Thursday, August 2, 2012

हम गुनहगार औरतें !

सांज की धुप

जाने कितनी ही देर से किवाडो पर ही टीकी थी.

इस इंतजार में की,

जमी की चादर पर बिखर के एक गहरी सांस ही ले ले...

और मैं बेखबर;

बेखबर अपने आपसे पतंग मांजा करते हुए.

मांजा जो दिखाई नही देता और पतंग है

जो उडने को बेकरार.

...किसीने दरवाजे पर दस्तक दी.

कोई आया नही बस बाहर से ही दस्तखत लिए

जुर्म के कागज थमा गया.

कितने गुनाहो के कागजाद आते है

और मैं जो हर एक कागज पर दस्तखत करती,

अपने आप को सजा देती हूं...

देखो तो, जैसे सजा के लिए दरवाजा खोला

सलाखो वाले दरवाजे के भीतर अपने आप को पाया.

अब तक किवाडो पर टिकी धुप भी

मेरी परछाई लिए कुछ इस तरह फैली

मानो मुझे पकडकर जेल के अंदर बंद कर दिया हो...

चलो अब मैं तुम्हारी भी गुनहगार हूं...

किवाड को खुला कर किवाड के पास ही बैठी रही

उस धूप को देखते जो धीरे धीरे अलसा रही थी.

गहरे सुनहरे रंग की पलके अब डुब जाना चाहती थी...

मैं चाहती थी वो और कुछ समय मेरे साथ रुके.

इन दिवारो को उन के धुप की कहानी सुनाए...

अक्सर जेल के दिवारो में देखा गया है कि

किसी कोने में पानी का एक मटका होता है.

उसपर जर्मन की थाली.

उसपर संतरे की रंग का प्लास्टीक का ग्लास.

डुबाओ और पियो.

बस उस खाली से समय में पानी पीयो...

प्यास लगी इसलीए, भूक लगी इसलीए,

कोई याद आया इसलीए, किसे भूल जाना है इसलिए,

आसू जो पत्थर बन गले में अटक गया है इसलीए...

और इसलीए भी की सजा कट जाए, खतम हो जाए,

रिहा हो जाए सारे शिकवे; शिकायत से रिहा हो जाए...

एसे अनगिनत कारनो के लिए,

एसे ही अनगिनत बार मैने भी पानी पीया है...

पानी जो जीवन है, पानी जो जीना सिखाता है,

पानी जो सोच को सोख भी लेता है...

बहरहाल मै अपने आप को उस जेल से आजाद कर

एक मग पानी पीने निकल गई....

तुम्हे किसी भी समय प्यास लगती है,

मेरे पानी पीने पर उसका एतराज ??? याद आया...

जब वापस उस जेल जाना चाहा तो पाया

जेल, जेलर, दरवाजे सब गायब. मुझसे से सब आजाद.

कोई है...???

हर कोने को दी गई आवाज;

जो एक दिया जलाए...

शाम होते ही यादो की परछाईया जैसे घेर लेती है.

उठने ही नही देती. किसीका संगीत,

किसीकी शहनाई, किसीकी बिदाई,

कितनीही कोशीशे, कितनीही कहानीया

और एक इकठ्ठा आवाज

तुम कुछ कहती क्युं नही?

तुम कैसे बर्दाश्त करती हो?

तुम गलत कर रही हो?

तुम गुनहगार हो???

हाँ...

हम गुनहगार है

ना रोब खाए,

न जान बेचें,

न सर झुकाएं,

न हाथ जोडें

हम गुनहगार औरतें

०००

सुनीता झाडे

Sunday, July 29, 2012

शराब की बोतल से जिन्न निकला !

शराब की बोतल से जिन्न निकला
और उस पियक्कड़ सेबोला
– हुक्म मेरे आका ǃ
आप जो भी मुझसे मंगवाओगे
वह मे। ले आउंगा
बस शराब की बोतल नहीं मंगवाना
वरना मुझसे हांथ धो के पछताओगे.

सुनकर पियक्कड़ बोला
–मेरे पास बाकी सब है
उनसे भागता हुआ ही शराब के नशे में
घुस जाता हूं
दिल को छू ले ऐसा कोइ प्यार नहीं देता
देनें से पहले प्यार, अपनीं कीमत लेता
तुम भी दुनिया की तमाम चीजें लेकर
मेरा दिल बहलाओगे
मुझे मालूम है तुम छोड़ जाओगे
जाओ जिन्न किसी जरूरतमंद के पास
मुझे नहीं खुश कर पाओगे......

