Monday, August 9, 2021

गजल !

कसम  खाई  यहाँ  मैनें  सभी  को है जगाने  की।
सुनहरे  ख्व़ाब  आँखों में  पिरोने की  सज़ाने की।

हमें   रस्मों  रिवाजों  के  न  बाँधों  बंधनों से  तुम,
हमें है   आरज़ू   तारे   फ़लक  से  तोड़ लाने की।

दिखे  हर श़ख्क अपने  आप में खोया हुआ बैठा,
 नहीं  फ़ुरसत ज़रा भी है  इन्हें रिश्ते  निभाने की।

यहाँ माता- पिता  गुरु से  हमें  पहचान मिलती है,
उन्हें मत कोशिशें करना कभी भी आज़माने  की।

खुलेंगे   द्वार   जन्नत के  यहीं  दहलीज़  के भीतर,
ज़रूरत है  हमें   घर के   बुज़ुर्गों   को  हँसाने की।

नही  सोंचा   कभी  मैंनें   करूँ  मैं राज दुनिया पर,
मगर  है  जुस्तजू   मेरी   दिलों   में  घर बनाने की।

ग़मों  से   ये  "नवल"  मेरा  पुराना   है  बड़ा नाता,
वजह काफ़ी  नहीं   है क्या   हमारे  मुस्कराने  की।



                

 

 

 

 

 

 

 

 

 निशा सिंह  "नवल" लखनऊ

स्त्री की खूबसूरती !

स्त्री की खूबसूरती का वर्णन सदियों से हुआ है
जब शब्द नहीं थे, ना ही रंगों से सजी चित्रकारी थी
तब भी पुरुष का स्त्री की प्रति सौंदर्य बोध व आकर्षण था...
फिर सभ्यता का विकास हुआ, गीत संगीत, काव्य और चित्रों का दौर शुरू हुआ....

अन्य विषयों के साथ स्त्री सौंदर्य हमेशा प्रमुख रहा
उसने नारी के केश सज्जा,
सुन्दर नयन व उजले रंग पर हमेशा जोर दिया है

क्यों कभी उस से ऊपर ना पहुंच सके तुम...
हे पुरुष!! तुम तो स्वयं को पौरुषता से परिपूर्ण समझते हो....
फिर क्यों स्त्री की लिए ये भौतिक मानदण्ड स्थापित किये?

क्या तुम्हे नहीं दिखी उसमे ममता प्रेम के साथ
नये सृजन को संभव करने की बहादुरी...

कैसे अनदेखा कर दिया उसका भी आखेट करना
वो लकड़ी बीनकर बच्चे पालना
और कृषि कार्य में प्रमुखता क्या दिखी नहीं??
उसमे भी थीं अपार संभावनाएं
ख़ुदको साबित भी किया उसने
कल्पना शीलता के साथ विज्ञान और दर्शन
के बीज उसमे भी थे...

गृह प्रबंधन, राजनीति से लेकर अंतरिक्ष तक उड़ान भरी .
फिर क्यों तुम हर गीत में सिर्फ उसके  सुर्ख लबों और कपालों तक पहुंचे...
क्यों नहीं बॉलीवुड संगीत बना,
जिसमे उसके प्रबंधन या प्रशासकीय गुणों का वर्णन
खुले मन से किया हो...

क्या तुम्हे वो स्त्री खूबसूरत नहीं लगी, जिसने तर्क वितर्क में पुरुष को पीछे छोड़ा हो...
क्यों तुम उसके  कपाल,
उरोज और  पैमाने से मापे तन तक रहे....
क्यों नहीं बढ़ सके स्त्री देह से आगे..
क्यों नहीं पढ़ा उसके हुनर को...
क्यों नहीं टांक दीं वो बातें किसी तस्वीर में,
जो उसकी बुद्धिमता का प्रतीक हों...

