Tuesday, January 1, 2013

मेरी झोली में !

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

- रमेश तैलंग ( वरिष्ठ बाल-साहित्यकार) 
 
साभार :- http://balduniya.blogspot.in/

नव वर्ष कौन ?

आज नव वर्ष की धूम मची है|कृष्ण पक्ष है |शीतलता भी अपनी चंचलता इठलाते हुए प्रदर्शित कर रही है |आगे चैत्र शुक्ल पक्ष की पतिपदा से हम भारतीयों का नव वर्ष आता है | वस्तुतः इन दोनों में किसको नव वर्ष मानें , केवल अपनी अपनी मान्यताओं के आधार पर या कोई प्रबल प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ? आज पाश्चात्य जगत के इस नव वर्ष में मान्यताओं के अतिरिक्त कोई ऐसा प्रमाण या प्रकृति का समर्थन इसे नहीं प्राप्त है जिससे इसे नव वर्ष कहा जा सके | हाँ हमारे भारत वर्ष में जो नव वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को मनाया जाता है ,उसका स्वागत स्वयं प्रकृति करती है | उस समय भारत का प्रत्येक व्यक्ति देख सकता है की वृक्ष स्वयं पतझड़ बीत जाने के कारण नूतन पत्ते धारण करते हैं |नयी नयी कोपलें मानों हमारे नव वर्ष के स्वागत हेतु खिलखिलाकर हंसती हुई उसका स्वागत करने को इठला रही हों |

जबकि इस पाश्चात्य नव वर्ष में ऐसा कुछ भी नहीं होता |हाँ इसका आरम्भ नृत्य नाटक नाना प्रकार के विलासिता पूर्ण संसाधनों से होता है | विदेशों की स्थिति तो बड़ी ही विचित्र है|वहां क्या क्या होता है ---इसका वर्णन हम नहीं कर सकते | इस नव वर्ष के मूल में हमें क्या देखने को मिलता है --मात्र दृश्य या अदृश्य रूप में "वासना " | जबकि हमारे नव वर्ष का शुभारम्भ उपासना से होता है | भारत के नगर ही नहीं अपितु गाँव -गाँव में नवरात्र के उपलक्ष में मानस का नवाह्न परायण , चंडी पाठ आदि विभिन्न धार्मिक आयोजन एवं साधकों की साधना आरम्भ होती है |

हमारे नव वर्ष का प्रकृति द्वारा स्वागत किया जाना अर्थात नूतन पत्तों कोपलों को धारण करके प्रकृति मानों इस तथ्य का डिमडिम घोष कर रही हो कि भारतवासियों जागो ,आँख खोलकर देखो कि वस्तुतः नव वर्ष कौन है ? जिसका मैं स्वागत कर रही हूँ ,वह है नव वर्ष ? या पाश्चात्यों का कपोल कल्पित नव वर्ष जिसमे मुझमे कोई नूतनता नहीं आती अथवा जिसका मैं कोई स्वागत नहीं करती |  कौन है नव वर्ष ? जिसके आरम्भ में विलासिता और वासना है वह ? या जिसके आरम्भ में धार्मिकता और उपासना है वह ?

विलासिता और वासना से नव जीवन का आरम्भ होता है या पतन ? उत्तर मिलेगा --पतन | विलासिता के कीड़े अनेक सम्राट पतन के गर्त में गिरे --इतिहास इसका साक्षी है |चाहे वे रावण की श्रेणी के हों या स्वयं रावण अथवा विलासी कोई मुग़ल शासक | किन्तु धार्मिकता और उपासना से नवजीवन का आरम्भ ही होता है , पतन नहीं |अत एव घास की रोटियाँ खाकर परम धार्मिक भगवान एकलिंग के उपासक महाराणा प्रताप सिंह ने देश को नवजीवन दिया , पतन के गर्त में गिरने से बचाया | इस विवेचन से सुनिश्चित हुआ की नव वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही होता है ,आज जनवरी के आरम्भ से नहीं |

- आचार्य सियारामदास नैयायिक

सौ० सुचिता मिश्रा

दिल जैसे कह उठता है !


