Friday, June 22, 2012

जो अम्मा ने थमाई थी !

सुनो मैंने आज भी सहेज कर रखा है
वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी
घर छोर कर आते हुवे
तुम्हारे लिए अगाध विश्वास
सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार
संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक
बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक
तितली के रंग ,इतर की शीशी
कुछ कढाई वाले रुमाल
सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते
जब तुम थक जाओगे
मैं इस्सी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी
जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुवे
वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे
अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ....डॉ सुधा उपाध्याय

कौन हूँ मैं ...

नहीं
जानती कौन हूँ मैं ...

रुदाली या विदूषक ,
मृत्यु का उत्सव मनाती ,
बुत की तरह शून्य में ताकते लोगों में संवेदना जगाती
इस संवेदन शून्य संसार में मुझी से कायम होगा संवाद
भाषा की पारखी दुनिया में मैं तो केवल
भाव की भूखी हूँ .....
फिर फिर कैसे संवाद शून्य संवेदन में भर दूं स्पंदन .....डॉ सुधा उपाध्याय

तुम्हारे बगैर !

अम्मा
मेरी हर वो जिद नाकाम ही रही

जो तुम्हारे बिना सोने जागने उगने डूबने
बुनने बनाने बड़े होने या....
सब कुछ हो जाने की थी

अब जैसे के तुम नहीं हो कहीं नहीं हो
कुछ नहीं हो पाता तुम्हारे बगैर

नींदों में सपनो का आना जाना
जागते हुवे नयी आफत को न्योता देना
चुनौतियों को ललकारना
अब मुनासिब नहीं ....डॉ सुधा उपाध्याय

उपेक्षा !

जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज
भौर से संध्या तक
भटकता - झुलसता रहा ,
कोण बदल बदल कर,
देखता रहा धरा को,
शायद कही ....
छाँव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
प्यार-छांह-पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि ना दी आभार में,
हर कोई उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ने झाँका तक नहीं
सूरज क़ी ओर,
उपेक्षा क़ी आग लिए सीने में
जलाता रहा दिन भर,
जब घिन्न आने लगी
थोथे स्वार्थी संबंधों पर
डूब मरा समंदर में जाकर कही
और रात ..........
फिर से गर्भवती हो गई

* विनय के. जोशी

उफ! ये सोच।

सोचते-सोचते…
दिमाग की नसें फूल गई हैं
ये भूल गई हैं सोना
साथ ही भूल गई हैं
सोते हुए ‘इस आदमी’ को
सपने दिखाना
रात-दिन बस एक काम
सोचना...सोचना...सोचना
विचार की सूखी-बंज़र धरती को
खोदकर पानी निकालने की कोशिश में
पता है…
हर रोज़ तारीख़ें ही नहीं बदल रही
बहुत कुछ बदल रहा है....

कुछ पहचान वालों की
उधार बढ़ती जा रही है
और उधार देनेवालों की फेहरिस्त भी
कुछ पहचानवालों की
बेचैनी बढ़ गई है...
वो अनजान बन जाने के लिए
बेचैन हो उठे हैं....
और दिमाग है
कि कमबख़्त सोचता जा रहा है...

पेट की आग कुरेदती है...
तो भूख सोचती है..
पहचानवालों की उधार से
ये आग बुझ जाती है
तो फिर दिन सोचता है...
रात सोचती है
प्राइवेट नौकरी की मार सोचती है
बॉस की फटकार सोचती है..
बेगार सोचता है…
फटी जेब का फटेहाल सोचता है

एक आम आदमी का दिमाग
इक्कसवीं सदीं में भी…
बा-ख़ुदा !!!
क्या-क्या जंजाल सोचता है???