यकीन मानो हर स्त्री को होगी तब ज्यादा खुशी
जब तुम उसे दैहिक सौंदर्य से परे समझोगे..
और जब तुम किसी खास मकसद से उसके बाह्य सौंदर्य की विवेचना करते हो...
तो वो तुम्हारा मन ताड़ लेती है...

 
© पूनम भास्कर 'पाखी '

एस0डी0एम0, सीतापुर (उ0प्र0)

चलो दुनिया को खूबसूरत बनाया जाये।


 

Saturday, July 10, 2021

नहीं साथ कुछ ले जाना है।

साथ नही लाये जब कुछ भी,
फिर काहे का गाना है??
नही साथ कुछ ले जाना है।
जो कुछ लिया जगत से सबकुछ ,
देकर यहीं तो जाना है।
नही साथ कुछ ले जाना है।
जो रिश्ते हैं जो व्यवहारे,
अच्छे - बुरे सब करम हमारे,
यहीं कमाया ,यहीं लुटाया
हाथ खुले रह जाना है।
नहीं साथ कुछ  ले जाना है।
माता - पिता,पति अरू बेटा,
बेटी एक बहाना है।
संगी - साथी रिश्तेदार संग,
रंगमंच ही सजाना है।
खतम हुआ जब अपना अभिनय,
चोला बदला जाना है।
नही साथ कुछ ले जाना है।
प्रारब्ध की करें तैयारी
पिछले का हम भोग करें।
अगला जनम सुधर सुख पावै,
ऐसा कुछ संयोग करे।
फूट गया जो घड़ा पुराना
जल माटी में मिल जाना है।
 नहीं साथ कुछ ले जाना है ।

  साभार : रश्मि शर्मा,  वाराणसी(उप्र)

।। रूह का दाग़ ।।

 मन की प्रवृति है चंचल
           सुख चाहता वो हर पल
सुख भी सभी हैं सम्भव
              पर  तुष्टि  है असम्भव,

  चाहत  कभी न मिटती
             सुरसा की गति ही  बढ़ती
  संतोष क्या ? न जाना
             दिल, मन कि  बात माना,

  मन, से दिमाग़  मिल कर 
                 दिल के  क़रीब  आता
  फ़िर  रूह  को  धुँधलाकर  
                    दाग़ी  उसे  बनाता,

  यह " मै " का कारनामा  
              नादाने - दिल  न  जाना
  जीवन  बिखर  के  उलझा 
                 जग से पड़ेगा  जाना,

  तब  मन  कहां रहेगा  
            जब  तन भी  छूट  जाना
  रह   जाएगा  पछताना 
              खाली  ही  हाथ  जाना,

  यह रूह भी  कोसेगी  
           किस तन का  साथ पाया
  उलझा  रहा " मै " मद  में
                  दाग़ी  मुझे  बनाया,

  जीवन  का  मर्म  जाना 
               झूंठा  है !  ये  ज़माना
  पर  देर  बहुत कर दी 
               तब  बात  मैने  माना,

  महफ़िल भी उठी कब की
            वह  मिट चुका  तराना
  लकड़ी  सजी  चिता  की
        अब ख़ाक में मिल जाना 

साभार : रमेश चन्द्र शुक्ल 

Tuesday, June 22, 2021

तवायफ !

हाँ तवायफ हूँ मैं....
हाँ कई नाम है मेरे....?
कोई वैश्या,तो कोई देवदासी कहता है।
कोई पिंगला तो कोई गणिका कहता है।
गढ़ लेते है सब मेरा नाम,
रूप व यौवन से शब्द लेकर...
कोई रूपसी,कामिनी,अप्सरा कहता है
तो कोई बाजारू ,रखेल ,बेहया, तो...
किसी को  रूपजीवा, कुंभदासी,पुंश्चली कहना पसंद है
न जाने कितनी उपमाएं गढ़ ली मेरे लिए।
मेरे अनाम नाम की.....