तुम्हारी  खूबसूरती  में  चार  चाँद  लग  जाते  हैं -
जब  तुम  नहा के  जुल्फे  झटकते   हुए  खिड़की  पे  आती  हो ,
मै बेखबर  सा  निहारता  हूँ  -
उस  चाँद  से  सलोने  चेहरे  को .
एक  पल  के  लिए  भूल  जाता  हूँ  सब  कुछ ,
ऐसा  लगता  है  जैसे सुबह-  ऒस  की
नन्ही - नन्ही  बूंदों   से  नहा  के  निकली  हो ,
जब  तुम  सरमा   के  मुझे  देखती  हो  ,
और  नजरे  झुका  कर  मुस्करा  के  जाने  लगती  हो,
दिल  सिहर  सा  उठता  है ,
रोम  रोम  में  आग  सी  लगती  है ,
तुम्हारे  उस  सरमाने  को  क्या  कहूँ  ,
जैसे  चाँद  शरमा  के  बादल  में  छुपता  हो ,
दिल  एक  बार  फिर  से  बेचैन  होता  है तुम्हे  देखने  के  लिए ,
अंतर्मन  में  एक  तस्वीर  -हमेशा  छुपा  रखी  है  मैंने  तुम्हारी ,
दिन  भर  में  ना  जाने  कितनी  बार
उस  खिड़की  की  तरफ  देखता  हूँ -
वो  सूनी  खिड़की  भी  अच्छी  लगती  है .
कम  से  कम  तुम्हारे  आने  का  आस  तो  दिलाती  है ,
फिर  तुम्हारा  इंतजार  ऐसे  करता  हूँ
जैसे  कोई  उल्लू  रात   के  आने  का  इंतजार  करता  हो ,
और  शाम  को  जब  तुम  आती  हो
आँखों  से  आँखे  मिलाती  हो ,
दिल  जैसे  कह  उठता  है  तुम्हारा  ही  इंतजार  था ,
अब  आये  हो  कभी  मत  जाना ,
भले  ही  थोड़े  दूर  हो , पास  आना ,
और  इस  पागल  को  अपना  बनाना .....................

-वीरेश  मिश्र

अपनी मनमानी बहूत हुई !

ये नो दो ग्यारह हुआ बहूत
अब तेरा तेरा कह प्यारे
अपनी मनमानी बहूत हुई
अब 'उसकी' रजा में रह प्यारे .

दिल की बातें दिल में ना रख
जो दिल में है तू कह प्यारे
जो बात चुभ रही है दिल में
तू उसको पहले कह प्यारे .

जो बुरा बहूत है तू उसको
मत भला बुरा तो कह प्यारे
वो अपनी हद में रहता है
तू अपनी हद में रह प्यारे .

फिर बात बनेगी धीरज धर
दिल्ली के दिल में रह प्यारे
भारत वालों की बात और
इंडिया को भारत कह प्यारे .

आये अंग्रेज गए सारे -
ना इटली में तू रह प्यारे -
भारत तो अपना भारत है -
बेख़ौफ़ यहाँ तू रह प्यारे !
- सतीश शर्मा

एक फूल अमन के लिए !

नये साल की पहली सुबह तुम्हें क्या दूं मैं ?
एक फूल अमन के लिए,
एक बन्दूक आज़ादी के लिए,
एक किताब संग-साथ के लिए ?
तुम्हारी आंखों के लिए नयी चमक ?
तुम्हारे ख़ून के लिए नयी गरमी,
तुम्हारे प्रेम के लिए नयी नरमी,
दिल के लिए नयी आशा, संघर्ष के लिए नयी भाषा ?
नये वर्ष में दूर हों ग़म,
नये वर्ष में मिटें सितम,
नये वर्ष में दुख हों कम,
सिर झुकें नहीं, बांहें थकें नहीं,
टूटें सभी बेड़ियां, मिले नया दम.

-कवि नीलाभ

Monday, December 31, 2012

वो सूनी खिड़की भी अच्छी लगती है !


