Saturday, March 26, 2011

कुछ तो बोलो दोस्त !

जैसे कि सबकुछ पहले से तय था
एक- एक पात्र ने जैसे रटा हुआ था...
अपना-अपना संवाद
अपना-अपना किरदार
साफगोई से...
पूरे वक्त पर, सबने निभाई थी अपनी जिम्मेदारी
पूरे अदद से
अदना-कदना, औने-पौने सबने
हां, सबने तकरीबन छीले थे मेरे ज़ख्म
जैसे कि नीयति का साथ देने के लिए बाध्य हों सबके सब
जैसे कि तय था रामायण का घटित होना
राम का वनवास, सीता का धरति में समाहित हो जाना
तय था केतकि का जिद्द करना...
जनक का पुत्रमोह भी तय था
और शायद तय था श्रवण कुमार का मातृ-पितृ सेवा में विघ्न होना
लेकिन ये कौन है जो यूं खेल रहा है
शतरंज जिंदगी का?
पहले से ही क्यों तय होती हैं चीजें?
और अगर तय ही होता है सबकुछ
तो फिर ये भ्रम कौन फैलाता है...
कि करो-करो कर्म करो...
फल मिलेगा...
ये कौन सा कर्म है जो पहले से तय नहीं होता?
बताओ कोई, मैं उधेड़बून में हूं

नंगे पांव मेरा दोस्त !

पीले रंग की बुशर्ट
और पीले रंग की पैंट
'गरीब'
भूखा, नंगा गरीब
ये आम राय थी लोगों की
लेकिन मेरा दोस्त नंगा नहीं था
ताकिद!
सिर्फ उसके पांव नंगे थे...
वो नंगा नहीं था,
परिस्थितियां थीं जो नंगी थीं,
और नंगा था उसका समाज
जो उसके ईर्द-गिर्द खड़ा था...
जूते वालों का समाज
और इन सबके बीच...
नाचती,ठिठोली करती नंगी थी उसकी किस्मत
कह रहे थे लोग
कैसी किस्मत लेकर आया है...
दिल्ली की चिलचिलाती धूप में इसके पास जूते भी नहीं हैं...
देखो!
शायद देखने वालों ने ये नहीं देखा था
कैसे उसके बापू ने थामी थी उसकी उंगली
और उस भीड़ में कैसे कातर थी उसकी मां की नज़रें
जो लगातार उसके नंगे पांवो को निहार रही थी
कहीं किसी जूते से दब न जाए, इस खयाल में...
कैसे था बदकिस्मत मेरा दोस्त
कैसे था वो भूखा,नंगा गरीब
कैसै...
सिर्फ इसलिए कि उसने नहीं पहने थे
जूते?

चलो दोस्त...

एक सपना जल्दी से बुन लो
सुन लो अपने दिल की बात
ये तुम्हारा वक्त है
आगे बढ़ो, लपक लो
तुम ही होगे कल
हर जगह, हर शिखर पर
उठो, भागो...
कोई है जो तुम्हारा इंतजार कर रहा है
उसके लिए उठो
तुम उठोगे, तो वो दौड़ पड़ेंगे
उनके दौड़ने के लिए उठो
एक सपना खरीदो
सच करो उसको
किसी के लिए तो उठो यार
उठ जाओ...
खटखटाओ ना कोई दरवाजा
खुलेगा..
देखना, जरूर खुलेगा
हर बंद दरवाजे पर ताला नहीं लगा होता
उठो, चलो खोल दो...
उस दरवाजे को खोल दो
जिसके पार जाने का अधिकार सिर्फ तुमको है..
चलो दोस्त
चलते हैं...
आ जाओ....

क्रांति का सूर्य !