हाँ तवायफ हूँ मैं....
दिन की रौशनी मेरे लिए स्याह और 
रात का अँधेरा रौशन है मेरे लिए...
कब कहाँ किसी ने जाना मुझें....?
कौन हूँ कैसी हूँ क्यों हूँ मैं.....?
हर किसी की नजर पड़ती है बस
नीचे से ऊपर की ओर निहारती..
मेरे रंगे पुते बदन को।
मेरे बदन की उभरी खरोचें 
कहाँ दिखाई देती किसी को....?
जिन्हें छिपा लेती हूँ हर सुबह उबटन के लेप से।
मेरे उरोजों का उभार,जिस्म में भरा
मांस ही दिखता है उन्हें...

हाँ तवायफ हूँ मैं....
रोज कई-कई बार लगता है मेरा मोल
जिस्म का वजन देखकर...
कसाई के बकरे की तरह....
कब कहाँ दिखाई देता है किसी को..?
मेरा कलुषित भूत और अंधकूप सा भविष्य।
रक्तिम मांस के नीचे छिपा दिल कहाँ देख पाता कोई..?

हाँ तवायफ हूँ मैं.....
हर रात सूरज ढलते 
भटकते आ जाते है
सफेदपोश लगाने बोली
मेरे मांस और मंजा की.....
जिनके कुर्ते का रंग दिन के उजाले में
चटकता है मोती सा....
रात भर करते है मुँह काला....
मेरे जिस्म के गोरे रंग से...
मेरी श्वेत पिंड़लियों का गुणगान करते।
मेनका ,रंभा ,उर्वशी से आगे कर!

हाँ तवायफ हूँ मैं......
पर वेपर्दा हूँ बापर्दा नही
न धोखा,न फरेब ,न दगा़,न घात 
इन सब से दूर 
न कोई राज है मेरा,
न दोहरा चरित्र
सब कुछ खुली किताब सा है मेरा जीवन।
कुछ दोहरे चरित्र वालो से अलग!

हाँ तवायफ हूँ मैं.....
पर  सरिता सी पवित्र 
ढोती हूँ मैला, समाज का...
हर रात 
मौन रहकर....
हर दर्द को दबा कर 
जो दिया है इसी समाज ने...
हाँ तवायफ हूँ मैं....?

हेमराज सिंह'हेम' कोटा राजस्थान

तासीर-ए प्रीत

एक प्रश्न किया था हमने
प्यार का तासीर है कैसा
कटु,निबोडी पीर जैसा
दूध चीनी  की खीर जैसा
या नैनन अश्क नीर जैसा ?

 गर्म-गर्म पकौड़े जैसा
या चमड़े के कोड़े जैसा
बिन लगाम के घोड़े जैसा
या गोविंद रण-छोड़े जैसा?

नर्म मुलायम रेशम जैसा
भाग्य- सितारा चमचम जैसा
सावन बून्द झर झमझम
जैसा
या जख्म पुते मरहम जैसा?

भिन्न -भिन्न विचारों ने
भिन्न -भिन्न मत दिए 
विपरीत संस्कारों ने
हृदय  क्षत-विक्षत किये
असीम श्रदायुक्तों ने
मस्तक  नत- किये !!

कई एक विचारों ने
तोड़ कर मरोड़ दिया
स्वयं के दुश्चिंतन-पथ पर
ला कर तन्हां छोड़ दिया!! 

वीना उपाध्याय
मुज़फ्फरपुर बिहार

Monday, June 7, 2021

मुस्कुराहट

एक प्यारी सी मुस्कुराहट
हौसलों को बढ़ा देती है,
पल भर में प्रेम की उच्च 
शिखर पर चढ़ा देती है !!
 दुःख भरी जिंदगी में 
संचार कर देती है,
खुशियों की अनंत
भंडार भर देती है  !!

जीने की लालसा जगा कर
पलकों पे अनेको 
ख्याब सजा देती है,
जो आंखों से बहुत 
दूर होता है,उसको 
पास से देखने को 
बेताब कर देती है !!

