Saturday, August 25, 2012

मृत्यु क्या है ?

मृत्यु क्या है ?.....प्रश्न मन में अभी
एक नयी यात्रा का प्रारम्भ बिंदु ?
या एक कथा का समापन भर

ऊर्जा का कभी क्षय तो नहीं होता
रूपांतरित होती भर
अलग- अलग पैकिंग में
फिर से माल वही

जन्म से मृत्यु तक की रेखा
क्या यही जीवन ?
चलता है उसके बाद भी
कुछ सदियों तक ..

जो भी आया है यहाँ वह जाएगा
जो कहीं है आज वह भी आएगा
ये नहीं दस्तूर भर ये सत्य है
जन्म नहीं सत्य सत्य मृत्यु है

मुझे लगता है कि कोई जन्मता नहीं
नहीं कभी कोई मरता है यहाँ
ओझल भर हो जाता और प्रकट भी
दृष्टि बहुत सीमित ही है अभी ..

राघवेन्द्र ,अभी-अभी
२५/अगस्त /२०१२
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गए थे परदेस में रोटी कमाने !

गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने
चेहरे वहां हजारों थे पर सभी अनजाने

दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने

गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया
कभी रहे घर तो कभी पहुंचे थाने

बुरा करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट की अगन को भला दिल क्या जाने

मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की से
क्यों बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने

दूसरों के दुःख में दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने वाला क्या
- मंजरी शुक्ला

Friday, August 24, 2012

तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।


हम को भी अपनी मौत का पूरा यकीन है
पर दुश्मनो के मुल्क मे इक महजबीन है

सर पर खडे है चान्द सितारे बहुत मगर
इंसान का जो बोझ उठा ले ज़मीन है

ये आखरी चराग उसी को बुझाने दो
इस बस्ती मे वो सब से जियादा हसीन है

तकिये के नीचे रखता है त्स्वीर की किताब
तहतीरो गुफ्तगू मे जो इतना मतीन है

अश्को की तरह थम गई जज्बो की नागिने
बेदार मेरे होटो पे ल्फ्जो की बीन है

यारो ने जिस पे अपनी दुकाने सजाई है
खुश्बू बता रही है ह्मारी ज़मीन है

तफसील क्या बताये हमारे भी अहद मे
तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।
( डा. बशीर बद्र )

Saturday, August 18, 2012

घटिया ओछे नाकारा हम !

इक अनहोनी घट गयी
के सारा आलम सोते से जाग गया
अबला का शारीरिक शोषण
टी.वी. ने दिखाया
और तब !!! सबको पता चल गया कि
अभद्रता कि सीमा क्या होती है
नेताओं के बिगुल
स्त्री समाज की मुखिया
जिन पर खुद आरोप हैं
शोषण करवाने के
नए नए तरीके के व्याख्यान देने लगे
अरे ! हाँ !
वो क्या हुआ राजस्थान वाले केस का

रोना आता है इस समाज के खोखलेपन पर

जहाँ हर घड़ी
घर के आँगन से शहर के चौक तक
रोज़ ये हो रहा होता है
और समाज आँख खोले
सो रहा होता है,
और जो उबासी आये तो पुलिस को गरिया दिया
... भई ये सब तो शासन ने देखना है ना !!!
हम क्या करें ?
... अब इन्तिज़ार है सबको
ऐसा कोई वी.डी.ओ
सामूहिक बलात्कार का भी आ जाए
तो थोडा और जागें ..
या फ़िर रेप के वी.डी.ओ का इन्तेज़ार है
( जाओ बेंडिट क्वीन देख लो अगर व्यस्क हो गए हो )

किसको बहला रहे हो मियाँ


अन्दर जो आत्मा ना मार डाली हो

तो झाँक लेना ...
फ़िर सो जाना
सच सुनकर नींद अच्छी आती है

घटिया ओछे नाकारा



भरत तिवारी
आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिजाईनर
लेखन के साथ-साथ संगीत और फोटोग्राफी में भी विशेष रूचि रखतें हैं.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गज़लें प्रकाशित हैं।

पब से निकली लड़की !

पब से निकली लड़की
नहीं होती है किसी की माँ, बेटी या बहन,
पब से निकली लड़की का चरित्र
मोहताज हुआ करता है घडी की तेजी से
चलती सुइयों का,
जो अपने हर कदम पर कर देती हैं उसे कुछ और काला,

पब से निकली लड़की के पीछे छूटी

लक्ष्मणरेखाएं हांट करती हैं उसे जीवनपर्यंत,
जिनका लांघना उतनी ही मायने रखता है जितना कि
उसे नैतिकता का सबक सिखाया जाना,

पब से निकली लड़की अभिशप्त होती है एक सनसनी में

बदल जाने के लिए,
उसके लिए गुमनामी की उम्र उतनी ही होती है
जितनी देर का साथ होता है
उसके पुरुष मित्रों का,