- संजय राय

वीर सदा हंस कर पलता है !

वीर सदा हंस कर पलता हैं ,
असि पर और शरों पर,
जिसकी गाथा खेला करती ,
सदा जगत अधरों पर ।

वीरत्व सदा जाना जाता हैं ,
अपने तेज प्रखर से ...
साहस रखता जो तोड़ सितारे
ले आने का अम्बर से ।

सच हैं , वीरता ही रख सकती
हैं विजय की चाह ...
पर हैं सच्चा वीर सदा
जो चले धर्म की राह ।

वही विजय हैं पूज्य की जिसमे
निहित भुजा का बल हो ...
नहीं कोई भी कपट न कोई
लेश मात्र भी छल हो ।

- विजय शुक्ला

Friday, July 27, 2012

हर्षवर्धन आर्य की दो कवितायेँ !

हर्षवर्धन आर्य की कलाकृति

ममता
ममता का कोई धर्म नहीं होता ,
और, ना होती जाति माँ की ,
आँचल ही है उसकी पहचान
स्नेह ही है उसका धर्म
जैसे ,एक फूल का धर्म है खिलना .
जैसे एक नदी का धर्म है बहना.
जैसे ,एक पेड़ का धर्म है छाया देना ….
खिलती है माँ भी बच्चों को देख ,
बहाती है नेह क्षीर .
देती है आँचल की छाया ,
सदा -सदा ,
सचमुच ही
यदि , वह है…..माँ …..
तो………!

बेटियां धरती की

बेटियां धरती की
कब कैद हो पाई है
ख़ुशबू फूलों की,
तितलियाँ कब रुकी हैं
उड़ने से ,
ज्योंही खुलता है पिंजरा… ज़रा सा –
उड़ जाती हैं चिड़ियाँ
खुले आकाश में ,
और नानी माँ की रोचक– मनहर कहानियों के
तिलिस्मी संसार से
निकल आईं हैं बाहर
सारी परियां ……
नहीं रही हैं मात्र कल्पना की उड़ान
अपितु उड़ रही है सच्ची –मुच्ची की कल्पना (चावला )
असीम आकाश में …
जाती है चाँद के आँगन में सुनीता विलियम्स ’
खेलती है सितारों को बना कर सटापू*
झूलती है स्पेस-शटल में ’”नाओकोयामाजाकी ”*
गुनगुनाती है चंदा के कान में “ लिंडन बर्गर ”*
और “ट्रेस डायसन ” करती है गुदगुदी
गगन के बदन पर
स्कीइंग करती है शून्य में “स्टेफनी विल्सन ”
और ….ना जाने कितनी ही
सृजनरत सृजनाएं
धरती के आँचल से
उड़ कर
अंतरिक्ष के अंगना में
लिख रही हैं नाम सितारों पर…..
फैला रही हैं धरती की ख़ुशबू
सुदूर अंतरिक्ष में
ये नन्ही तितलियाँ
आजाद परियां
बेटियां धरती की !

हर्षवर्धन आर्य (कवि एवं चित्रकार )

