Sunday, January 16, 2011
रचना रहस्य !
जब छोड़ गई नींद भी साथ
उमड़ते-घुमड़ते, बिम्बों के बदल
मानस पटल पर कुछ बने
कविता के सम्बल
और कुछ चित्र कमल-दल
मैं निरंतर
सोचता रहा पल-पल
क्यों न केवल
करूँ चित्र सृजन
पर शब्दों में उलझा मन
सोचता रहा पल-पल
लगा न क्षण भर
कविता बन गई चित्रवत
चित्र बन गए कवितावत
बांध गए दोनों लयबद्ध
भेद मिट गया दोनों का
दोनों बन गए परम-तत्त्व
सृजन तत्त्व का खुला रहस्य॥
- रवीन्द्र नाथ कुशवाहा
Saturday, January 15, 2011
Friday, January 14, 2011
इतना भी काफी है !
इस तथ्य की उपेक्षा कर
यथा संभव जीते ही जाना,
आज के वक़्त में
इतना भी काफी है।
सड़क जाम में एम्बुलेंस
जीवन मृत्यु का संघर्ष
छटपटाता हुआ शासन-तंत्र
हालत मात्र गंभीर
इतना भी काफी है।
जूठे बर्तन, ईंट-बालू, धुआं
इनमें सना देश का भविष्य,
संविधान भी प्रावधान है
बाल श्रम निषेध
इतना ही काफी है।
अपने मूर्ति रूप में आराध्य
अनेकों "राधा-कृष्ण" की लाशें,
उन्ही मोहल्लों में दोबारा
प्रेम पनपा है
इतना ही काफी है।
मित्रता - प्रतियोगिता का द्वंद्व
वासना का बेईमानी से षणयंत्र,
चंद टुकड़े बेईमानी ही सही
जीवन सफल है
इतना ही काफी है।
- स्मिता पाण्डेय
Thursday, January 13, 2011
टेक्नोलाजी का इस्तेमाल करें और अपना भविष्य बनायें बेहतर।
आखिर में में यह भी बताना चाहूँगा कि उसके पास १५ लाख रुपये के दो माकान हैं और उसके बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढतें हैं जो क्रमशः आठवीं और दसवीं में पढतें हैं। मेन बाजार में उसकी सब्जियों कि दो दुकानें हैं, लेकिन वह स्टेशन के पास स्थित इस जगह से अपनी दुकान हटाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि इससे वह उन मुसाफिरों से जुड़ा रहता है, जो यहाँ से रोज गुजरतें हैं और इसी उपनगर के रहवासी भी हैं। राजू की सफलता को कह सकते हैं कि वह एक ही ग्राहक से अधिक मुनाफा कमाने के बजाय हमेशा ऐसे ग्राहकों के बारे में पहले सोचता है जो कीमतोऐन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। अपने इसी खूबी और टेक्नोलोजी के सही इस्तेमाल कि वजह से वह लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। आप भी टेक्नोलोजी के इस्तेमाल और अपनी सूझ-बूझ से मुनाफा कमाते हुए अपना भविष्य बना सकते हैं।
Wednesday, January 12, 2011
आंखें भी वही हैं दरीचा भी वही है।
और मन के आँगन में उतरता भी वही है
जिसने मेरे जज्बों की सदाक़त को ना जाना,
अब मेरी रफाकात को तरसता भी वही है ,
इस दिल के खराबे से गुज़र किस का हुआ है,
आँखें भी वही है होंट भी लहजा भी वही है
जो कुछ भी कहा था मेरी तन्हाईयों ने मुझसे,
इस शहर की दिवार पे लिखा भी वही है,
वह जिस ने दिए मुझ को मुहब्बत के खजाने,
बादल की तरह आँख से बरसा भी वही है,
साथ निभाने की कसमें खाई थी जिसने,
उम्र भर का गम दे के गया भी वही है......!