तुम्हारी  खूबसूरती  में  चार  चाँद  लग  जाते  हैं -
जब  तुम  नहा के  जुल्फे  झटकते   हुए  खिड़की  पे  आती  हो ,
मै बेखबर  सा  निहारता  हूँ  -
उस  चाँद  से  सलोने  चेहरे  को .
एक  पल  के  लिए  भूल  जाता  हूँ  सब  कुछ ,
ऐसा  लगता  है  जैसे सुबह-  ऒस  की
नन्ही - नन्ही  बूंदों   से  नहा  के  निकली  हो ,
जब  तुम  सरमा   के  मुझे  देखती  हो  ,
और  नजरे  झुका  कर  मुस्करा  के  जाने  लगती  हो,
दिल  सिहर  सा  उठता  है ,
रोम  रोम  में  आग  सी  लगती  है ,
तुम्हारे  उस  सरमाने  को  क्या  कहूँ  ,
जैसे  चाँद  शरमा  के  बादल  में  छुपता  हो ,
दिल  एक  बार  फिर  से  बेचैन  होता  है तुम्हे  देखने  के  लिए ,
अंतर्मन  में  एक  तस्वीर  -हमेशा  छुपा  रखी  है  मैंने  तुम्हारी ,
दिन  भर  में  ना  जाने  कितनी  बार
उस  खिड़की  की  तरफ  देखता  हूँ -
वो  सूनी  खिड़की  भी  अच्छी  लगती  है .
कम  से  कम  तुम्हारे  आने  का  आस  तो  दिलाती  है ,
फिर  तुम्हारा  इंतजार  ऐसे  करता  हूँ
जैसे  कोई  उल्लू  रात   के  आने  का  इंतजार  करता  हो ,
और  शाम  को  जब  तुम  आती  हो
आँखों  से  आँखे  मिलाती  हो ,
दिल  जैसे  कह  उठता  है  तुम्हारा  ही  इंतजार  था ,
अब  आये  हो  कभी  मत  जाना ,
भले  ही  थोड़े  दूर  हो , पास  आना ,
और  इस  पागल  को  अपना  बनाना .....................

-वीरेश  मिश्र

जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं !

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं
साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।
लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।


- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कभी देखा है ?

कभी  देखा  है  खुले  आसमान  को ?
कभी  कोशिश की  है  उसको  बाँहों  में  भरने  की ? 

कभी  चाहा  है  उसके  जैसा  बनने की , 
कभी  कोशिश  की  है ? 
कभी  देखा  है  सतरंगी  बादलों  को  ?
कभी  बादलों  में  बनाया  है  कोई  पेड़ ? 

कभी  देखा  है  कोई  परवाज  नीले  श्वेत  बादलों  में ? 
कभी  देखा है  सावन  के  काले  बादलों  को ?
कभी  देखा  है  गिरती  हुई  बूंदों  को ?
कभी  भीगा  है  पागलो  की  तरह  उनमे ?

कभी  देखा  है ? 
कभी  देखा  है  सतरंगी  धनुक  को ?
कभी  देखा  है  शफ़क़  को  डालियों  के  सोकों   से  आते  हुए ? 
कभी  कोशिश  की  है  उनको  पकड़ने  की ?

कभी  कोशिश   की  है  तितलियों  से  खेलने  की ? 
कभी  पंछियों  से  बातें  की  है ?

कभी  अपनी  ही  परछाई  को  छोटा  बड़ा  किया  है ?
कभी  मिटटी  के  घरौंदे  बनाये  हैं ?
कभी  खुद  को  समझा  है ???? 
कभी  कोशिश  की  है  ? 
कभी  कोशिश  की  है ? ................

-वीरेश  मिश्र

नींद से जाग जा प्यारे !

नींद से जाग जा प्यारे
धूप अब निकल आई है .
पगों को तोल ले पहले -
आगे कठिन चढ़ाई है .

'परो' से आस्मां ऊँचा रहा
कद अपने घट गए - जाने
कितने दायरों में इंसान बंट गए .
जो पत्थर मील के थे - वो
तो जाने कब के हट गए .

मिली ना नहर मीठी जब
बुझाने प्यास दुनिया कि
हिमालय से चले दरिया - वो
खारे समन्दर में सिमट गए !