Thursday, March 29, 2012

देगा तो कपाल,क्या करेगा गोपाल? (छतीसगढ की एक लोककथा)

दो मित्र थे। एक ब्राह्राण और दूसरा भाट। भाट ने एक दिन अपने मित्र से कहा, “चलो, राजा के दरबार में चलें। यदि गोपाल राजा खुश हो गया तो हमारे भाग्य खुल जायेंगे।”
ब्राह्राण ने हंसकर उसकी बात टालते हुए कहा, “देगा तो कपाल, क्या करेगा गोपाल ? अर्थात जो कुछ हमारे कपाल/मस्तक यानि भाग्य में लिखा होगा, वही मिलेगा।”
भाट ने कहा, “नहीं, देगा तो गोपाल, क्या करेगा कपाल ! गोपाल राजा बड़ा दानी है, वह हमें अवश्य बहुत सारा धन देगा।”
दोनों में इस प्रकार विवाद होता रहा और अंत में गोपाल राजा के दरबार में जाकर दोनों ने अपनी-अपनी बात कही। भाट की बात सुनकर राजा प्रसन्न हुआ।जबकि ब्राह्राण के वचन की सुनकर उसे क्रोध आया। उसने दोनों को दूसरे दिन दरबार में आने की आज्ञा दी।
दोनों मित्र दूसरे दिन दरबार में पहुंचे। राजा की आज्ञा से उसके सिपाहियों ने ब्रह्राण को एक मुटठी चावल तथा एक मुटठी दाल और कुछ नमक दे दिया। भाट को एक सेर चावल, एक सेर घी और कद्दू दिया। राजा के आदेश से कद्दू में सोना भर दिया गया। राजा ने कहा, “अब जाकर बना खा लो। शाम को फिर दरबार में हाजिर होना।”
दरबार से चलकर वे नदी किनारे के उस स्थान पर पहुंचे, जहां उन्होंने रात बिताई थी। भाट मन ही-मन सोच रहा था-“न जाने क्यों, राजा ने ब्राह्राण को तो दाल दी, और मुझे यह कद्दू दे दिया। इसे छीलो, काटो और फिर बनाओ इसकी सब्जी। कौन करे इतना झंझट ? ऊपर से यह भी डर है कि कहीं इसे खाने से फिर से कमर का पुराना दर्द न उभर आए।” ऐसा सोचकर उसने ब्राह्राण से कहा, “मित्र, कद्दू खाने से मेरी कमर में दर्द हो जायेगा, इसे लेकर तुम अपनी दाल मुझे दे दो।” ब्राह्राण ने उसकी बात मान ली। अपना अपना सामान लेकर दोनों खाना बनाने में जुट गये। भाट दाल चावल खाकर एक आम के पेड़ के नीचे सो गया। ब्राह्राण ने जब कद्दू काटा तो उसे वह सोना दिखाई दिया, जो राजा ने उसमें भरवा दिया था। उसने मन ही मन सोचा, “मेरे भाग्य में था, मेरे पास आ गया।जबकि राजा तो इसे भाट को देना चाहता था, उसने सोना एक कपड़े में बांध लिया। कद्दू का आधा भाग बचाकर आधे की सब्जी बनाई ओर खा पीकर आराम से सो गया।
संध्या के समय दोनों मित्र फिर गोपाल राजा के दरबार में पहुंचे। ब्राह्राण ने शेष आधा कद्दू एक कपड़े में लपेटकर अपने पास ही रख लिया था। राजा ने ब्राह्राण की ओर देखकर पूछा,“अब तो मान लिया, देगा तो गोपाल, क्या करेगा कपाल? ”
ब्राह्राण ने आधा कद्दू राजा की ओर बढ़ा दिया और नम्रता से सिर झुकाकर कहा, “नहीं महाराज, देगा तो कपाल, क्या करेगा गोपाल ?”
राजा ने सोचा कि ब्राह्राण सच कह रहा है। ब्राह्राण के भाग्य में सोना था, भाट के नहीं और इसीलिए तो भाट ने अपने हिस्से में आया कद्दू ब्राह्राण को दे दिया। राजा ने कहा, “पंडित जी, तुम्हारा कहना ही ठीक है--देगा तो कपाल, क्या करेगा गोपाल।

Wednesday, March 14, 2012

ओह नन्ही चिड़िया !