लकीरें।
पीस-पीस के लगाया
हथेली पर
बुझती हुई रात का,
जलता हुआ चाँद।
एक टुकड़ा उल्काओं का गिरा आँगन में तभी
कोई सन्देशा
वहीं लॉन पर छपा पाया
चाँद हथेली से माँगा,
काइनात ने मुझसे
बड़ी मुश्किल से कुरेदा और लौटा दिया
इसी कोशिश में
चमड़ी भी उतर गई कहीं
कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।
- अनिल जीगर ’फ़राग़’
खिलखिलाए
दो बूँद आंसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गए और खिलखिलाए।
साजिस थी इक,
सूर्य को बंदी बनाने के लिए
जंजीर में कैद किरणें
तमस लाने के लिए
नादान मेढक हुए आगे,
राह इंगित कर रहे
कोशिशों में जुगनुओं ने चमक दी और पर हिलाए,
देखकर नन्हे शिशु पगला गए और खिलखिलाए।
बादलों के पार,
बेचैनी भरी मदहोश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि क्यों न रोक पाई दिल कि धड़कन,
भाव व्याकुल हो तड़ित सा,
काँप जाता तन-बदन
मधुर आमंत्रण दिए,
निःशब्द होठों को हिलाए
देखकर रूठे सनम पगला गए और खिलखिलाए।
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता,
फैल जाता ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस,
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए।
अब तेरे शहर से कोई नामवर नहीं आता।
मेरे जनाजे में ऐसा कारवां नहीं आता,
तू था तो हर्फ़-हर्फ़ इबादत था
तेरे बिन दुआओं में भी असर नहीं आता,
कभी हर राह की मंजिल थी तेरी गली
अब तेरे शहर से कोई नामवर नहीं आता,
एक आंसू नहीं बहाने का वादा था
निभाया, अब लहू आता है अश्क नहीं आता,
मेरे दिल के दर्द, रूह के सुकूँ
जान जाती है मेरी तू नजर नहीं आता,
अब तेरे शहर से कोई नामवर नहीं आता।।
Friday, December 17, 2010
रमकलिया की जात न पूछो !
कहाँ गुजारी रात न पूंछो
नाक पोंछ्ती, रोती गाती
धान रोपती, खेत निराती
भरी तगारी लेकर सिर पर
दो-दो मंजिल तक चढ़ जाती
श्याम सलोनी रामकली से
कोठे की रमकलियाबाई
बन जाने की बात न पूंछो।
बोल-चल में सीधे-साधे
लेकिन मन में स्याह इरादे
खरे-खरों की बातें खोटी
अंधियारों में देकर रोटी
आटे जैसा वक्ष गूंथने-
वाले किसके हाथ न पूंछो।
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई
हों या ना हों भाई-भाई
रमकलिया पर सबकी आँखें
सभी एक बरगद की शाखें
इस बरगद की किस शाखा में
कितने-कितने पात न पूंछो।
रोज-रोज मरती जी जाती
आंसू पीकर भी मुस्काती
रमकलिया के बदले तेवर
नई साड़ियाँ, महंगे जेवर
बेचारी क्या खोकर पाई
यह महंगी सौगात न पूंछो।
पूछ लिया तो फंस जाओगे
लिप्त स्वयं को भी पाओगे
रमकलिया के हर किस्से में
उसके दुख के हर हिस्से में
अपना भी चेहरा पाओगे
सिर नीचा कर बंद रखो मुंह
खुल जाएगी बात न पूंछो।
रमकलिया तो परंपरा है
उसकी कैसी जात-पांत जी
परंपरा में गाड़े रहिये
अपने तो नाखून, दांत जी
सोने के हैं दांत आपके
उसकी तो औकात ना पूंछो।
रमकलिया की जात न पूंछो
कहाँ गुजारी रात न पूंछो।
Tuesday, November 16, 2010
भि़क्षुक
वह आता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता ।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी – भर दाने को – भूख मिटाने को
मुँह फ़टी पुरानी झोली का फ़ैलाता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता ।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फ़ैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया- दृष्टि पाने की ओर बढाये ।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता – भाग्य – विधाता से क्या पाते ? –
घूँट आसुओं के पीकर रह जाते ।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़्क पर खड़े हुए,
-- सुर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’
अरविन्द चौहान के हाइकु !