एक प्यारी सी मुस्कान से
बेगानाभी लगता है अपना सा
उसके मौजूदगी का एहसास
लगने लगता है 
 साकार सच सपना सा !!

एक प्यारी सी मुस्कान 
तन्हाई को भगा देती है,
रंगों में ढल जाती है बेवफाई
हर्षोल्लास  जगा देती है !!

 जिंदगी में मुस्कुराहट 
है वरदान की तरह,
जिंदादिल जान की तरह,
परिपूर्ण अरमान की तरह
मधुरधुन गान की तरह  !!

   वीना उपाध्याय
मुज़फ्फरपुर बिहार

Sunday, June 6, 2021

हाँ पुरुष हूँ न...

कह नहीं पाता कई बार
अपने मन की 
उद्विग्नता को.. 
नहीं संभाल पाता 
कई बार,, 
मन के अंदर चल रहे
तूफान को.. 
हाँ उस वक़्त बस एक 
साथ की ख्वाहिश मेरी..
उस स्त्री की.. 
जो समझ सके 
तन ही नहीं.. 
मन के भावो को भी.. 
भूल जाना चाहता हूँ 
समक्ष उसके... 
कि हाँ पुरुष हूँ मैं. 
और उस पुरुष होने के 
दम्भ को भी.. 

रो सकूँ समक्ष उसके.. 
और कहूं.. 
हाँ हूँ पुरुष.. 
पर दर्द होता मुझे भी,  
बिलकुल तुम सा ही.. 
जो समझ मेरे दर्द को,, 
दुलार दें, माँ की तरह.. 
और मेरे बालों पर 
अपने हाथों, 
और गालों पर.
अपने स्नेह का, 
चुम्बन अंकित करें.. 
हाँ पुरुष हूँ.. 
पर फिर भी एक कंधा 
ढूंढता हूँ मैं भी 
सुकूँ के लिये
हमेशा संग तुम्हारे...
- अखिलेश मिश्र

Sunday, May 30, 2021

अजामिल की कविता (ताकि सनद रहे...)

लो रख लो मेरी डायरी
इसमें वह सब कुछ है
जो मैंने चाह कर भी
तुमसे कभी नहीं कहा...
जो नहीं कहा कभी
तुम उसी अनकहे में 
हमेशा रहे मेरे साथ
इस डायरी में है मेरी जिंदगी
जो मैंने जी तुम्हारे 
होने न होने के बीच
शब्दों में मिलूंगी मैं तुम्हें
स्मृतियों की गलियों में भटकते ,
तुम्हारा पता तुम्ही से पूछते हुए...
कहीं एकांत में सीढ़ियों पर बैठे 
तुम्हें देखते हुए जी भर...
ये सनद है डायरी
कोई पूछे तो कहना क़ि 
मैंने तुम्हे प्यार किया था 
एक तितली है इसमें रंगहीन ,
बुकमार्क  की तरह
मेरे कहने पर पकड़कर दी थी 
तुमने मुझे
अब नहीं है यह भी मेरी तरह...
अब नहीं हूं मैं तुम्हारे पास
तुम्हारी यादों में रोते हुए
इन्तज़ार करते हुए दरवाज़े पर।

अब पढ़ोगे मुझे ?

**अजामिल

Saturday, May 22, 2021

तू ही मुझको भाता है।

तन की मन की दूरी है पर 
कैसा रिश्ता नाता है
तू ही जानम तू ही जानम
तू ही मुझको भाता है

अंग अंग तू भोर नदी की
सिंदूरी सी काया है
मलयज शीतल सुरभित कोमल
तू मेरा हम शाया है

खुली आंख हो बंद पलक हो
तू सपनो में आता है

तन की मन की दूरी है पर ,
कैसा रिश्ता नाता है
तू ही जानम तू ही जानम
तू ही मुझको भाता है