प्रस्तुत कविता अनिता निहलानी की है। अनिता की यह "हेरिटेज" पर प्रथम कविता है। उत्तर प्रदेश मे पली बढ़ी अनिता पिछले दो दशकों से असम मे निवास कर रही हैं। इन्होने गणित मे स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। कविताओं की तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और पिछले कुछ समय से इंटरनेट पर लिखने मे सक्रियता भी बढ़ी है।

मैं विद्रोहिणी हूँ !
जो समाज के ढके छिपे व्यापारों को उजागर करना चाहती है
जिससे वह जी सकें, जो मौत की राह देख रहे हैं
मैं संस्कृति और सभ्यता के नाम पर ओढ़ी मानसिकता नहीं हूँ
बल्कि उन्हें कुरीतियाँ और अन्धविश्वास कहने का दुस्साहस !

मैं एक आवाज हूँ !
मानवता के (अमानवीय) ठेकेदारों के बंद कानों के लिये
एक आवाज कारखानों की, खदानों की, हलों-बैलों की
पत्थर तोड़ते मजदूरों की !

मैं मृत्यु हूँ !
तानाशाही दम्भ की, निर्दोषों के खून से सने हाथों की
मैंने सुखद और दुखद क्षण जिए हैं
एक गीत के जन्म और मृत्यु पर
ऐसी मृत्यु जो हजारों का जीवन है !

मेरे जीवित अस्तित्त्व का कोई प्रमाण हो न हो
पर मैं अमर हूँ,
घुमती हूँ बेरोकटोक
मृत्युदन्शी सन्नाटों में
जंगलों के बियाबानों में
क्योंकि मैं एक विश्वास हूँ,
लोलुप शासन के अंत होने का
मेहनतकश वर्ग के फलने फूलने का
जो स्पष्टीकरण चाहता है उनसे
जो सदा से उसके दावेदार रहे हैं
क्योंकि तभी एक नए सूर्य का उदय होगा
क्रांति का सूर्य !

शुभस्ते पंथान:

उसने कहा विनम्र बनो
मैं डरपोक हो गया.
उसने कहा संतोष बड़ा धन है
मैं आलसी और गरीब हो गया.
उसने कहा निडर रहो
मैं असभ्य हो गया.
जब निर्भय होने को कहा
मैं आक्रामक हो गया.
उसने सदा अस्मिता की बात की
मैं अहंकारी हो गया.
उसने कहा चुप रहना अच्छी बात है
मैं गूंगा हो गया.
जब खुल कर बोलने को कहा
मैं अमर्यादित हो गया.
उसने कहा स्पष्टवादी बनो
मैं दिल दुखाने लगा.
उसने समझदार बनाने की सलाह दी
मैं चतुर और चालाक बन गया.
उसने कहा द्रढ़ रहो
मैं जिद्दी हो गया.
उसने कहा काम आराम से करना चाहिए
मैं पूरा सो गया.
उसने कहा विफलता इतनी बुरी नहीं होती
मैंने प्रयास छोड़ दिए, विफलता की आदत डाल ली.
उसने कहा सांप मत बनना
मैं केंचुआ बन गया.
उसने अहिंसा को बड़ा गुण बताया
मैं पत्ता-गोभी बन गया.
उसने कहा भगवान् है
मैं निट्ठल्ला हो गया.
उसने कहा सब कुछ भगवान् थोड़े ही देखता है
मैं चोर बन गया.
वह कुछ कहता रहा
मैं कुछ बनता गया
मैं समझाने लगा
वह माना नहीं.
फिर मुझे भी गुस्सा आ गया
मुझे आदमी ही रहने दो
देवता क्यों बनाते हो
ये दुनियां किताबी बातों से नहीं चलती.
वह रुका और कहा-मैं तो खुद आदमी बनने की राह का पथिक हूँ
आपको देवता क्या बनाऊंगा?
आपने कुछ पूछा जरूर होगा
लेकिन कहा मैंने खुद से है
आपने सुन लिया होगा,
पर अमल तो मुझे करना है
आप जैसे भी हो, प्यारे हो
अपने हिसाब से इंसानियत की राह पर हो.
लेकिन यहाँ से मेरी राह जुदा होती हैं
चाहो तो साथ चलो, क्योंकि मंजिल तो एक ही है
अलग चले तो फिर मिलेंगे
साथ रहे तो साथ हैं ही.
विदा दोस्त! आपके साथ सफ़र बहुत अच्छा रहा
शुभस्ते पंथान:
और वह गुनगुनाता हुआ मुड़ गया.
मुझे जीत की इतनी खुशी नहीं हुई
जितना उसके बिछुड़ने का गम.
सोचा भी चल पडूँ उसी के साथ
या फिर पुकार लूं अपनी ही राह पर.
सोचता खड़ा रहा फिर चल पड़ा अपनी ही डगर.
कानों में अब भी उसकी गुनगुनाहट गूंजती है
जो कोई भजन नहीं था
एक फ़िल्मी गाना था
(ज्योति कलश छलके !!...शायद!)
कभी कभी उसकी याद बड़ी शिद्दत से आती है
उसकी बातें आँखों के सामने मुस्कुरातीं हैं
कभी कभी वह हमराह चलता दिखाई भी देता हैं
पर वो भरम है.
में अपनी बात पे कायम हूँ
उसकी पता नहीं क्या जिद है?
मेरी बला से!!

