अपना महबूब के हम तारीफ का करी,
हर तारीफ के ई छोट बनवले बाड़ी.
बस हसीये के जान निकाल देली,
न जाने कहा से ई अदा पईले बाड़ी.
ईनका में न जाने कौन कशिश बा,
नयनन के जादू हमरा पर चलवले बाड़ी.
कुछ समझती हम ईनका के,
ओकरा पहिले ही होश उडवले बाड़ी.
आईना में जब देखेली अपना के,
आईना के भी शर्मशार कईले बाड़ी.
जुल्फन के लहरा के घटा में,
देख बारिश आज मंगवले बाड़ी.
अपना होठ्वा के आउरी गुलाबी कर के,
फेर हमरा पर ई नशा चढवले बाड़ी.
कौनो लायक न रहनी अब हम,
अईसन ई पागल बनवले बाड़ी.
कादुन चाँद होले सबसे खुबसूरत,
ई त उनको के भी पीछे छोडले बडी.
चाँद अपना नाम के याद करत बाड़े,
ऐ त ई उनका के बर्बाद कईले बाड़ी.।।
Sunday, September 2, 2012
बारिश में भींजत उनका के देखनी जब !
बारिश में भींजत उनका के देखनी जब,
तब ई बारिश से जलन होखे लागल.
कईसे बचा ली उनका के ये बारिश से?
ई त हर अंग के अब छुए लागल.
गौर से देखनी उनका चेहरा के जब,
एगो शंका मन में जनमे लागल.
मेघ के तरफ चेहरा उठा के बतियावत रहली,
हम सोचनी की मेघ के भी प्यार होखे लागल.
बारिश जब कुछ कम भईल,
फेर ठंढा समीर बहे लागल.
ऊ हमरा में खुद के छुपावे लगली,
तब काबू कईला के बाद भी दिल बहके लागल.
कुछ बूंद ऊनका चेहरा पर अभी भी रहे,
ऊ बुन्दवा दिल जरावे लागल.
जब हटईनी अपना हाथ से बूंद के हम,
ऊनकर चेहरा कयामत बरसावे लागल.
भींजल केश के साथ भींजल बदन,
दिल में अजबे आग लगावे लागल.
सोचनी अब कबो बारिश में भींजे ना देम,
तब तक मेघ फिर से बारिश बरसावे लागल.॰.
-संजय

तब ई बारिश से जलन होखे लागल.
कईसे बचा ली उनका के ये बारिश से?
ई त हर अंग के अब छुए लागल.
गौर से देखनी उनका चेहरा के जब,
एगो शंका मन में जनमे लागल.
मेघ के तरफ चेहरा उठा के बतियावत रहली,
हम सोचनी की मेघ के भी प्यार होखे लागल.
बारिश जब कुछ कम भईल,
फेर ठंढा समीर बहे लागल.
ऊ हमरा में खुद के छुपावे लगली,
तब काबू कईला के बाद भी दिल बहके लागल.
कुछ बूंद ऊनका चेहरा पर अभी भी रहे,
ऊ बुन्दवा दिल जरावे लागल.
जब हटईनी अपना हाथ से बूंद के हम,
ऊनकर चेहरा कयामत बरसावे लागल.
भींजल केश के साथ भींजल बदन,
दिल में अजबे आग लगावे लागल.
सोचनी अब कबो बारिश में भींजे ना देम,
तब तक मेघ फिर से बारिश बरसावे लागल.॰.
-संजय

Coin Tuesday: The Mule
Aug. 3, 2010Written by John Dale
The Mule, or, A Mildly Embellished Slice of Life:
"Coin question.”
I looked up. It was one of the photographers. Young guy.
“Coin question? What’s up?” I asked.
“What’s a mule?”
I filed my first response — too much Captain Obvious — away for later. He did say “coin question,” after all. I owed him a Serious Professional answer.
“It’s a coin with two sides that don’t match. Like if a Washington quarter obverse was put together with a Sacagawea dollar reverse.”