पब की लड़की के कपड़ों का चिंदियों में बदल जाना

उतना ही स्वाभाविक है कुछ लोगों के लिए,
जैसे समय के साथ वे चिन्दियाँ बदल जाती हैं
'तभी तो', 'इसीलिए' और 'होना ही था' की प्रतिक्रियाओं में,

पब से निकली लड़की के,

ताक पर रखते ही अपना लड़कीपना,
सदैव प्रस्तुत होते हैं 'कचरे' को बुहारते 'समाजसेवी'
कचरे के साथ बुहारते हुए
उसकी सारी मासूमियत अक्सर
वे बदल जाते हैं सिर्फ आँख और हाथों में,

पब से निकली लड़की की आवाजें,

हमेशा दब जाती हैं
अनायास ही मिले
चरित्र के प्रमाणपत्रों के ढेर में,
पब से निकली लड़की के ब्लर किये चेहरे पर
आज छपा है एक प्रश्न
कि उसका ३० मिनट की फिल्म में बदलना
क्या जरूरी है समाज को जगाने के लिए,
वह पूछती है सूनी आँखों से
क्या जरूरी है ....उसके साथ हुए इस व्याभिचार का सनसनी में बदलना
या जरूरी है कैमरा थामे उन हाथों का एक सहारे में बदलना.........

अंजू शर्मा
कवयित्री, लेखिका, ब्लॉगर
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख प्रकाशित होतें रहतें हैं ।

मेरे अंदर की स्त्री !

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था

मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए

की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं

मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री

कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ

तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला

तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती

मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है

मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी।

अरुण देव
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय , कविता संग्रह ज्ञानपीठ से २००४ में प्रकाशित
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख
ई पत्रिका समालोचन का संपादन
www.samalochan.blogspot.com

दिल वो बच्चा आज भी है...

मचल जाता है जो बारिश को देखकर....
दिल वो बच्चा आज भी है...
आसमान में उड़ जाने को आतुर..
मन का परिंदा आज भी है..
वक़्त ने करवट तो ले ली है मगर...
आँखों में सपनो का सागर आज भी है...
दर्द को भुलाकर दुनीया की भीड़ में...
दिल मचल कर गुनगुनाने को बेचैन आज भी है...
तुम आओ या ना आओ लौटकर..
दिल तो यही गीत गता रहेगा..
किसी नज़र को तेरा इंतजार आज भी है॥

- सुमन पाठक

कभी कभी उदास होता ये मन है !

डूब कर ही हम बेहतर जान पाए
इन डूबती शामों में होती कैसी उलझन है
सच है,कभी कभी उदास होता ये मन है

बनते काम भी आज बिगड़ रहे हैं
खुदा जाने कैसी अड़चन है
सच है, कभी कभी उदास होता ये मन है

कहीं तो हो ठौर ठिकाना सकूँ का
ना अपनी ज़मीं है ना अपना गगन है
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है

किसको पड़ी है कौन तुझे पूछे है "रोज़"
सभी अपनी अपनी दुनिया में मगन हैं
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है

- सुमन पाठक

मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता !


मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता|
वोह कमरे बंद हैं कब से,
जो २४ सीडियां उनतक पहुँचती थी वोह अब ऊपर नहीं जाती,
मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता|
वहां कमरों में इतना याद है मुझको खिलौने,
एक पुराणी टोकरी में भर के रखे थे,
बहुत से तो उठाने,फेकने,रखने में चूर हो गए|
वहां एक बालकनी भी थी जहाँ एक बेत का झुला लटकता था,
मेरा एक दोस्त था वो तोता,वो रोज आता था,उसको हरी मिर्च खिलाता था,
उसी के सामने एक छत थी
जहाँ एक मोर बैठा आसमा पे रात भर मीठे सितारे चुबता रहता था |
मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं वो निचे की मंजिल पर रहते हैं
जहाँ पर पिआनो रखा है,
पुरानी पारसी स्टाइल का फ्रेज़र से ख़रीदा था,
मगर कुछ बेसुरी आवाजें करता है,
के उसकी रित्जस सारी हिल गयी हैं,
के सुरों पर दुसरे सुर चढ़ गए हैं |

उसी मंजिल पर एक पुश्तैनी बैठक थी
जहाँ पुरखों की तस्वीरें लटकती रहती थीं,
मैं सीधा करता रहता था हवा फिर टेढ़ा कर जाती|
बहु को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे लगते थे,
मेरे बचों ने आखिर उन्हें कीलों से उतरा
पुराने न्यूज़ पेपर मैं उन्हें महफूज़ करके रख दिया था,
मेरा एक भांजा ले जाता है फिल्मों मैं कभी सेट पर लगता है,
किराया मिलता है उनसे |

मेरी एक मंजिल पे मेरे सामने एक मेहमान खाना है
मेरे पोते कभी अमेरिका से आयें तो रुकते हैं,
अलग साइज़ मैं आते है वो जितनी बार आते है,
खुदा जाने वो ही आते हैं या हर बार कोई दूसरा और आता है|
वोह एक कमरा,जो पीछे की तरफ से बंद है जहाँ बत्ती नहीं जलती,
वहां एक रोसरी रखी है, वोह उससे मेहेकता है |
वहां वो दाई रहती थी के जिसने तीन बच्चों को बड़ा करने मैं अपनी उम्र दे दी थी,
मरी तोह मैंने दफनाया नहीं महफूज़ करके रख दिया उसको |