-सतीश शर्मा

मै बहता रहा !


पानी  की  सतह  पे  एक  नाव  मैंने  भी  चलाई  थी 
हा  वही   कागज़  की  नाव
बचपन  में  खेलते  हुए
आशा  था  बहुत   दूर  जाएगी
अब  गुज़रे  गए  ज़माने
मै  बह  के  कही  और  आ  गया
पता  नही  उसको  कोई  साहिल  भी  मिला
या  डूब  गई  वो ..................
 
मै  तो  बह  बह  के
न  जाने  कितने  किनारों  पे  ठोकरें   खायी
फिर  भी  बहता  रहा ,सहता  रहा
सिलवटे  भी  पड़ी
थोड़ी सी  मुस्कान  भी  नसीब   हुई
और  मै  बहता   रहा  सहता  रहा ......

-वीरेश  मिश्र

लौटो अपनी राहों पर !

लाश उठाये हैं हम मुर्दा संविधान की कन्धों पर |
शासन की है ज़िम्मेदारी गूंगों, बहरों, अंधों पर ||
लेकर जिसकी आड़ ताज पर डाका डाला चोरों ने,
श्रद्धा और उम्मीद हमारी है ऐसे अनुबंधों पर ||
अपनी नस्ल बदलके हमने ये स्वभाव है ओढ़ लिया,
बनकर के गलीच इतराते फिरते हैं दुर्गंधों पर ||
जिस्म लिए हम इंसानों का पशु से नीचे उतर गए,
शर्म नहीं है हमको अपने ऐसे गोरखधंधों पर ||
गाली देते धर्म - न्याय को हम विकास के दावों में,
सिद्धांतों की जगह तर्क के कब्ज़े हैं प्रतिबंधों पर ||
जिनके खुद के चाल - चलन हैं अपराधों से सने हुए,
वे समाज को भाषण देते नैतिक - नीति निबंधों पर ||
गौरव-मान नहीं हैं अब गुण, हैं अब विष के प्याले ये,
जान - प्राण लुटते हिरणों के कस्तूरी की गंधों पर ||
सुन्दरता अभिशाप आज है, संकट सी कोमल काया ,
भंवरों नहीं भेड़ियों की हैं नज़रें आज सुगंधों पर ||
कर्तव्यों को छोड़ भागना सीख लिया अधिकारों पे,
ध्यान हमारा है अब केवल खुद के लिए प्रबंधों पर ||
आओ-आओ ! बदलो-बदलो ! लौटो अपनी राहों पर,
और न अब विश्वास करो तुम मुर्दों और कबन्धों पर ||

रचनाकार - अभय दीपराज
टीप- कबन्ध - एक एक सिर कटा राक्षस था |

ले लो कंघा (बाल कहानी) !

बहुत समय पहले की बात है I एक बुढ़िया  गाँव के बाहर एक झोपड़ी मे रहती थी I उसके घर के पास ही एक नदी बहती थी,जिससे वह पानी भरती,और झोपड़ी के बाहर ही उसने खाली जगह पर कुछ फल और सब्जियों के पेड़ लगा रखे थे I इन पर आने वाले फलों को गाँव मैं बेचकर वह अपनी जीविका चलाती थी I सुबह रोज गाँव जाने से पहले वह अपना चेहरा नदी में जाकर धोती थी , और पानी में देखकर अपने बाल सँवारती थी क्योंकि उसके पास आइना नहीं था I   

               एक दिन रोज की तरह जब वह नदी किनारे बैठकर अपने बाल ठीक कर रही थी,तो अचानक पानी में,बहुत तेज हलचल हुई और उसमे से एक बहुत बड़े दैत्य ने अपना सर निकाला I बुढ़िया तो उसकी बड़ी बड़ी आँखें और खड़े बाल देखकर डर के मारे थर थर काँपने लगी I दैत्य उसे देखकर बोला-" तुम्हें मुझसे डरने की कोई जरुरत नहीं  है I मैं तो तुमसे केवल यह प्रश्न पूछने आया हूँ  कि तुम रोज इस नदी में अपना चेहरा देखकर क्या करती हो ?