I wondered to myself: which coin brought this on?
I started checking through the coins in the Boston ANA Auction in my head. Mules, mules… there was that one pattern with the three dollar gold obverse and the Shield five cent obverse on the same nickel planchet, Judd-531A, by the numbers, and unique by the book… that thing was cool, but weird - seriously weird even by pattern coin standards. New nickname for the Judd-531A: the Lady Gaga.
Maybe it was something else. Another Shield nickel pattern, perhaps?
There was the one dated 1865 with a reverse that has no rays between the stars, the Judd-418. Shield nickels weren’t made for circulation until 1866, and the No Rays reverse didn’t come out to play until 1867, so the two sides didn’t go together. Was there a little Mint hanky-panky at work? Almost certainly, just like with the Lady Gaga.
Two possibilities. I had to ask:
“So which coin is it?”
“This Gobrecht dollar. I was working on the video and it was in the script.”
Gobrecht dollar? I checked the script. Oh, right. Lot 3284, the Judd-65. It pairs the no-stars obverse used on Judd-60 Gobrecht dollars with the no-stars reverse used on Judd-84 Gobrechts. Subtle, but definitely a mule.
I explained what made the Gobrecht dollar a mule. He got the general idea, if not the terminology.
“All right. I still don’t get why they call it a mule, though.”
City kid. It was time to break out the Captain Obvious. I smirked a bit as I slipped into the voice I usually reserve for non-precocious three-year-olds.
“Well, you see, when a horse and a donkey love each other very much…” […and the horse is a male and the donkey is a female, you get a hinny. – Noah]
“Oh, I gotcha.” He cracked up. Point for me.
He got in a parting shot, though. As he walked away, he muttered under his breath, just loud enough for me to hear, in true non-collector fashion:
“Coin weenies," he said. "What’ll they think of next?”
Coin Monday: To Be Continued?
Aug. 10, 2010Written by John Dale
(As you will read below, which I will let JDB explain in more detail, the Heritage blog is going to be taking a sabbatical. It is only fitting that John be the one to sign off, for the time being at least, as he's held down the majority of the writing for the better part of the last year. For that, and for his continuing good work and insight in all the aspects of his work, he has my thanks, as do those of you who have read this blog over the last two years. Best, Noah.)
This will be the last time you see me in this space for a while.
The Heritage Auctions blog is going into mothballs, to be re-evaluated in a year. I’d love to see it come back, but since there are no guarantees and I’ll be waiting a year in the best case, I want to send this incarnation of the blog out in style.
One of my regrets is that in a year and a half of blogging for Heritage, I haven’t been able to make a decent Viking reference. Thus, today’s topic is this Norse-American Centennial medal, part of the Dr. and Mrs. Claude Davis Collection in Heritage’s ready-to-launch August 2010 Official ANA Auction in Boston. http://www.HA.com/1143
The Norse medal, as it is usually abbreviated, has an unusual place in U.S. numismatics. Unlike many medals of its time, it is fairly well-established as an object for mainstream coin collecting. I have described it as an “honorary commemorative” in Heritage catalogs, and the history of the Norse medal is closely knotted with the silver commemoratives of the same era.
In fact, those other commemoratives are the reason the Norse medal is a medal and not a coin.
Several different commemorative coin issues were being struck or authorized in 1925; coins dated 1925 include the Lexington-Concord, the Stone Mountain (Georgia), the California Diamond Jubilee, and the Fort Vancouver (Washington) Centennial, and the 1927 Vermont (or Battle of Bennington) commemorative was authorized the same year. Many more commemorative bills were filed, only to die in committee.
The 1925 Minnesota State Fair featured the Norse-American Centennial, a celebration of early Norwegian immigrants’ arrival to the U.S. in 1825 and subsequent Norwegian contributions to American life and culture. The sponsor of the bill that created the Norse medal was Ole Juulson Kvale, a U.S. Representative from Minnesota of Norwegian descent, who was elected to the House in 1923.