gaulamaaohr pr ha[-ku
1 gamaI- baohala
gaulamaaohr Ca^va
SaItla baahoM
2 Qara BaBakI
do SaItla qapkI
gaulamaaohr
3 CtrI GanaI
hrI AaOr laala saI
hro vaao gamaI-
4` h^sato fUla
gaulamaaohr kho
kha^ hO gamaI-
5 piqak hara
gaulamaaohr tlao
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6 gaulamaaohr
do paz jaIvana ka
SaItla banaao
7 laala laala saI
Paa^t lagaI Anant
gaulamaaohr
8 barsao riva
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9 Clako laalaI
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SaItla Ca^va
10 QaUla gaubaar
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11 fUla laala sao
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12 CIMTo hOM laala
rMga gayaa hO mana
फूलों का गजरा !
बहना, तेरी चोटी में
फूलों का गजरा ।
फूलों के गजरे ने
घर-भर महकाया,
बतलाना, बतलाना
कौन इसे लाया ?
साँसों में छोड़ गया
ख़ुशबू का लहरा ।
गजरे में फूल खिले
बेला-जुही के,
आँखों में तेरी हैं
आँसू खुशी के,
चेहरे पर बिखरा है
जादू सुनहरा ।
तुझ पर ही नज़रें हैं
छोटे-बड़ों की,
बात हुई बहना,
आज क्या अनोखी ?
क्या इसमें है कोई
राज बड़ा गहरा ?
- रचनाकार: रमेश तैलंग
और नहीं तो थोड़ा सा मुस्कुराया कर !
कभी-कभी तो मेरे घर भी आया कर।
तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।
औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर।
लोग देखकर मुंह फेरेंगे झिड़केंगे,
सरेआम ग़म का बोझा न ढोया कर।
वक़्त लौट कर चला गया दरवाजे से,
ऐसी बेख़बरी से अब न सोया कर।
मैंने तुमसे कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं,
और नहीं तो थोड़ा सा मुसकाया कर।
नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर तो कुछ पछताया कर।
रात-रात भर तारे गिनते रहते हो,
चैन मिलेगा मेरी ग़ज़लें गाया कर।
इन्द्रधनुषी सपने !
जब खो जाती हैं आशाएं,
शाम के सुरमई अंधेरों में,
जब मन देता है सदायें,
तो चन्द्र-किरणों के रथ पर हो सवार,
लिए झिल-मिल तारों की सौगात,
रुपहली-सुनहरी यादों के सिरहाने बैठ,
आँखों के कोरों से बहते टप-टप,
आँसुओं से भीगी चादर हटा कर,
अपनी प्रेम ऊष्मा से आलिंगन कर,
मन में छिपे किसी अतीत की याद में,
अल्हड़ स्मृतियों में चंचलता भर कर,
आकांक्षाओं का संसार सजा जाते हैं,
ये सपने, इन्द्रधनुषी सपने.
धुंधली राहों में जब खो जाते हैं अपने,
तो स्वप्निल नयनों में अश्रुकण झलकाते,
कभी अंतस के गहन अवचेतन में,
आशाओं के दीप जलाते,
मन के उजले आँगन में,
रंग-बिरंगे रंग सजाते...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने.
कुछ मूक प्रश्न, कुछ अनुत्तरित प्रश्न,
बसे अन्तस्तल में खोजते उत्तर,
बंद पलकों में, मौन नयनों के भीतर,
चित्रलिपि की भाषा में शब्द बाँचते,
अनसुलझी पहेलियाँ सुलझाते और...
कभी भविष्यवेत्ता बन कर और भी
रहस्यमय बन जाते...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने.
अंतस के तम को हरते,
कभी हँसाते,कभी रुलाते,
कभी जिज्ञासु मन के कौतूहल पर,
मंद-मंद मुस्काते ...ये सपने.
सत्य-असत्य की सीमारेखा पर,
छोड़ जाते अवाक मन...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने....
- शील निगम