- अरविंद कुमार पुरोहित

मैं थक गई हूँ..

जब शाम को शांति दफ़्तर से घर पहुँची तो बहुत थक चुकी थी। वो बस खाना खा के सो जाना चाहती थी। अजय को भी आते-आते देर हो गई थी। शाम को एक साथ खाना खाने की योजना में लगातार कोई न कोई विघ्न पड़ता ही रहा है। इस शाम भी दोनों बच्चे शांति के आने के पहले ही खाना खाने का अनुष्ठान टीवी के सामने पूरा कर चुके थे। और मम्मी की किसी भी तरह की फटकार से अपने आप को सुरक्षित करके कल क्लासरूम में टीचर की फटकार से अपने को सुरक्षित करने के लिए होमवर्क करने में जुटे हुए थे। अजय के मन में एक बार आया कि खाने की मेज़ से उठकर एक बार मैच का स्कोर देख ले। फिर उसने शांति की ओर देखा। वो उसी की तरफ़ देख रही थी। लेकिन उन आँखों में आम तौर पर बसने वाली चपलता नहीं थी। वे बोझिल हो रही थीं। शांति ने कहा, ‘बहुत थक गई हूँ..’

‘चलो सो जाते हैं’, कहते हुए अजय ने अपनी प्लेट वाशबेसिन तक पहुँचा दी। और फिर ब्रश करने बाथरूम चला गया। शांति ने भी अपनी प्लेट उठाई और वाश बेसिन में जाकर रख दी। वाश बेसिन में बर्तन गँजे पड़े थे। बहुत समझाने के बाद भी अजय और बच्चे प्लेट में जूठन छोड़ने की आदत में सुधार नहीं ला सके थे। बेसिन में पड़ी प्लेटों की जूठन उनकी चुगली कर रही थी। शांति ने एक-एक प्लेट से जूठन निकालकर बेसिन के नीचे रखी डस्टबिन में डाली। तमाम कचरा डस्टबिन से बाहर गिरा हुआ था। कल कचरा देते हुए किसी को इसे डब्बे में डालने का ख़्याल नहीं भी आ सकता है, यह सोचकर शांति ने उस कचरे को उसका उचित स्थान प्रदान किया। बच्चों ने सब्ज़ी निकालते हुए कुछ चूल्हे पर और कुछ प्लेटफ़ार्म पर भी गिरा दिया था, उसे पोतने से साफ़ किया। चीनी का डिब्बा शायद अजय ने चाय बनाने के बाद कैबिनेट से बाहर ही छोड़ दिया था, उसे अन्दर रखा। दूध भी फ़्रिज के बाहर चूल्हे पर ही छोड़ दिया था। दूध देखकर शांति को याद आया कि दही ख़तम हो गया है, कल के लिए दही भी जमाना होगा। चूल्हे पर रखे दूध को गुनगुना करने के लिए उसके नीचे गैस जला दी। अजय ने बैडरूम से पुकारा, ‘क्या कर रही हो, आ जाओ!’
‘बस आ रही हूँ..’