बुढ़िया  डरते हुए बोली-" मैं इस कंघे से अपने बाल ठीक करती हूँ  I मैं बहुत गरीब हूँ  और आईना खरीदने के मेरे पास पैसे नहीं बच पाते है I "

दैत्य आश्चर्य से बोला-" तो क्या इस कंघे से मेरे बाल भी ठीक हो जायेंगे ?"

"हाँ-हाँ,बिलकुल हो जायेंगे I कहते हुए बुढ़िया  ने उसे कंघा पकड़ा दिया I

दैत्य ने भी कंघे से अपने खड़े बालों को संवारा और पानी में अपना चेहरा देखकर खुश हो गया I वह चहकते हुए बोला-"तुम यही रुकना , मैं अभी आया I "

और वह पानी के अन्दर चला गया I कुछ ही देर बाद वह मुट्ठी भर हीरे लेकर आया और बुढ़िया से बोल-" तुम मुझे कंघा दे दो और ये सारे हीरे ले लो I "

बुढ़िया की आँखें हीरों की चमक से चौंधियां गई I

               उसने कभी सपने में इतने हीरों के बारे में नहीं  भी नहीं सोचा था ,ना ही कभी इतने हीरे देखे थे I पर फिर भी हीरे देखने के बाद उसके मन में हीरों के प्रति कोई लालच नहीं था I इसलिए वह सरलता से बोली-"मुझे ये हीरे नहीं चाहिए I तुम ये कंघा यूं ही ले लो I मैं बाज़ार से दूसरा कंघा ले लूंगी I "

               दैत्य उसका भोलापन और ईमानदारी देखकर बहुत खुश हुआ I उसने कहा--"नहीं, यह तो तुम्हें रखने ही पड़ेंगे I इससे तुम अपनी बाकी जिंदगी आराम से गुज़ारना I मुझे जब भी बुलाना हो तो तीन बार "आ जाओ,आ जाओ" कहना , मैं आ जाऊँगा I बुढ़िया  की आँखों में ख़ुशी के आँसूं आ गए I वह हीरे लेकर अपने घर चली गई I बुढ़िया ने कुछ हीरे बेच दिए और आराम से एक बड़े घर में अपने नौकर -चाकरों के साथ रहने लगी I पर उसकी पड़ोसन,जो बहुत चालाक और झगड़ालू थी,उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि बुढ़िया अचानक इतने एशो आराम से कैसे रहने लग गई I

               एक दिन जानबूझकर वह फटे-पुराने कपड़े पहनकर उदास चेहरा लेकर बुढ़िया के पास जा पहुंची और बोली-" चाची,हमारा सब कुछ कल रात चोर लूटकर ले गए,अब तुम्ही मुझे कोई  रास्ता बताओ I "

         इतना कहकर वह फूट-फूटकर रोने का अभिनय लगी I

               बुढ़िया बोली-" तुम चाहो तो मेरे साथ आकर रह लो I "

               पर पड़ोसन को तो बुढ़िया के पैसो का पता लगाना था I इसलिए उसने कहा-" नहीं चाची,जैसे तुम्हारे पास इतना धन आया ,अगर तुम हमें बता दो ,तो हम भी वैसे ही मेहनत कर लेंगे I "

               बुढ़िया हँसते हुए बोली-"अरे ,यह तो एक दैत्य की मेहरबानी है I " और यह कहते हुए उसने सारी कहानी पड़ोसन को बता दी I

पड़ोसन ने कहा-" अच्छा चाची,तो मैं अब चलती हूँ I "

               और यह कहकर वह बुढ़िया के घर से अपने घर की तरफ भागी I घर पहुंचकर उसने सारी बातें अपने पति को बता दी I उन दोनों ने आपस में सलाह की और फिर उस औरत ने आँखें नचाते हुए कहा-" जब काकी के पास आईना नहीं था तो दैत्य ने उन्हें इतने सारे हीरे दिए,अगर हमारे पास कंघा भी नहीं होगा तो हमें ज्यादा हीरे मिलेंगे I "

               पति बोला-" हम उसे अपने सारे गहने और पैसे भी दे देंगे ताकि वो हमें ज्यादा हीरे दे I "

और वे दोनों तुरंत तैयार होकर अपने बाल बिखेरकर नदी किनारे गए और सारा दिन नदी में देखकर बाल ठीक करते रहे I.