१४ मई १९७२ की प्रभात बेला में हरियाणा के रोहतक जिले स्थित शास्त्री नगर में श्री हर्षवर्धन आर्य का जन्म हुआ। श्री आर्य की बचपन से ही कला में अत्यंत रूचि रही और सुरुचिवश अपने आस -पास के परिवेश से कला का अध्ययन एवम अनुप्रयोग करते रहे । आप की माता श्रीमती मूर्ति देवी अत्यंत धार्मिक प्रवृति की स्नेहमयी माँ हैं। एवम पिताश्री रामप्रकाश आर्य जो अत्यंत कर्मठ विचारवान और सिद्धांतवादी प्रकृति एवम धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति हैं ! इन दोनों की प्रकृति एवम प्रवृति का आपके जीवन (कला,साहित्य और चिंतन ) पर गहरा प्रभाव है ।व्यवसाय से स्वर्णकार ,मन से चित्रकार और आत्मा से कवि श्री आर्य अपनी कला और कविता से सबको आनंदमग्न करने का सद्प्रयास करते हैं !आपने अपनी चित्र कृतियों में कई प्रयोग किये हैं और उनके साथ काव्यात्मक संवाद स्थापित किया है ! साहित्य अकादेमी (संस्कृति मंत्रालय )द्वारा प्रदत फैलोशिप (दो वर्षीय अध्येयतावृति ) हेतु भी आपका विषय “कला और कविता :परस्पर संवाद “था , जिसमे आपने कलाकृतियों पर कविता लिखने के साथ -साथ प्रख्यात चित्रकारों सर्वश्री एस।एच।रज़ा ,एम।एफ. हुसैन ,जी .आर.संतोष ,आर .के .यादव ,मंजीत बावा ,विजेंद्र शर्मा तथा अजय समीर प्रमुख हैं श्री आर्य ने अनेक महत्वपूर्ण कला दीर्घाओं में आयोजित कलाप्रदर्शनों में अपनी चित्रकृतियों को प्रदर्शित किया है जिनमे इंडिया हैबीटेट सेंटर ,विज्ञान भवन, आईफैक्स ,ललित कला दीर्घा ,आर्ट मॉल, माटीसृजन ,पूर्वा सांस्कृतिक केंद्र ,इन्द्रधनुष(पंचकूला) ,हरियाणा कला परिषद भवन (कुरुक्षेत्र ) आदि प्रमुख हैं ! इसके अतिरिक्त आइफैक्स ,हरियाणा कला परिषद , अवंतिका ,गढ़ीस्टूडियो द्वारा आयोजित कला शिविरों में भी भागीदारी रही है ।कवि के रूप में आप कि कवितायेँ अनेक पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं ! ” दिन के उजाले में ” कविता संग्रह, सच्चे मोती (बाल कवितायेँ), कविता फलक (चित्र कृतिओं एवम कविताओं का संपादन ) प्रमुख हैं ! इस के अतिरिक्त आपकी कवितायेँ ,चित्र कृतियाँ , रेखांकन अनेक प्रमुख पत्रिकाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं.जिनमे मुख्य हैं इंडियन लिटरेचर , समकालीन साहित्य अक्षरम संगोष्ठी ,प्रवासी दुनियाँ ,मसि कागद ,साहित्यअमृत आदि हैं आपकी कला कृतियों और कविताओं का दूरदर्शन(डी .डी .-१,डी.डी.भारती , डी.डी. हिसार ,एवम आकाशवाणी के राष्ट्रीय चैनल ,क्षेत्रीय चैनल आदि) से अनेक बार प्रसारण होता रहा है।आज-कल आप रोटरी क्लब दिल्ली अपटाउन के साप्ताहिक पत्र “अपटाउन न्यूज “के संपादक हैं तथा ” श्री विष्णु प्रभाकर जन्मशती समारोह समिति “के सचिव हैं! आपको संस्कृति मंत्रालय एवम साहित्य अकेडमी की जू.फेलोशिप के अतिरिक्त हिंदी अकादेमी दिल्ली का नवलेखन पुरस्कार ,आशुलेखन पुरस्कार ,प्रज्ञा सम्मान ,कलाश्री सम्मान ,काव्य महारथी सम्मान ,एशियन अकेडमी द्वारा अकेडमी अवार्ड सहित कला-साहित्य के क्षेत्र में अनेक सम्मान मिलें हैं ।

मिनाक्षी जिजीविषा की कविता 'स्त्री' !



सुनो !
झाड़ू बुहारते हुए
बीन लेना ,कचरे से
छुट गयी काम की चीज़ों की तरह
छुट गयी , अपनी कुछ इच्छाएं भी !
झूटे बर्तन साफ़ करते हुए
सँभाल लेना
बर्तनों की चमक की तरह
आँखों में कुछ सपने भी
खाना बनाते हुए
जीभ के स्वाद की तरह
सहेज लेना स्मृति में
कविता भी
मैले कपडे पचिते हुए
पसीने की महक की तरह
बसा लेना रोम रोम में
जिजीविषा भी
चूल्हा जलाते हुए ....
रख लेना कुछ चिंगारियां
शब्दों की .....अपने सीने में ...
ताकि मिल सके उर्जा
जीने के लिए ........


मीनाक्षी जिजीविषा

हिंदी साहित्य में 'स्त्री विमर्शपरक' रचनओं के क्षेत्र में मीनाक्षी जिजीविषा एक जाना माना नाम है.
कविता, गज़ल, गीत और लघुकथा विधाओं में रचना करने वाली मीनाक्षी का मानना है --
'कोमल ह्रदय की भावनाओं को जब अभिव्यक्ति का कोई और माध्यम न मिला
तो वह मन कि कच्ची मिटटी से काव्य कोपलें बन खिली'.
इनके अनेक कविता संग्रह और एक लघु कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.
वर्तमान में भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत हैं.
संपर्क :
मीनाक्षी जिजीविषा
5/2 नजदीक सिटी थाना
मोहल्ला कजियन
हिसार-125001 (
हरियाणा )
फ़ोन 08901186300

सुषमा भंडारी की दो कवितायेँ !