जब दूध गरम हो रहा था शांति वापस खाने की मेज़ पर आई और अचार के खुली हुई बोतलों को बंद किया, टेबलमैट्स को धुलने की टोकरी में डाला। बची हुई सब्ज़ियों को छोटे डब्बे में बंद करके फ़्रीज के अन्दर रखा। मेज़ पर रखा पपीता थोड़ा सा कच्चा दिख रहा था। कल सुबह अजय को खाने में कच्चा न लगे, यह सोचकर उसे अख़बार में लपेट कर रखा ताकि कल सुबह तक ठीक से पक जाय। बहुत दिनों से बच्चे दोसा खाने की ज़िद कर रहे थे। तो उसके लिए दाल-चावल भिगा दिए। इतना करने के बाद जब दूध के भगोने को हथेली के पिछले भाग से छुआ और तय पाया कि दही के कीटाणुओं के पनपने लायक़ गरम हो गया है तो गैस बंद करके दूध को कटोरे में रखे जामन के साथ अच्छी तरह मिला दिया।

सासू माँ के कमरे दरवाज़ा खोलकर शांति ने उनकी साँस की आवाज़ पर ध्यान दिया। वो सामान्य चल रही थी। वापस अपने बैडरूम की तरफ़ जाते हुए उसने देखा कि टीवी स्टैण्डबाई पर है। उसे प्लग से औफ़ किया। सेन्टर टेबल पर पड़े बासी अख़बार को टेबल तह करके टेबल के नीचे रखा। वहाँ रखे अचरज के जूते उठाये, जूते के बाहर पड़े मोज़े उठाए, उन्हे जूतों के भीतर डाला और फिर ले जाकर जूतों की रैक में रख दिए। अपने कमरे में जाने से पहले एक बार बच्चों को देखने की इच्छा हुई। दोनों बच्चे सो चुके थे मगर लैम्प जला हुआ था। लैम्प बुझाने से पहले शांति ने पाखी के कलम का कैप बंद किया। कौपी और किताबों को करीने से मेज़ पर रख दिया। फ़र्श पर पड़े हुए अचरज के बेब्लेड और बैन्टैन के कार्ड्स को उठा कर उसकी अलमारी में रख दिया। दोनों बच्चों के कपड़े कुछ फ़र्श पर थे और कुछ उनके बिस्तर पर। अचरज का मुँह हमेशा की तरह खुला हुआ था। बहुत कोमल हाथ से उसने अचरज की ठोड़ी को नाक की तरफ़ धकेला लेकिन वो फिर नीचे सरक आई। उस थकान में भी उसे अपने बच्चों पर बहुत प्यार आया। दोनों को बहुत हौले से चूमने के बाद और मैले कपड़ों को अपने हाथ में लेने के बाद ही शांति ने लैम्प बुझाया और दरवाज़ा बंद कर के बाहर आ गई।

‘अरे कहाँ हो?’ अजय की डूबती हुई सी आवाज़ आई।
‘बस आ गई..’ शांति ने इतनी हौले से बोला कि बच्चे भी न जगें और अजय सुन भी ले।

मैले कपड़ों को टोकरी में डालने के बाद दाँतों को ब्रश करते हुए उसे याद आया कि शब्बो के दो मिस्ड कौल थे। उसने एक सांस भरी और अपने ज़ेहन में एक गाँठ बाँधी ताकि उसे कल शब्बों को फोन करना याद रहे। फिर उसे याद आया कि उसके मोबाईल की बैटरी काफ़ी कमज़ोर पड़ गई है। वो भी नई ख़रीदनी है। पाखी एक हैडफोन लेने को कह रही थी। उसके अपने लैपटाप का एन्टीवायरस एक्सपायर कर गया है, उसे रिन्यू कराना है। इसके पहले कि वो सब भूल जाय शांति बाथरूम से निकल कर रसोई में गई और फ़्रिज से लटकते पैड और पेन का इस्तेमाल करके इन तीनों कामों की सूची दर्ज कर दी। जब शांति बैडरूम में वापस आई तो अजय खर्राटे भर रहा था। शांति को अजय के खर्राटों से सख़्त चिढ़ है मगर डरती भी है कि कहीं कोई गम्भीर बीमारी न हो। अगले इतवार को डौक्टर के पास लेके जाना ही होगा अजय को, चाहे वो कितना ही प्रतिरोध क्यों न करे!