Kvale was well-placed to influence the business of commemorative coinage bills, as he served on the responsible House committee. Through his service, however, he must have been aware of the logjam of commemorative coin bills. To win passage, he made the Norse commemorative a medal instead of a coin. Kvale’s bill passed out of the House and eventually became law.
Norse medals are eight-sided with a Leif-Eriksson-before-longboat motif on the obverse and a longboat on the reverse. The design was by James Earle Fraser, who is better known as the creator of the Buffalo nickel. Medals were made on thin and thick planchets, the vast majority in silver like the present piece, but also 100 struck in gold, like this September 2002 offering.
To be continued...
चला था राह में कुछ सोच गहरी बात ऐ राही......
चला था राह में कुछ सोच गहरी बात ऐ राही......
सफ़र में साथ हैं कितने यहाँ कितने हीं साथी हैं......
कदम कुछ यूँ बढ़ाता मै, गिरा तो कोई थामेगा...
बचा लेगा मुझे ठोकर से कोई तो संभालेगा...
बहारों में थे कितने यार और कितने याराने थे...
पराया ना था कोई बस सभी अपने हीं अपने थे...
जो आई राह में आंधी नज़र ना कोई यार आया...
ना आखों में हीं आसू थे ना उनके दिल में प्यार आया...
गिराया जो मुकद्दर ने लगी ऐसी मुझे ठोकर...
कहा है जो चले थे साथ मेरी राह में होकर...
ये सिखा है ज़माने से यहाँ ना कोई अपना है..
सभी हैं यार मतलब के ये दुनिया एक धोखा है...
--
सुमन
सफ़र में साथ हैं कितने यहाँ कितने हीं साथी हैं......
कदम कुछ यूँ बढ़ाता मै, गिरा तो कोई थामेगा...
बचा लेगा मुझे ठोकर से कोई तो संभालेगा...
बहारों में थे कितने यार और कितने याराने थे...
पराया ना था कोई बस सभी अपने हीं अपने थे...
जो आई राह में आंधी नज़र ना कोई यार आया...
ना आखों में हीं आसू थे ना उनके दिल में प्यार आया...
गिराया जो मुकद्दर ने लगी ऐसी मुझे ठोकर...
कहा है जो चले थे साथ मेरी राह में होकर...
ये सिखा है ज़माने से यहाँ ना कोई अपना है..
सभी हैं यार मतलब के ये दुनिया एक धोखा है...
--
सुमन
Saturday, August 25, 2012
मृत्यु क्या है ?
मृत्यु क्या है ?.....प्रश्न मन में अभी
एक नयी यात्रा का प्रारम्भ बिंदु ?
या एक कथा का समापन भर
ऊर्जा का कभी क्षय तो नहीं होता
रूपांतरित होती भर
अलग- अलग पैकिंग में
फिर से माल वही
जन्म से मृत्यु तक की रेखा
क्या यही जीवन ?
चलता है उसके बाद भी
कुछ सदियों तक ..
जो भी आया है यहाँ वह जाएगा
जो कहीं है आज वह भी आएगा
ये नहीं दस्तूर भर ये सत्य है
जन्म नहीं सत्य सत्य मृत्यु है
मुझे लगता है कि कोई जन्मता नहीं
नहीं कभी कोई मरता है यहाँ
ओझल भर हो जाता और प्रकट भी
दृष्टि बहुत सीमित ही है अभी ..
राघवेन्द्र ,अभी-अभी
२५/अगस्त /२०१२
एक नयी यात्रा का प्रारम्भ बिंदु ?
या एक कथा का समापन भर
ऊर्जा का कभी क्षय तो नहीं होता
रूपांतरित होती भर
अलग- अलग पैकिंग में
फिर से माल वही
जन्म से मृत्यु तक की रेखा
क्या यही जीवन ?
चलता है उसके बाद भी
कुछ सदियों तक ..
