Tuesday, April 19, 2011

दिगम्बर नासवा की रचनायें उनके ब्लॉग से साभार.....

माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

हो गयी तक्सीम अब्बा की हवेली
माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

आज भी आँगन में वो पीपल खड़ा है
पर नही आती है वो कोयल सुरीली

नल खुला रखती है आँगन का हमेशा
सूखती जाती है पर फिर भी चमेली

अनगिनत यादों को आँचल में समेटे
भीगती रहती हैं दो आँखें पनीली

झाड़ती रहती है कमरे को हमेशा
फिर भी आ जाती हैं कुछ यादें हठीली

अब नही करती है वो बातें किसी से
बस पुराना ट्रंक है उसकी सहेली

उम्र के इस दौर में खुद को समझती
काँच के बर्तन में पीतल की पतीली

हो गये हैं अनगिनत तुलसी के गमले
पर है आँगन की ये वृंदा आज पीली

इस तरह परिणय न हो

कष्ट में भी हास्य की संभावना बाकी रहे
प्रेम का बंधन रहे सदभावना बाकी रहे

यूँ करो स्पर्श मेरा दर्द सब जाता रहे
शूल हों पग में मगर ना यातना बाकी रहे

इस तरह से ज़िन्दगी का संतुलन होता रहे
जय पराजय की कभी ना भावना बाकी रहे

आप में शक्ति हे फिर चाहे के दर्शन दो न दो
पर ह्रदय में आपकी अवधारना बाकी रहे

सात फेरे डालना है आत्माओं का मिलन
इस तरह परिणय न हो, स्वीकारना बाकी रहे

कर सको निर्माण तो ऐसा करो इस देश में
प्रेम की फंसलें उगी हों काटना बाकी रहे

थाल पूजा का लिए चंचल निगाहें देख लूं
हे प्रभू फिर और कोई चाह ना बाकी रहे

आज के नेता

सपनों की सौगात उठाई होती है
वादों की बारात सजाई होती हैं

वोटों की खातिर नेताओं ने देखो
दुनिया भर में आग लगाई होती है

इनकी शै पर इनके चॅमचों ने कितनी
गुंडागर्दी आम मचाई होती है

घोटाले पर घौटाले करते जाते
लीपा पोती आग बुझाई होती है

सूखा हो या हाहाकार मचा कितना
इनके हिस्से ढेर मलाई होती है

कुर्सी कुर्सी खेल रहे हैं सब नेता
कहने को बस टाँग खिचाई होती है

हिंदू मुस्लिम इनकी सत्ता के मुहरे
मंदिर मस्जिद रोज़ लड़ाई होती है

सूरज के आने से पहले ...

भोर ने आज
जब थपकी दे कर मुझे उठाया
जाने क्यों ऐसा लगा
सवेरा कुछ देर से आया

अलसाई सी सुबह थी
आँखों में कुछ अधखिले ख्वाब
खिड़की के सुराख से झाँक रहा था
अंधेरों का धुंधला साया

मैं दबे पाँव तेरे कमरे में आया
देखा ... तेरे बिस्तर के मुहाने
सुबह की पहली किरण तेरे होठों को चूम रही थी
सोए सोए तू करवट बदल होले से मुस्कुराइ
हवा के झोंके के साथ
कच्ची किरण ने ली अंगड़ाई
रात के घुप्प अंधेरे को चीर
वो कायनात में जा समाई

अगले ही पल
सवेरे ने दस्तक दी
अंधेरे की गठरी उठा
रात बिदा हुई

मुद्दतों बाद
मुझे भी समझ आया

सूरज के आने से पहले
नीले आसमान पर
सिंदूरी रंग कहाँ से आया


विश्वास

अविश्वास का बस एक पल
और तुम्हारे आँसुओं का सैलाब

हर दहलीज़ लाँघ कर बहा ले गया
विश्वास के मज़बूत लम्हे
रिश्तों का आधार
कच्चे धागों की गरिमा
साथ फेरों का बंधन
वक़्त की खुरदरी सतह पर बिखर गये
कुछ तुम्हारे
कुछ मेरे
कुछ मिल कर देखे ख्वाब