यह सोचते हुए शांति ने बैडसाइड टेबल में से पहली एक तरह की क्रीम निकाली और हाथों-पैरों में लगा ली। फिर एक दूसरी क़िस्म की क्रीम निकाली जो चेहरे पर लगा ली और उसके बाद एक छोटा सा डिब्बा निकाला। उसमें तीसरी तरह की क्रीम थी, उसे शांति ने अपनी आँखों के नीचे लगा लिया। लैम्प के बगल में ही उसने अधूरे उपन्यास पर नज़र डाली। ‘नहीं, आज बहुत थक गई हूँ, आज आराम करती हूँ’, यह सोचकर शांति ने उपन्यास से दिलबहलाव का ख़्याल निकाल दिया और लैम्प बुझा दिया। क्योंकि कल सुबह पौने छै पर दूधवाला जगाने ही वाला है।

अभय तिवारी के ब्लॉग निर्मल आनंद से साभार।

अंतिम पत्र !!

भगत सिंह का अंतिम पत्र :

22 मार्च,1931


साथियो,


स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता. मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह

व्यंज़ल !

क्या हुआ जो नहीं मिलता नल का पानी

सर्वत्र सर्वसुलभ तो है बिसलेरी का पानी

टाइटन आई+ का डिजाइनर चश्मा पहन

लोग पूछते हैं कहाँ गया आँख का पानी

किसलिए जाते हो यारों किसी गंगोत्री को

अब पॉलीपैक में मिलता है गंगा का पानी

इन बेशर्म नदियों को बता ही दिया जाए

किसकी यमुना किसका कावेरी का पानी

धोने पोंछने की बातें क्यूं करते हो यारों

यहाँ तो मयस्सर नहीं है पीने का पानी

लोगों की देखा देखी अपने यार रवि ने भी

चढ़ा लिया है अपने ऊपर सोने का पानी

Saturday, March 5, 2011

पुष्पेन्द्र फाल्गुन जी का परिचय


पुष्पेन्द्र फाल्गुन जी नागपुर में रहते हैं। इनकी उम्र मुझसे पांच साल ज्यादा है। येब्लॉग लेखन, साहित्य लेखन तथा पत्रकारिता करते हैं। इनकी एक मासिक पत्रिकाफाल्गुन विश्व हर माह प्रकाशित होती है।

इनसे संपर्क का पता है :- editorfalgunvishwa@gmail।com . इनकी अन्य कविताओं के लिए इनके ब्लॉग
www.pushpendrafalgun.blogspot.com पर लिंक कर सकते हैं।

मुक्ति !

दलहन दरते हुए
सोचती हैं
संजय गनोरकर के
...शिल्प की सारी महिलायें
कि
पुरुष लिंग ही
असल में उनके
समस्त विपदाओं की जड़ है
और यह भी सोचती हैं
कैसे इस जड़ से पाएं
मुक्ति

दलहन दरती हुई महिलाओं को देखकर
मैं सोचता हूँ
कि क्या वे सचमुच
यही सोच रही होंगी....

(संजय गनोरकर अमरावती में रहते हैं और देश के प्रतिष्ठित शिल्पकार हैं।).
- पुष्पेन्द्र फाल्गुन

Wednesday, March 2, 2011

प्यार

तुम्हें प्यार करने के बाद
मैं बाहर आया।

सड़क पर दौड़ते
रिक्शा, कार और
हांफते हुए आदमी को देखा
और वापिस चला आया।

मैं, अभी भी
संतुलित नहीं था,
मेरे हाथ-पांव
अलग होते जा रहे थे।
हर जाना-पहचाना चेहरा
मुझे, अजनबी लग रहा था।