जो भी आया है यहाँ वह जाएगा
जो कहीं है आज वह भी आएगा
ये नहीं दस्तूर भर ये सत्य है
जन्म नहीं सत्य सत्य मृत्यु है
मुझे लगता है कि कोई जन्मता नहीं
नहीं कभी कोई मरता है यहाँ
ओझल भर हो जाता और प्रकट भी
दृष्टि बहुत सीमित ही है अभी ..
राघवेन्द्र ,अभी-अभी
२५/अगस्त /२०१२
गए थे परदेस में रोटी कमाने !
गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने
चेहरे वहां हजारों थे पर सभी अनजाने
दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने
गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया
कभी रहे घर तो कभी पहुंचे थाने
बुरा करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट की अगन को भला दिल क्या जाने
मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की से
क्यों बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने
दूसरों के दुःख में दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने वाला क्या
- मंजरी शुक्ला
चेहरे वहां हजारों थे पर सभी अनजाने
दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने
गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया

कभी रहे घर तो कभी पहुंचे थाने
बुरा करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट की अगन को भला दिल क्या जाने
मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की से
क्यों बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने
दूसरों के दुःख में दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने वाला क्या
- मंजरी शुक्ला
Friday, August 24, 2012
तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।
हम को भी अपनी मौत का पूरा यकीन है
पर दुश्मनो के मुल्क मे इक महजबीन है
सर पर खडे है चान्द सितारे बहुत मगर
इंसान का जो बोझ उठा ले ज़मीन है
ये आखरी चराग उसी को बुझाने दो
इस बस्ती मे वो सब से जियादा हसीन है
तकिये के नीचे रखता है त्स्वीर की किताब
तहतीरो गुफ्तगू मे जो इतना मतीन है
अश्को की तरह थम गई जज्बो की नागिने
बेदार मेरे होटो पे ल्फ्जो की बीन है
यारो ने जिस पे अपनी दुकाने सजाई है
खुश्बू बता रही है ह्मारी ज़मीन है
तफसील क्या बताये हमारे भी अहद मे
तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।
( डा. बशीर बद्र )
Saturday, August 18, 2012
घटिया ओछे नाकारा हम !
इक अनहोनी घट गयी
के सारा आलम सोते से जाग गया
अबला का शारीरिक शोषण
टी.वी. ने दिखाया
और तब !!! सबको पता चल गया कि
अभद्रता कि सीमा क्या होती है
नेताओं के बिगुल
स्त्री समाज की मुखिया
जिन पर खुद आरोप हैं
शोषण करवाने के
नए नए तरीके के व्याख्यान देने लगे
अरे ! हाँ !
वो क्या हुआ राजस्थान वाले केस का
रोना आता है इस समाज के खोखलेपन पर
जहाँ हर घड़ी
घर के आँगन से शहर के चौक तक
रोज़ ये हो रहा होता है
और समाज आँख खोले
सो रहा होता है,
और जो उबासी आये तो पुलिस को गरिया दिया
... भई ये सब तो शासन ने देखना है ना !!!
हम क्या करें ?
... अब इन्तिज़ार है सबको
ऐसा कोई वी.डी.ओ
सामूहिक बलात्कार का भी आ जाए
तो थोडा और जागें ..
या फ़िर रेप के वी.डी.ओ का इन्तेज़ार है
( जाओ बेंडिट क्वीन देख लो अगर व्यस्क हो गए हो )
किसको बहला रहे हो मियाँ
अन्दर जो आत्मा ना मार डाली हो
तो झाँक लेना ...
फ़िर सो जाना
सच सुनकर नींद अच्छी आती है
घटिया ओछे नाकारा ।

भरत तिवारी
आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिजाईनर
लेखन के साथ-साथ संगीत और फोटोग्राफी में भी विशेष रूचि रखतें हैं.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गज़लें प्रकाशित हैं।
के सारा आलम सोते से जाग गया
अबला का शारीरिक शोषण
टी.वी. ने दिखाया
और तब !!! सबको पता चल गया कि
अभद्रता कि सीमा क्या होती है
नेताओं के बिगुल
स्त्री समाज की मुखिया
जिन पर खुद आरोप हैं
शोषण करवाने के
नए नए तरीके के व्याख्यान देने लगे
अरे ! हाँ !