ओह नन्ही चिड़िया
जव बहुमंगिला ईमारत के पीछे से
लाल लाल आँखे तरेरता सूर्य
मेरी खिड़की पर झांकता है
तुम पंजो से सलाखे पकड़ कर लटक जाती हो
ओह नन्ही चिड़िया
बालकनी में लगे फूल जब मुस्कान बिखेर देते हैं
बहती बयार में
फूल आगे पीछे ऐसे झूमते हैं
मानो मस्जिद में वच्चे कर रहे हों हफिजा
तुम बच्चो के स्वर में गाने लगती हो
ओह नन्ही चिड़िया
मैं बिस्तेर पर बैठा और तुम रोशनदान पर
तुमसे आँखे मिलते ही मैं बंद कर लेता हूँ अपनी आँखे
इस आशा से कि आँखों पर तुम
दोगी अपना हाँथ / पंजा और
पूँछोगी कौन ?
मैं कहूँगा मेरी बिटिया
ओह नन्ही चिड़िया !

रेवड़ की नदी !

रेवड़ की नदी ,
सतत प्रवाही शाश्वत .
पंहुंच वाले बांस,
गड़रियों के हाथ.
रेवड़ में छिपे कुत्ते,
संचालक के साथ .
हरी घास पर नदी ,
झील सी बिछा दी जाती .
जाओ -
हरी घास चरों,
उन उगाओ,
मेमनें जनो.
हमारे लिए-
भरदों अपने थन दूध से.
जिव्हा लपलपाते

नुकीले दांत चमकाते कुत्ते

नदी को हद में रखते

हांकते, हुडकते,पुचकारते गडरिये

ऊन उतारते,
दूध दुहते.
....
कुत्ते बदलते,
गडरिये बदलते पर,
न बदलती नदी की किस्मत .
रेवड़ की नदी

सतत प्रवाही शाश्वत .
**
-विनय के जोशी

Thursday, January 19, 2012

मशीन लाओ पापा !

अमरीका जाओ या चीन जाओ पापा ।
होमवर्क करने की मशीन लाओ पापा ।

सारा-सारा दिन तो
स्कूल में गुजरता
होमवर्क करने को
समय कहाँ बचता ?
टीचरजी को जाकर समझाओ पापा ।

काम नहीं पूरा हो तो
तो पिटाई झेलो
कोई नहीं कहता कि
जाओ, भाई खेलो ।

सोचो, सोचो, कुछ चक्कर चलाओ पापा ।

- बालकवि रमेश तैलंग जी की एक बाल कविता

Wednesday, January 18, 2012

एक छोटी-सी लड़ाई !

मुझे लड़नी है एक छोटी —सी लड़ाई
एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ
कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा.

मुझे लड़ना नहीं अब—
किसी छोटे क़द वाले आदमी के इशारे पर—
जो अपना क़द लंबा करने के लिए मुझे युद्ध में झोंक देता है.

मुझे लड़ना नहीं —
किसी प्रतीक के लिए
किसी नाम के लिए
किसी बड़े प्रोग्राम के लिए

मुझे लड़नी है एक छोटी—सी लड़ाई
छोटे लोगों के लिए
छोटी बातों के लिए.

मुझे लड़ना है एक मामूली क्लर्क के लिए
जो बिना चार्जशीट मुअत्तिल हो जाता है
जो पेट में अल्सर का दर्द लिए
जेबों में न्याय की अर्ज़ी की प्रतिलिपियाँ भर कर
नौकरशाही के फ़ौलादी दरवाज़े
अपनी कमज़ोर मुठ्ठियों से खटखटाता है.