मैं भागा-भागा
चट्टान केपास पहुंचा
उसे सहलाते हुए बताया कि
खिसकना, तुम्हारी नियति है।
मेरे दिमाग में
अभी भी एक कीड़ा
कुलबुला रहा था
झड़बेरी की शाखों पर
लटके गिरगिट और
अमलतास की फलियां
मुझे एक जैसी दिख रही थीं।

मैं तेज घूमती चाक के
पास पहुंचा
और उससे पूछा-
क्या तुम एक छोटी धरती
मेरे लिए नहीं ढाल सकतीं?
मुझे लगता है -
मैं अपनी नहीं
अपने पुरखों की धरती पर
सफर कर रहा हूं।

कीड़े की कुलबुलाहट
और बढ़ रही थी।
मैं भागा-भागा
वापिस लौट आया।
और दीवार के सहारे
खड़ा होकर
सोचने लगा कि
मैंने क्यों कर
तुम्हें प्यार किया।

- आलोक पंडित

हम भारत के लोग !

रातें होतीं कोसोवो सी
दिन लगते हैं
वियतनाम से।
डर लगता है
अब प्रणाम से।

हवा बह रही
चिन्गारी सी।
दैत्य सरीखे हंसते टापू,
सड़कों पर
जुलूस निकले हैं
चौराहों पर खुलते चाकू,

धमकी भरे पत्र
आते हैं कुछ नामों से
कुछ अनाम से।

फूल सरीखे बच्चे
अपनी कॉलोनी में
अब डरते हैं
गुर्दा, धमनी, जिगर आंख का
अपराधी सौदा करते हैं,

चश्मदीद की
आंखों में भय
इन्हें कहां है डर निजाम से।

महिलाओं की
कहां सुरक्षा
घर में हों या दफ्तर में,
बम जब चाहे फट जाते हैं
कोर्ट कचहरी अप्पू घर में

हर घटना पर
गिर जाता है तंत्र
सुरक्षा का धड़ाम से।

पंडित बैठे
सगुन बांचते
क्या बाजार हाट क्या मेले?
बंजर खेत
डोलते करइत
आम आदमी निपट अकेले,

आजादी है मगर
व्यवस्था की निगाह में
हम गुलाम से।

जयकृष्ण राय तुषार

वसंत !

वसंत आ रहा है
जैसे मां की सूखी छातियों में
आ रहा हो दूध

माघ की एक उदास दोपहरी में
गेंदे के फूल की हंसी-सा
वसंत आ रहा है

वसंत का आना
तुम्हारी आंखों में
धान की सुनहली उजास का
फैल जाना है

कांस के फूलों से भरे
हमारे सपनों के जंगल में
रंगीन चिड़ियों का लौट जाना है
वसंत का आना

वसंत हंसेगा
गांव की हर खपरैल पर
लौकियों से लदी बेल की तरह
और गोबर से लीपे
हमारे घरों की महक बनकर उठेगा

वसंत यानी बरसों बाद मिले
एक प्यारे दोस्त की धौल
हमारी पीठ पर

वसंत यानी एक अदद दाना
हर पक्षी की चोंच में दबा
वे इसे ले जाएंगे
हमसे भी बहुत पहले
दुनिया के दूसरे कोने तक।

- एकांत श्रीवास्तव

चश्मा !

चार साल का है मेरा चश्मा
अकसर भूल जाता हूं जिसे
कपटी प्रेमी के
सुनहरे वादे की तरह
रखने लगा उसे
ऑफिस की दराज में
पवित्र प्रेमिका के
अंतिम प्रेम पत्र
की तरह संभालकर
निंदिया रानी रूठ
बैरन बन चली गई बरेली
उसे चाहिए पढ़ने का यंत्र
घर लाने लगा चश्मा
रोज रात साथ
पढ़ने के बाद रखता बैग में
निंदिया रानी
बहा ले जाती अपने देश
मैं देखता सपने रंगीन
बिना चश्मा पहने।

- जीतेन्द्र चौहान

Tuesday, March 1, 2011

पूछो तो !