वो क्या हुआ राजस्थान वाले केस का
रोना आता है इस समाज के खोखलेपन पर
जहाँ हर घड़ी
घर के आँगन से शहर के चौक तक
रोज़ ये हो रहा होता है
और समाज आँख खोले
सो रहा होता है,
और जो उबासी आये तो पुलिस को गरिया दिया
... भई ये सब तो शासन ने देखना है ना !!!
हम क्या करें ?
... अब इन्तिज़ार है सबको
ऐसा कोई वी.डी.ओ
सामूहिक बलात्कार का भी आ जाए
तो थोडा और जागें ..
या फ़िर रेप के वी.डी.ओ का इन्तेज़ार है
( जाओ बेंडिट क्वीन देख लो अगर व्यस्क हो गए हो )
किसको बहला रहे हो मियाँ
अन्दर जो आत्मा ना मार डाली हो
तो झाँक लेना ...
फ़िर सो जाना
सच सुनकर नींद अच्छी आती है
घटिया ओछे नाकारा ।

भरत तिवारी
आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिजाईनर
लेखन के साथ-साथ संगीत और फोटोग्राफी में भी विशेष रूचि रखतें हैं.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गज़लें प्रकाशित हैं।
पब से निकली लड़की !
पब से निकली लड़की
नहीं होती है किसी की माँ, बेटी या बहन,
पब से निकली लड़की का चरित्र
मोहताज हुआ करता है घडी की तेजी से
चलती सुइयों का,
जो अपने हर कदम पर कर देती हैं उसे कुछ और काला,
पब से निकली लड़की के पीछे छूटी
लक्ष्मणरेखाएं हांट करती हैं उसे जीवनपर्यंत,
जिनका लांघना उतनी ही मायने रखता है जितना कि
उसे नैतिकता का सबक सिखाया जाना,
पब से निकली लड़की अभिशप्त होती है एक सनसनी में
बदल जाने के लिए,
उसके लिए गुमनामी की उम्र उतनी ही होती है
जितनी देर का साथ होता है
उसके पुरुष मित्रों का,
पब की लड़की के कपड़ों का चिंदियों में बदल जाना
उतना ही स्वाभाविक है कुछ लोगों के लिए,
जैसे समय के साथ वे चिन्दियाँ बदल जाती हैं
'तभी तो', 'इसीलिए' और 'होना ही था' की प्रतिक्रियाओं में,
पब से निकली लड़की के,
ताक पर रखते ही अपना लड़कीपना,
सदैव प्रस्तुत होते हैं 'कचरे' को बुहारते 'समाजसेवी'
कचरे के साथ बुहारते हुए
उसकी सारी मासूमियत अक्सर
वे बदल जाते हैं सिर्फ आँख और हाथों में,
पब से निकली लड़की की आवाजें,
हमेशा दब जाती हैं
अनायास ही मिले
चरित्र के प्रमाणपत्रों के ढेर में,
पब से निकली लड़की के ब्लर किये चेहरे पर
आज छपा है एक प्रश्न
कि उसका ३० मिनट की फिल्म में बदलना
क्या जरूरी है समाज को जगाने के लिए,
वह पूछती है सूनी आँखों से
क्या जरूरी है ....उसके साथ हुए इस व्याभिचार का सनसनी में बदलना
या जरूरी है कैमरा थामे उन हाथों का एक सहारे में बदलना.........