सच !

सच!
बहुत जरूरी है
आर्थिक कवच
प्रत्येक देह के लिए
चाहे वो कथा संसार हो
या फिर संसार।

सच!
बहुत जरूरी है
चिरागों का जलना
प्रत्येक खुशी के लिए
चाहे वो घर हो
या फिर जिंदगी का सफर।

सच!
बहुत जरूरी है
यादों के पल
जीने के लिए
चाहे वो सुख दें
या दुःख।

सच!
बहुत जरूरी है
रिश्तों में विश्वास
चाहे वो गैर के लिए हो
या फिर
अपने लिए।

क्षमता

रेत हूँ
ढह जाऊँगी
नदी हूँ
बह जाऊँगी
पीड हूँ
सह जाऊँगी
आग हूँ
दह जाऊँगी!

मैं अबला नहीं
सबला हूँ
और न ही मैं
जड़ हूँ
न जड़ बनकर
रहना चाहती हूँ
मैं चेतन हूँ
और ये सब
जिंदगी के यथार्थ
जीने की
क्षमता है मुझमें।


सुषमा भंडारी

हिंदी की चर्चित गीतकार / हिंदी साहित्य में एम्.फिल. की उपाधि प्राप्त
अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित सुषमा भंडारी के कई कविता और गीत संग्रह हैं
साहित्य जगत मैं इन्हें माहिया और गीत विधाओं के लिए जाना जाता है

sushma.bhandari.547@facebook.com

सुधा उपाध्याय की तीन कवितायेँ !



(1)
मन पीटो ,सपने जोड़ो ....अपनी घुटन समेटो
उन्नीदीं घड़ियों में उन्हें बो आवो
जब पक कर खडी हो जाए फसल
बाँट दो बूरा बूरा ... चूरा चूरा
ऐसे ही होता है सृजन
ऐसे ही मिलता है मन .....


(2)
बहुत कुछ बचा है ,इस ऊब उकताहट के बीच
बहुत सी आत्मरति ,बहुत से शोकगीत
मधुमक्खी के छत्ते सी फैली है लाचारी
रेगिस्तानी भूख प्यास और दिमागी बीमारी
मटमैली आँखें ,खुरदुरी हथेली
भीतरी दरारें ,बाहरी दीवारें
बहुत से भद्दे मज़ाक ,भितरघात ...
बदहवास रातें ,सडती गंधाती आस
हाएना संततियों की जंग लगी सोच
इस मुर्दा संस्कृति की देगी गवाही ....
क्या अब भी आप कहेंगे //बहुत कुछ बचा है
इस ऊब उकताहट के बीच ..



(3)
मित्रों कल मैंने देखा
लाचार सूर्य अपने अभाव समेट कर
समुन्द्र में कूद गया ....
शहर रौशनी से चुंधिया रहे थे
लोगे अपने अपने मुर्दा होंठों पर
ज़िन्दगी के गीत गा रहे थे.. रात नशे में डगमगा रही थी
मेरे सिरहाने बहुत सी तस्वीरें ,और उनकी कहानी तितर बितर थी
हर खिड़की के पीछे खामोशी और गहरी उदासी थी
फिर भीअपने मुर्दा होंठों पर जिंदगी के गीत सजाये हुवे थे




डॉ सुधा उपाध्याय

दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरिअल कॉलेज में
असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत
हिंदी की अनेक पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित.

Tuesday, June 26, 2012

बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की !

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की

उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की

सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की

मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का
बरसती हुई रात बरसात की

"बशीर बद्र"

Friday, June 22, 2012

चलो मै कबूलती हूँ !

चलो मै कबूलती हूँ अपना हर वह अपराध
अति व्यस्ततम लोगों के चेहरे पढने की मैंने की कोशिश
अपने अपनों की कतराती आँखों में मैंने फिर से झांकना चाहा
नज़र से नज़र मिला कर देती रही हर जवाब
माँ बाप की सीख गुरु के आदर्शों की जिम्मेदारी निभाती रही बैकुंठ

आखिर वे ही मुंसिफ हैं आज इस अदालत के
जिन्होंने चाहा मेरी हर कोशिश हर साहस हर जिम्मेदारी की हत्या हो जाए
उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति में भी मै कबूलती हूँ
अपना हर वह अपराध

भगवान् तुम्हे बीच में आने की इज़ाज़त भी नहीं
न न तरस खाने की जरुरत भी नहीं
मुझे तुमसे अधिक फिक्र है न्याय की कानून की दंड संहिता की
और इन सबसे कहीं अधिक ......
दुनिया को बेदाग रखने की तो चलो मै कबूलती हूँ अपना हर वह अपराध

.... डॉ सुधा उपाध्याय

आवो सुलह कर लें !