न जाने क्यों
दम तोड़ते ख्वाबों से
भविष्य की आशा चुरा ली मैने
सहेज ली उम्मीद की वो किरण
जो साँस लेती थी हमारी आँखों में

अब जब कभी
तुम्हारी सूखी आँखों में
विश्वास की नमी नज़र आएगी
चुपके से भर दूँगा
भविष्य के कुछ सपने
आशाओं का रोशनी

जला दूँगा वो सब लम्हे
जो उड़ा ले गये
तुम्हारा
मेरा
कुछ हम दोनो का ...
विश्वास

समानांतर रेखाएं

याद है वो तमाम मसले
समाजवाद और पूंजीवाद की लंबी बहस
कार्ल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत
मानव अधिकारों को लेकर आपसी मतभेद
फ्रायड का विवादित मनोविज्ञान
मैकाले की शिक्षा पद्धति
कितनी आसानी से एकमत हो गये
इन विवादित मुद्दों पर

मेरे आई. ऐ. एस. के सपने
तुम्हारे समाज सेवा के ख्वाब
बहस समाप्त होते होते
इस मुद्दे पर भी एकमत हो गये थे

याद है उन दिनों
दिन पंख लगा कर उड़ जाते थे
रात पलक झपकते बीत जाती थी
एस एम एस का लंबा सिलसिला
थमता नही था

गुलज़ार की नज़मों में जीने लगे थे हम

फिर वक़्त के थपेड़ों ने
हालात की खुरदरी सतह पर
जाने कब खड़ी कर दी
अहम की हल्की दीवार

हमारे बीच आ गया
ईगो का पतला आवरण
पता नहीं कब खिंच गयी हम दोनों के बीच
कभी न मिलने वाली दो समानांतर रेखाएं