अंजू शर्मा
कवयित्री, लेखिका, ब्लॉगर
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख प्रकाशित होतें रहतें हैं ।
नहीं होती है किसी की माँ, बेटी या बहन,
पब से निकली लड़की का चरित्र
मोहताज हुआ करता है घडी की तेजी से
चलती सुइयों का,
जो अपने हर कदम पर कर देती हैं उसे कुछ और काला,
पब से निकली लड़की के पीछे छूटी
लक्ष्मणरेखाएं हांट करती हैं उसे जीवनपर्यंत,
जिनका लांघना उतनी ही मायने रखता है जितना कि
उसे नैतिकता का सबक सिखाया जाना,
पब से निकली लड़की अभिशप्त होती है एक सनसनी में
बदल जाने के लिए,
उसके लिए गुमनामी की उम्र उतनी ही होती है
जितनी देर का साथ होता है
उसके पुरुष मित्रों का,
पब की लड़की के कपड़ों का चिंदियों में बदल जाना
उतना ही स्वाभाविक है कुछ लोगों के लिए,
जैसे समय के साथ वे चिन्दियाँ बदल जाती हैं
'तभी तो', 'इसीलिए' और 'होना ही था' की प्रतिक्रियाओं में,
पब से निकली लड़की के,
ताक पर रखते ही अपना लड़कीपना,
सदैव प्रस्तुत होते हैं 'कचरे' को बुहारते 'समाजसेवी'
कचरे के साथ बुहारते हुए
उसकी सारी मासूमियत अक्सर
वे बदल जाते हैं सिर्फ आँख और हाथों में,
पब से निकली लड़की की आवाजें,
हमेशा दब जाती हैं
अनायास ही मिले
चरित्र के प्रमाणपत्रों के ढेर में,
पब से निकली लड़की के ब्लर किये चेहरे पर
आज छपा है एक प्रश्न
कि उसका ३० मिनट की फिल्म में बदलना
क्या जरूरी है समाज को जगाने के लिए,
वह पूछती है सूनी आँखों से
क्या जरूरी है ....उसके साथ हुए इस व्याभिचार का सनसनी में बदलना
या जरूरी है कैमरा थामे उन हाथों का एक सहारे में बदलना.........
अंजू शर्मा
कवयित्री, लेखिका, ब्लॉगर
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख प्रकाशित होतें रहतें हैं ।
मेरे अंदर की स्त्री !
तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ
यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ
कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था
उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही
तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ
तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया
जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था
और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी।
अरुण देव
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय , कविता संग्रह ज्ञानपीठ से २००४ में प्रकाशित
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख
ई पत्रिका समालोचन का संपादन
www.samalochan.blogspot.com
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ
यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ
कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था
उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही
तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ
तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया
जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था
और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी।
अरुण देव
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय , कविता संग्रह ज्ञानपीठ से २००४ में प्रकाशित
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख
ई पत्रिका समालोचन का संपादन
www.samalochan.blogspot.com
दिल वो बच्चा आज भी है...
मचल जाता है जो बारिश को देखकर....
दिल वो बच्चा आज भी है...
आसमान में उड़ जाने को आतुर..
मन का परिंदा आज भी है..
वक़्त ने करवट तो ले ली है मगर...
आँखों में सपनो का सागर आज भी है...
दर्द को भुलाकर दुनीया की भीड़ में...
दिल मचल कर गुनगुनाने को बेचैन आज भी है...
तुम आओ या ना आओ लौटकर..
दिल तो यही गीत गता रहेगा..
दिल वो बच्चा आज भी है...
आसमान में उड़ जाने को आतुर..
मन का परिंदा आज भी है..
वक़्त ने करवट तो ले ली है मगर...
आँखों में सपनो का सागर आज भी है...
दर्द को भुलाकर दुनीया की भीड़ में...
दिल मचल कर गुनगुनाने को बेचैन आज भी है...
तुम आओ या ना आओ लौटकर..
दिल तो यही गीत गता रहेगा..
किसी नज़र को तेरा इंतजार आज भी है॥
- सुमन पाठक
- सुमन पाठक
कभी कभी उदास होता ये मन है !