आवो सुलह कर लें ,गहरी साँसे भर लें
आवो मिलकर किताबों से धुल झाडें
चलो फिर से आईने को मुंह चिढ़ाएं...
रेल की पटरी पर दौड़ें बेतहाशा
अपना अपना फटा झोला सिल लें
पुरानी चुन्नियों का झूला बनायें
गौरैये के बच्चे से बतियाएं
चलो न बूढी अम्मा को सताएं ....हाय
मन को मुक्त करने वाले उन सारे बंधनों में
फिर से जकड जाएँ ...हाय आवो न सुलह कर लें ...डॉ सुधा उपाध्याय

जो अम्मा ने थमाई थी !

सुनो मैंने आज भी सहेज कर रखा है
वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी
घर छोर कर आते हुवे
तुम्हारे लिए अगाध विश्वास
सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार
संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक
बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक
तितली के रंग ,इतर की शीशी
कुछ कढाई वाले रुमाल
सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते
जब तुम थक जाओगे
मैं इस्सी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी
जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुवे
वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे
अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ....डॉ सुधा उपाध्याय

कौन हूँ मैं ...

नहीं
जानती कौन हूँ मैं ...

रुदाली या विदूषक ,
मृत्यु का उत्सव मनाती ,
बुत की तरह शून्य में ताकते लोगों में संवेदना जगाती
इस संवेदन शून्य संसार में मुझी से कायम होगा संवाद
भाषा की पारखी दुनिया में मैं तो केवल
भाव की भूखी हूँ .....
फिर फिर कैसे संवाद शून्य संवेदन में भर दूं स्पंदन .....डॉ सुधा उपाध्याय

तुम्हारे बगैर !

अम्मा
मेरी हर वो जिद नाकाम ही रही

जो तुम्हारे बिना सोने जागने उगने डूबने
बुनने बनाने बड़े होने या....
सब कुछ हो जाने की थी

अब जैसे के तुम नहीं हो कहीं नहीं हो
कुछ नहीं हो पाता तुम्हारे बगैर

नींदों में सपनो का आना जाना
जागते हुवे नयी आफत को न्योता देना
चुनौतियों को ललकारना
अब मुनासिब नहीं ....डॉ सुधा उपाध्याय

उपेक्षा !

जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज
भौर से संध्या तक
भटकता - झुलसता रहा ,
कोण बदल बदल कर,
देखता रहा धरा को,
शायद कही ....
छाँव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
प्यार-छांह-पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि ना दी आभार में,
हर कोई उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ने झाँका तक नहीं
सूरज क़ी ओर,
उपेक्षा क़ी आग लिए सीने में
जलाता रहा दिन भर,
जब घिन्न आने लगी
थोथे स्वार्थी संबंधों पर
डूब मरा समंदर में जाकर कही
और रात ..........
फिर से गर्भवती हो गई

* विनय के. जोशी

उफ! ये सोच।

सोचते-सोचते…
दिमाग की नसें फूल गई हैं
ये भूल गई हैं सोना
साथ ही भूल गई हैं
सोते हुए ‘इस आदमी’ को
सपने दिखाना
रात-दिन बस एक काम
सोचना...सोचना...सोचना
विचार की सूखी-बंज़र धरती को
खोदकर पानी निकालने की कोशिश में
पता है…
हर रोज़ तारीख़ें ही नहीं बदल रही
बहुत कुछ बदल रहा है....

कुछ पहचान वालों की
उधार बढ़ती जा रही है
और उधार देनेवालों की फेहरिस्त भी
कुछ पहचानवालों की
बेचैनी बढ़ गई है...
वो अनजान बन जाने के लिए
बेचैन हो उठे हैं....
और दिमाग है
कि कमबख़्त सोचता जा रहा है...

पेट की आग कुरेदती है...
तो भूख सोचती है..
पहचानवालों की उधार से
ये आग बुझ जाती है
तो फिर दिन सोचता है...
रात सोचती है
प्राइवेट नौकरी की मार सोचती है
बॉस की फटकार सोचती है..
बेगार सोचता है…
फटी जेब का फटेहाल सोचता है

एक आम आदमी का दिमाग
इक्कसवीं सदीं में भी…
बा-ख़ुदा !!!
क्या-क्या जंजाल सोचता है???