अब उसके बाद एक दो सीढियां है नीचे तहखाने मैं जाती हैं ,
जहाँ ख़ामोशी रोशन है,सुकून सोया हुआ है बस इतनी सी पहलू में जगह रखकर,
कि जब सीढियों से नीचे आऊं तोह उसी के पहलु में बाजु पे सर रखकर गले लग जाऊं,
सो जाऊं |

- गुलज़ार

जिन्दगी रोज नए रंग बदलती क्यो है ?


जब भी मिलती है अजनबी लगती क्यो है
जिन्दगी रोज नए रंग बदलती क्यो है

धूप के कहर का डर है तो दयार-शब से
सर-बरहना कोई परछाई निकलती क्यो है

मुझको अपना कहा इसका गिला तुझसे नही
इसका शिकवा है कि बेगाना समझती क्यो है

तुझसे मिलकर भी तन्हाई मिटेगी मेरी
दिल मे रह-रहके यही बात खटकती क्यो है

मुझसे क्या पूछ रहे हो मेरी वहशत का सबब
बू--आवारा से पूछो कि भट्कती क्यो है।
( शहरयार )

Friday, August 17, 2012

"फिर भी कहूंगा मैं"

"फिर भी कहूंगा मैं"

यह जो घना कुहरा है
इसमें तुम खो बैठे हो आंख।

तुम उदास सूर्य की छाया हो
जो अपने खेतों के ग़म में
भटकता है
एक देश से दूसरे समुन्दर तक।

मेरा विश्वास नहीं करोगे तुम
फिर भी मैं कहूंगा कि
यह देश जो जर्जर हो रहा है लगातार
इसे उजड़ने से और यातना शिविर होने से बचाओ
इसे अपने घर में बसाओ तुम।

मेरा विश्वास नहीं करोगे तुम
क्यों कि विश्वास करना ठीक नहीं रह गया है
फिर भी मैं कहूंगा
कविता बहुत थक गयी है
इसे अपने अन्तस्थल की भीड़ में
जगह दो
अपनी आंखों की तरह इसकी हिफ़ाजत करो।

-पंकज दीक्षित

और मेरी कविता आँसू बन बरस गयी !

तुम्हारी आँखों के स्वच्छ नीले विस्तार में
एक कविता लिखी थी मैंने
कविता में पक्षियों की चहक थी
सुबह के टटकेपन के साथ
तो चौराहों पर उसी वक्त बिकने को खड़े
मजदूरों की बेचैनी भी
जंगलों की हरियाली थी
तो कटते पेड़ों का रूदन भी
फूलों की ताजगी और खुशबू थी
तो बाल-श्रमिकों के मुरझाएं चेहरे भी
समुद्र की उद्दाम लहरे थीं
तो छोटी-बड़ी कई धाराएं भी
जिन्हें एक बड़ी धारा में बदलना था
पर जाने कैसे तुम्हारी आँखों में
घिर आए स्वार्थ के काले बादल
और मेरी कविता आँसू बन बरस गयी।


- डॉक्टर रंजना जयसवाल

और बजता है वह गीत !

बार-बार एक ही गीत बजता है
बज-बजकर रूक जाता
कोई अजनबी लड़की कहती है
कि आप जिनसे करना चाहते हैं बात
वह उत्तर नहीं दे रहा

मैं सूख रहे एक पौधे को पानी देता हूं
और बजता है वही गीत
अपनी बिमार मां को दवाइयां खिलाता हूं
और बजता है वह गीत
सब्जियां लाता हूं बाजार से
रोटियां सेंकता हूं
ताकि बच्चे सो न जायं भूखे
और बजता है वह गीत

खाता हूं दो कि जगह एक ही रोटी
और बजता है वह गीत
इंतजार करता हूं खूब
जैसे इंतजार करती है नदी
जैसे खेत इंतजार करते हैं
चिड़िया इंतजार करती है जैसे
जैसे घर के दरवाजे इंतजार करते हैं
दूर देश की एक पहचानी आवाज

सो जाता हूं इंतजार करते
जल्दी उठने की चिंता में
दफ्तर की सिढ़ियां याद आती हैं
तीस किलोमिटर दूर एक कमरे में रखी
फाइलें याद आती हैं

सो जाता हूं कि जैसे जग जाता
बजता वह गीत

वह अजनबी लड़की बार-बार एक ही बात रटती
समय के इस मोड़ पर
तेज होती जाती हैं अजनबी अवाजें
बजता है बार-बार एक ही गीत

और मैं तुम्हारी चुप हो गई अवाज
के साथ गुम हो रहा हूं हर रोज
धंसता जाता एक भयानक
और अंधी सुरंग में....।

कलम, आज उनकी जय बोल...

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल......


(रामधारी सिंह 'दिनकर')