हरे प्रकाश उपाध्याय हिन्दी की नयी पीढ़ी के संवेदनशील एवं सजग कवि हैं। कविताएँ स्वगत या एकालाप शैली में नहीं हैं। एकालाप या स्वगत शैली में ही कवि सम्प्रेषणीयता का तिरस्कार कर सकता है, इस गुमान में कि वह गहरी बात कर रहा है। गहरी बात कहने वाले शमशेर कहते थे- बात बोलेगी। लेकिन अनेक कवियों की बात बोलती नहीं। हरे प्रकाश गूँगी कविताओं के कवि नहीं हैं। वे पाठकों से सीधे और सीधी बात करते हैं। कविताओं के ज़रिए वे पाठकों को सवाल पूछने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे सवाल जो ऐतेहासिक एवं सांस्कृतिक संवेदना को धार देते हैं। शैली और वाक्यों के इस सीधेपन में हमारे समय की युगीन जटिलताएँ लिपटी हैं और कविताएँ उन जटिल परतों को उद्‍घाटित करती हैं। फलतः इन कविताओं को पढ़ना अपने समय और अपने समय की समस्याओं को पढ़ना है। विवादी समय में पूछना बहुत ज़रूरी है / यह पूछो कि पानी में अब कितना पानी है / आग में कितनी आग है, आकाश अब भी कितना आकाश है। सवाल जितना सीधा है, उतनी सीधी भाषा है और उतना ही अनिवार्य है। शायद मानव इतिहास का अभूतपूर्व संकट, यानी पंच महाभूतात्मक संकट। इस सवाल के ज़रिए आप आज की उस मानवघाती अपसंस्कृति तह पहुँच जाएँगे जो मनुष्य से उसके पंचमहाभूतों तक को छीनकर सीधे बाज़ार में बेचने का उपक्रम कर रही है।

कब तक मौन रहोगे
विवादी समय में यह पूछना बहुत ज़रूरी है
पूछो तो अब
यह पूछो कि पानी में
अब कितना पानी है
आग में कितनी आग
आकाश अब भी कितना आकाश है

पूछो तो यह पूछो
कि कितना बह गया है भागीरथी में पानी
कितना बचा है हिमालय में
पूछो कि नदियों का सारा मीठा पानी
आखिर क्यों जा डूबता है
सागर के खारे पानी में
पूछो

मित्रो, मैं पूछता हूँ
आदमी का पानी
कब उड़ जाता है
मेरी-तुम्हारी आँखों में
बचा है अब कितना पानी
खोजो कहीं चुल्लू भर ही पानी
डूब मरने के लिए
पानी के इस अकाल समय में
नाविकों और मछलियों से कहो

वे अपने भीतर बचाए रखें पानी
उन्हें दुनिया को पार लगाना है
जंगलों से कहो वे आग बचाएँ
ठंडी पड़ती जा रही है यह दुनिया
ख़त्म हो रही है आत्मा की ऊष्मा

देर मत करो पूछो
आग दिल की बुझ रही है
धुआँ-धुआँ हो जाए छाती इससे पहले
मित्रो, ठंड से जमते इस बर्फ़ीले समय में
आग पर सवाल पूछो
माचिस तीली की टकराहट की भाषा में

तय कर लो
आग कहाँ और कितनी ज़रूरी है
क्या जलना चाहिए आग में
क्या बचना चाहिए आग से

पूछो आकाश से तो
क्यों भागता जाता है ऊपर
हमसे क्यों छिनी जा रही है क़द की ऊँचाई
हाथ बढ़ाओ और
आकाश से सवाल पूछो
कि हमसे भागकर कहाँ जाओगे
तुम हमारे क़द पर कब तक ओले गिराओगे

मित्रो, उससे इतना ज़रूर पूछो कि
हमारे हिस्से की धूप
हमारे हिस्से की बिजली
हमारे हिस्से का पानी
हमारे हिस्से की चाँदनी का
जो मार लेते हो रोज़ थोड़ा-थोड़ा हिस्सा
उसे कब वापस करोगे

मित्रो, यह ज़िन्दगी है
आग पानी आकाशा
बार-बार पूछो इससे

हमेशा बचाकर रखो एक सवाल
पूछने की हिम्मत और विश्वास