मुझे लड़ना है—
जनतंत्र में उग रहे वनतंत्र के ख़िलाफ़
जिसमें एक गैंडानुमा आदमी दनदनाता है

मुझे लड़ना है—
अपनी ही कविताओं के बिंबों के ख़िलाफ़
जिनके अँधेरे में मुझसे—
ज़िंदगी का उजाला छूट जाता है ।

- कुमार विकल

Tuesday, January 3, 2012

नन्ही सी परी !

मेरे दिल के महलो में, पली नन्ही सी परी
छोड़ के आगन बापू का, पीहर को चले,

खुशियों की पुड़ियों में, बढ़ी नाज़ुक सी कली
कर के पराया इस घर को, उस घर की लाज बने,

गुजरे मेरे अतीत लमहों में, बीती सुखों सी घड़ी
कैसे करू जुदा इस पल को, जिस पल को कभी तू निहार चले,

गिरवी रखे मेरे दुखो में, सजी खुशियों की फूलझड़ी
... तोड़ के ख्वाब बाबुल का, सपने सजाने ससुराल चले..!!

Sunday, January 1, 2012

नए साल की शुभकामनाएं!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं!
...
जांते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएं!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएं!!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएं!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएं!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएं!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएं!

(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

Wednesday, December 14, 2011

सुलझता फितूर !

आसमां का बरसना अभी बाक़ी है...
ज़मीं का उगना बाक़ी है...
बाक़ी है कहानी में कहानी की कहानी...
बात की बात करनी बाक़ी है...
क्या-क्या गुज़र चुका है अब तलक़....
क़तार में खड़ा बाक़ी अभी बाक़ी है...
वक़्त के कठघरे में वक़्त की पेशी बाक़ी है ...
और ख़त्म होने से पहले
अंजाम भी अपना अंजाम देखना चाहता है...
ये ख्वाहिशों की ख्वाहिशें कभी पूरी हो सकेंगी...
या रह जाएगी बाक़ी दास्तां हर कहानी की...

Saturday, December 10, 2011

उपेक्षा !

जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज
भौर से संध्या तक
भटकता - झुलसता रहा ,
कोण बदल बदल कर,
देखता रहा धरा को,
शायद कही ....
छाँव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
प्यार-छांह-पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि ना दी आभार में,
हर कोई उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ने झाँका तक नहीं
सूरज क़ी ओर,
उपेक्षा क़ी आग लिए सीने में
जलाता रहा दिन भर,
जब घिन्न आने लगी
थोथे स्वार्थी संबंधों पर
डूब मरा समंदर में जाकर कही
और रात ..........
फिर से गर्भवती हो गई
*
विनय के.जोशी

दुनिया बदल रही है....

खुद से टकराया
गिरा
और मर गया
मौत अजीब थी
लेकिन
आगे की दास्तां और भी अजीब है
अपने ही लाश के पास बैठा
वो शख़्स देर तलक़
फूट-फूटकर रोता रहा...रोता रहा
और जब थक गया
तो
उसका जनाज़ा सजाने लगा
फिर कब्र खोदा
और ख़ुद की लाश को
दफ़न कर दिया
आंखों में सूनापन लिए
भटक रहा है
इस शहर में
कभी-कभी शहर का शोर
उसके जेहन तक उतरता हो शायद
और धीरे-धीरे
उसकी आंखों से निकला सूनापन
शहर में फैलता जा रहा है
नतीज़ा किसको पता है?
हां कुछ लोग
ज़रूर ख़ुद से टकरा रहे हैं
हां कुछ वैसे ही मरे जा रहे हैं
और अपने कंधों पर
अपनी लाशों को उठाए
शहरवालों की तादाद
गुजरते दिन के साथ
बढ़ती जा रही है
धीरे-धीरे
सूनापन
बढ़ता जा रहा है
जेहन में....शहर में... हर कहीं
कहते हैं...
दुनिया बदल रही है......