होने की अपनी नियति से बँधे
इस सच्चाई को हम जीवन भर नहीं जान पाते
नहीं जान पाते अपनी असमर्थता,
अपनी विवशताएँ, अपना निष्फल दुस्साहस
सपने जानते हैं इसे
आते हैं इसीलिए वे
ठीक हमारे जग पड़ने से पहले
2.
कुछ सपने दूसरों के होते हैं
जिन्हें पूरा करने के फेर में
हम देख नहीं पाते अपने सपने
3.
सपने अक्सर जन्म देते हैं
दूसरे सपनों को
इसी तरह वे रखते हैं
अपनी गिरफ़्त में आदमी को
4.
कुछ सपने मालिक होते हैं
कुछ होते हैं, ग़ुलाम
एक सपना पूरा करता है
दूसरे सपने की ख़्वाहिशें
दूसरा सपना तीसरे की
इसी तरह क़ायम होता है
सपनों का साम्राज्य
5.
कुछ सपने पीछा करते हैं हमारा
शिकारियों की तरह
बना लेते हैं हमें पालतू
अगर पकड़ पाते हैं हमें
6.
कुछ सपने याद नहीं आते
देखे जाने के बाद
वही होते हैं सबसे ज़रूरी
7.
सपने बेहद अराजक और निरंकुश होते हैं
तरह-तरह के छुपे हुए दरवाज़ों, ढँके गलियारों,
गुप्त द्वारों, भेद-भरी गलियों, रहस्यमय खाइयों,
तिलिस्मी फन्दों, गोरखधन्धों और पेचीदा प्रकोष्ठों से भरे
वे नहीं पूरा करने देते आपको अपनी दबायी गयी इच्छाएँ
ला खड़े करते हैं अबूझ अवरोध,
बदल देते हैं पटकथा की दिशा
अधबीच पहुँच कर कई बार भरते हुए आकुलता प्राणों में
नींद की निरापदता में आतंक की सृष्टि करते हुए
8.
सपनों को समझने का दावा करने वाले
छले जाते हैं
सबसे पहले
सपनों से
कोशिश बेकार है सपनों से
भविष्य बाँचने की
इन्सान का नसीबा तय हो चुका है
सपनों से बाहर
9.
अचानक झटके से टूटती है नींद
जैसे टूटता है काँच का गिलास
फ़र्श पर गिर कर
उठ कर बैठते-बैठते भी
गूँज बाक़ी होती है चीख़ की कानों में
किस का चीत्कार है यह
किस आकुल अन्तर का, मारे जा रहे
निरपराध का, चला आया है जो
इस तरह स्वप्न के बाहर
एक और भी अजीबो-ग़रीब जगत में
जहाँ गूँजता है अहर्निश
उससे भी तीखा हाहाकार
फ़र्क करना मुश्किल है अब
स्वप्न और वास्तविकता में
काया और माया में
आलोक और अन्धकार में
हुलास और हुंकार में
ब्लॉग पहली बार से साभार .....