डूब कर ही हम बेहतर जान पाए
इन डूबती शामों में होती कैसी उलझन है
सच है,कभी कभी उदास होता ये मन है
बनते काम भी आज बिगड़ रहे हैं
खुदा जाने कैसी अड़चन है
सच है, कभी कभी उदास होता ये मन है
कहीं तो हो ठौर ठिकाना सकूँ का
ना अपनी ज़मीं है ना अपना गगन है
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है
किसको पड़ी है कौन तुझे पूछे है "रोज़"
सभी अपनी अपनी दुनिया में मगन हैं
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है
- सुमन पाठक
इन डूबती शामों में होती कैसी उलझन है
सच है,कभी कभी उदास होता ये मन है
बनते काम भी आज बिगड़ रहे हैं
खुदा जाने कैसी अड़चन है
सच है, कभी कभी उदास होता ये मन है
कहीं तो हो ठौर ठिकाना सकूँ का
ना अपनी ज़मीं है ना अपना गगन है
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है
किसको पड़ी है कौन तुझे पूछे है "रोज़"
सभी अपनी अपनी दुनिया में मगन हैं
सच है कभी कभी उदास होता ये मन है
- सुमन पाठक
मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता !

मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता|
वोह कमरे बंद हैं कब से,
जो २४ सीडियां उनतक पहुँचती थी वोह अब ऊपर नहीं जाती,
मकान की उपरी मंजिल पे अब कोई नहीं रहता|
वहां कमरों में इतना याद है मुझको खिलौने,
एक पुराणी टोकरी में भर के रखे थे,
बहुत से तो उठाने,फेकने,रखने में चूर हो गए|
वहां एक बालकनी भी थी जहाँ एक बेत का झुला लटकता था,
मेरा एक दोस्त था वो तोता,वो रोज आता था,उसको हरी मिर्च खिलाता था,
उसी के सामने एक छत थी
जहाँ एक मोर बैठा आसमा पे रात भर मीठे सितारे चुबता रहता था |
मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं वो निचे की मंजिल पर रहते हैं
जहाँ पर पिआनो रखा है,
पुरानी पारसी स्टाइल का फ्रेज़र से ख़रीदा था,
मगर कुछ बेसुरी आवाजें करता है,
के उसकी रित्जस सारी हिल गयी हैं,
के सुरों पर दुसरे सुर चढ़ गए हैं |
उसी मंजिल पर एक पुश्तैनी बैठक थी
जहाँ पुरखों की तस्वीरें लटकती रहती थीं,
मैं सीधा करता रहता था हवा फिर टेढ़ा कर जाती|
बहु को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे लगते थे,
मेरे बचों ने आखिर उन्हें कीलों से उतरा
पुराने न्यूज़ पेपर मैं उन्हें महफूज़ करके रख दिया था,
मेरा एक भांजा ले जाता है फिल्मों मैं कभी सेट पर लगता है,
किराया मिलता है उनसे |
मेरी एक मंजिल पे मेरे सामने एक मेहमान खाना है
मेरे पोते कभी अमेरिका से आयें तो रुकते हैं,
अलग साइज़ मैं आते है वो जितनी बार आते है,
खुदा जाने वो ही आते हैं या हर बार कोई दूसरा और आता है|
वोह एक कमरा,जो पीछे की तरफ से बंद है जहाँ बत्ती नहीं जलती,
वहां एक रोसरी रखी है, वोह उससे मेहेकता है |
वहां वो दाई रहती थी के जिसने तीन बच्चों को बड़ा करने मैं अपनी उम्र दे दी थी,
मरी तोह मैंने दफनाया नहीं महफूज़ करके रख दिया उसको |
अब उसके बाद एक दो सीढियां है नीचे तहखाने मैं जाती हैं ,
जहाँ ख़ामोशी रोशन है,सुकून सोया हुआ है बस इतनी सी पहलू में जगह रखकर,
कि जब सीढियों से नीचे आऊं तोह उसी के पहलु में बाजु पे सर रखकर गले लग जाऊं,
सो जाऊं |
- गुलज़ार
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