जब शाम होने लगी तो वे नदी में देखकर तीन बार बोले-" आ जाओ "

यह कहते ही पानी में हलचल हुई और दैत्य बाहर आ गया I

               दैत्य ने पूछा -" तुम लोग कौन हो ?.और इस तरह से पूरे चेहरे पर बाल क्यों बिखराए हो ? "

पत्नी उदास सा चेहरा बनाकर बोली -" चाची ने हमें तुम्हारे बारे में बताया I हमारे पास भी कंघा और आईना नहीं  है I."

यह सुनकर दैत्य कुछ सोचने लगा I.

तभी पति दैत्य को गहनों की पोटली देते हुए बोला- " हम तुम्हें देने के लिए यह उपहार लाये है

दैत्य बोला-" मैं तुम दोनों से बहुत खुश हूँ I पहली बार मुझे किसी ने कोई उपहार दिया है I"

पत्नी आवाज़ को मधुर बनाते हुए बोली- "आपकी जो इच्छा हो वही दे दीजिये I'

दैत्य बोला -" ठीक है, मैं आज तुम दोनों को अपनी सबसे प्रिय वस्तु दूंगा I"

और यह कहकर वो पानी के अन्दर चला गया I

दोनों पति पत्नी ख़ुशी से नाचने लगे I

पति बोला-" लगता हैं हमारे लिए कोई मूल्यवान वस्तु लाने गया है I"

पत्नी उत्साहपूर्वक बोली-"हाँ,अब तो हम राजा से भी अमीर हो जायेंगे I"

तभी दैत्य पानी से बाहर आया और बोला-" अब तुम दोनों अपनी आँखें बंद करके हाथ आगे करो I."

दोनों ने झटपट अपनी आँखें बंद करके दोनों हाथ फैला दिए I

दैत्य बोल-" दोस्तों,अब मैं यहाँ से हमेशा के लिये जा रहा हूँ I

इसके बाद जैसे ही उन दोनों ने अपनी आखें खोली तो उनके हाथ में चाची का वही पुराना कंघा था I

दोनों वहीँ बैठकर दुःख के मारे फूट फूट कर रोने लगे I ज्यादा धन कमाने के लालच में जो कुछ भी उनके पास था,उससे भी हाथ धो बैठे I लालच नहीं करने का सबक पाकर वे मेहनत  मजदूरी करके अपना जीवन यापन करने लगे I


-डॉ. मंजरी शुक्ला

देखो वो जगाकर सो गई !


ज़िन्दगी के साथ मौत रो रही है 
भाई के साथ हर बहन रो रही है
भगत सिंह तुम्हारा भारत बदल गया
सत्ता के हांथों फिर कतल हुआ
एक बेटी को जीते जी मार डाला
मतलबी सत्ता का दाल गला डाला
हर शहर हुआ अब जलियावाला
देश जला रहा खुद ही रखवाला
मौत हर अब करती सबका पीछा
पहले तो ऐसा ना भारत दिखा
इज्जत की बात नहीं है
बेशर्मी की हर हद तो देखो
जो चला गया वो पूजा जाये
जो जिन्दा रहा वो मारा जाये !!

भारत एक छोटा सा बच्चा है
बस एक झुनझुना चाहिए
सत्ता चलने के लिए नेताओं को,
फिर एक मासूम खिलौना चाहिए
माँ भारती माँ भारती माँ भारती ,
तुझे समर्पित शहीद दामिनी की
चीख पुकार भरी पावन आरती !!