इंद्र धनुष के रंग समेटे
मन मोहक मुस्कान तेरी
तू पूजा की थाली जैसी
धान पान अभिमान मेरी

शतदल कमल कैद में भौरा
देखो क्या सुख पाता है

तन की मन की दूरी है पर ,
कैसा रिश्ता नाता है
तू ही जानम तू ही जानम
तू ही मुझको भाता है

- राजेश कुमार श्रीवास्तव

है हादसों की बस्ती।

है हादसों की बस्ती, हर सांस कांपती है ।
बेचैन रूह फ़िर भी,खुशियां तलाशती है ।।

पथराई हुई आंखे,उम्मीद कर रही हैं ।
वो पत्थरों के दिल में, इक सांस खोजती हैं ।।

कोई नहीं सुनेगा फ़िर,चीख क्यों रही है।
तू रूह बन गई है, क्यों ज़िस्म ढूंढती है।।

दिल टूटकर बिख़र ही गया,कांच की तरह ।
वो कांच के टुकड़ों में, इक अक़्स देखती है ।।

दुनिया की भीड़ में कहीं, वजूद खो गया ।
वीरान गुलशनों में, अब आस खोजती है ।।

इंतेज़ार है कि कोई, आएगा हमज़ुबान
बेचैन आंखे अब तक, उसको तलाशती हैं ।।


     #स्वरचित एवं मौलिक रचना   
     विनीता सिंह 
     सतना, मध्यप्रदेश
      03/02//2021

Monday, April 19, 2021

' जिंदगी '

जिंदगी को देखोगे 
जब भी हँसकर, 
तुम्हारे साथ 
वह मुस्कुराएगी...

जब भी देखोगे उसे 
उदास होकर,
शीशे की तरह 
टूट जाएगी...

जब देखोगे 
उसे सीने में ग़म रखकर, 
आग का दरिया 
सी बन जाएगी...

जब भी देखोगे 
उसे खिल खिलाकर,
फूल की तरह 
वह खिल जाएगी...

Friday, October 30, 2020

कैलाश गौतम की कविता- गाँव गया था, गाँव से भागा

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आँगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हक़ीम देखकर
गिरवी राम-रहीम देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
जला हुआ खलिहान देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
नए धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
बिना टिकट बारात देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
नए नए हथियार देखकर
लहू-लहू त्योहार देखकर
झूठ की जै-जैकार देखकर
सच पर पड़ती मार देखकर
भगतिन का शृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
मुठ्ठी में कानून देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।
मुठ्ठी में कानून देखकर
किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा ज़ुनून देखकर
गंजे को नाख़ून देखकर
उज़बक अफ़लातून देखकर
पंडित का सैलून देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

Friday, October 2, 2020

मैं खुद से मिलने जाता हूँ

मैं खुद से मिलने जाता हूँ
मैं खुद को ढूढ़ के लाता हूँ
मैं खुद से मिलने जाता हूँ

दुर्जम वन के अंधियारे में
धरती से दूर किनारे में
मैं खुद का पीछा करता हूँ
निर्जन मन के गलियारे में

कुछ खोता हूँ कुछ पाता हूँ
मैं खुद से मिलने जाता हूँ

कुछ साथ नही कुछ सोच नही
आशाओं का बोझ नही
दिल सीसे सा लाता हूँ
भावों का कोई खरोंच नही

फिर से सीसा चमकाता हूँ
मैं खुद से मिलने आता हूँ

नागफनी या बरगद हो
बड़ा हो या बौना कद हो
अंतर्मन की पर्तें खोलूं
हो गरल कहीं या कुछ मद हो

मद गरल वहीं खो आता हूँ
मैं खुद से मिलने जाता हूँ

जब खुद को खुद में पाता हूँ
तब ही मैं वापस मैं आता हूँ
मैं खुद से मिलने जाता हूँ 
मैं खुद से मिलने जाता हूँ

राजेश कुमार श्रीवास्तव