ओ माँ ! तू शेर जननी है
 हम तेरे आँचल की शान बढ़ाएंगे
विश्व गुरु फिर भारत को बनायेंगे
मात्री शक्ति भारत में नारीत्व जगायेंगे
फिर हम भी एक दिन सो जायेंगे
मौत की रात में हम खो जायेंगे
तमाशाई दुनिया तमाशा बनायेंगे
कुछ स्नेह की प्रीत गुनगुनायंगे
 कुछ भारत के गीत बन जायंगे
पर आज ज़िन्दगी की रीत टूटी है
अब भारत से किस्मत रूठी है
 बिश्मिल तुम फिर वापस आओ
भारत के रावनो से यह देश बचाओ !!

तुम्हारी बहनों की आन दावं पर
भारत बिक रहा देखो थोक भाव पर
तुम्हे भारत की माटी की कसम ,
फिर मोहन का वृन्दावन लायेंगे
राम राज्य की अयोध्या सजायेंगे
फिर कोई ज़िन्दगी न जुदा होगी
अपनी इज्जत की माटी से !!

देखो वो जगाकर सो गई
फिर यह शोर शराबा कैसा है
मीलों लम्बी ख़ामोशी है
इज्जत अब बर्बाद हुई है
दामिनी संग तेरी भारत माँ
आज फूंट फूंट कर रो रही हैं

यह कविता क्यों ? दर्द भरे आंसुओं में भींगी हुयी लेखनी से सत्ता की आंच पर तड़प रही शहीद दामिनी को समर्पित उसकी अपनी माटी भारत से !वन्देमातरम .अरविन्द योगी

नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन।

नूतन भाव की सौरभ से सुरभित हो अन्तर्मन उपवन।
शुभागमन हो मंगलमय, नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन।
घन विषाद के घटे, मिटे अवसाद, कष्ट किंचित न रहे।
हर्ष और आह्लाद से मानस कोई भी वंचित न रहे।
नव आयामी हो आशाएँ नभ छूती अभिलाषा हो।
सृष्टि में साकार स्वयं सुख की सच्ची परिभाषा हो।
किलकारी में परिवर्तित हो कहीं नहीं गूंजें क्रन्दन।
शुभागमन हो मंगलमय, नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन।
विश्वगुरु की पदवी पाकर गर्वित फिर हो भारतवर्ष
सोने की चिड़िया बनकर फिर छू ले उन्नति का उत्कर्ष।
पूरब फिर से पाठ पढ़ाए, पश्चिम झुककर नमन करें।
सकल सृष्टि की शंकाओं का हिन्द सभ्यता शमन करें।
नवल रूप में प्राप्त करें हम पुनः पुरातन वो वन्दन।
शुभागमन हो मंगलमय, नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन।
सकल विश्व हो गेह नेह का, स्वरित ध्वनित सुर सरगम हो।
धरती से नभ तक लहराता प्रेम भाव का परचम हो।
हो विनष्ट पथभ्रष्ट प्रवृत्ति, संचारित संस्कार रहें।
मानव मन में मानवता की सदा सदा जयकार रहें।
नहीं अपेक्षा अधिक और कुछ, यहीं अपेक्षित परिवर्तन।
शुभागमन हो मंगलमय, नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन।
- मंजरी शुक्ला

गीत मेरे !

गीत मैंने लिख दिया -
देगा तुझे सुर कौन - अब
मैं सोचता हूँ - गीत मेरे .

सुर तुम्हारे - मीत मेरे
गूंज जाए - दूर तक
ऐसे सदा में -
सुन चितेरे गीत मेरे .

फिर लगेंगे - दूर तक
अपने ये फेरे - गीत मेरे
चल सुना दे भाव - भक्ति
निबल बाहों में भरी
अकूत शक्ति - गीत मेरे .

चल अचल - नभ
और सागर - थल .
हर जगह - लग जाएँ
तेरे जैसे डेरे - गीत मेरे .

मैं डरा हूँ - विप्लवों की
तान से - और तेरे
मान से सम्मान से - सुन
गीत मेरे .

अब नहीं चिंता - की
कोई तान छेड़े - गान छेड़े
या विवशता में गुनगुनाये -
गीत मेरे .

जुगनुओं की चमक से
खुद को जलाए - साथ
ना दे या की - तेरे
साथ आये - गीत मेरे !
- सतीश शर्मा