मैं तो आज भी निरंतर दौड़ रहा हूँ
अपनी रेखा पर

सुना है समानांतर रेखाएं
अनंत पर जा कर मिल जाती हैं

मुहब्बत

खुदा की है ये दस्तकारी मुहब्बत
जमीं पे है किसने उतारी मुहब्बत

उमड़ती घटाएं महकती फिजायें
किसी की तो है चित्रकारी मुहब्बत

तेरी सादगी गुनगुनाती है हर सू
मुहब्बत मुहब्बत हमारी मुहब्बत

तेरे गीत नगमें तेरी याद लेकर
तेरा नाम लेकर संवारी मुहबत

पनपने लगेंगे कई ख्वाब मिल के
जो पलकों में तूने उतारी मुहब्बत

मुहब्बत है सौदा दिलों का दिलों से
न मैं जीत पाया न हारी मुहब्बत

सुनाते हैं जो लैला मजनू के किस्से
वो कहते हैं कितनी हे प्यारी मुहब्बत

चली है जुबां पर मेरा नाम लेकर
वो नाज़ुक सी अल्हड कुंवारी मुहब्बत

है बदली हुई वादियों की फिजायें
पहाड़ों पे हे बर्फ़बारी मुहब्बत

अमीरों को मिलती है ये बेतहाशा
गरीबों को है रेजगारी मुहब्बत

ज़माने के झूठे रिवाजों में फंस कर
लुटी बस मुहब्बत बिचारी मुहब्बत

है दस्तूर कैसा ज़माने का देखो
सदा ही है पैसे से हारी मुहब्बत

फटेहाल जेबों ने धीरे से बोला
चलो आज कर लो उधारी मुहब्बत

थाल पूजा का लिए सूनी निगाहें

आप ख़्वाबों में नहीं आते हो जब तक
मैं हकीकत से जुड़ा रहता हुं तब तक

जिन्दगी की राह में चलना हे तन्हा
थाम कर रक्खोगे मेरा हाथ कब तक

प्यार सबको बांटता चल इस सफ़र में
बस इसी रस्ते से सब जाते हें रब तक

तुम चमकती रौशनी से दूर रहना
जुगनुओं का साथ बस होता हे शब तक

गीत नगमें नज्म कविता शेर तेरे
बस तेरी ही बात तेरा नाम लब तक

थाल पूजा का लिए सूनी निगाहें
पूछती हैं क्यों नहीं लौटे वो अब तक

अधूरा सत्य

साथियो ये मेरी इस साल कि अंतिम रचना है ... २३ दिसंबर से १ जनवरी तक दिल्ली, फरीदाबाद की सर्दी का मज़ा लूटूँगा ... आप सब को नया साल बहुत बहुत मुबारक ...


तुम्हारे कहने भर से क्यों मान लूं
मैं झूठ बोलता हूँ
माना कुछ बातें सच नही होतीं
पर वो झूठ भी तो नहीं होतीं
मेरे बोले बहुत से सत्य
तुमने पूर्णतः सत्य नहीं माने
जबकि तुम्हारा अन्तः-करण यही चाहता है

कुछ अधूरे सत्य स्थापित हैं इतिहास में
अधूरे झूठ की तरह

क्या इतिहास बदलने वाले झूठ पूर्णतः झूठ हि माने जाएँगे
क्या सत्य मान कर बोले गये झूठ
झूठ हि कहलाएँगे

क्या अश्वथामा की मौत पर

युधिष्ठर से बुलवाया गया सत्य
सत्य की आड़ में बोला गया झूठ था
या झूठ की दहलीज़ पर खड़े हो कर बोला गया सत्य …
धर्म की स्थापना के लिए बोला गया झूठ
या सत्य की अवमानना को बोला गया सत्य …

क्या ये सत्य नही
प्रकाश के आने पर अंधकार लुप्त हो जाता है

और इस बात को तुम क्या कहोगी
अंधकार बढ़ते बढ़ते प्रकाश को लील लेता है

फिर सत्य क्या है और झूठ क्या
ये जीवन जो माया है
या माया जो जीवन निर्धारित करती है


जैसे कुछ अधूरे सत्य स्थापित हैं इतिहास में
ऐसे अधूरे सत्य मैं तुमसे बोलता हूँ
जिन्हे तुम झूठ समझती हो और मुझे ...... झूठा

वैसे तुमने तो आज तक
इस पूर्णतः सत्य को भी सत्य कब माना
जब मैने तुमसे कहा था

जब कभी मैं तुम्हें देखता हूँ
तुम्हारा सादगी भरा
पलकें झुकाए
पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी में लिपटा रूप
मेरे सामने आ जाता है...

जबकि तुम जानती हो
एक यही सत्य मेरे जीवन का सबसे बड़ा सत्य है
और तुम्हारे लिए ...
.....
.....

झूठ-मूठ हि बोला झूठ

गुलाबी ख्वाब

रात भर
उनिंदी सी रात ओढ़े
जागती आँखों ने
हसीन ख्वाब जोड़े

सुबह की आहट से पहले
छोड़ आया हूँ वो ख्वाब
तुम्हारे तकिये तले

अब जब कभी
कच्ची धूप की पहली किरण
तुम्हारी पलकों पे दस्तक देगी

तकिये के नीचे से सरक आये मेरे ख्वाब
तुम्हारी आँखों में उतर जाएँगे

तुम हौले से अपनी नज़रें उठाना
नाज़ुक हैं मेरे ख्वाब कहीं बिखर न जाएँ

ककून !

अरसा हुआ
एक गम में जागते हुए,
आँख बंद न हो
तो जल्दी ही
जलने भी लगती है,
मेरी जलती हुई ऑंखें तो
पिघलने भी लगीं,
पिघल कर बहने भी लगीं
बहने का दायरा
पहले पहल तो
गालों तक ही था
अब यह बढ़ गया है
सर से ले के पाँव
कृष्ण की खीर ने तो
उनके तलवे छोड़ दिए थे,
मेरे आंसुओं ने तलवों
को भी ढँक लिया है ..
एक खोल सा बन गया है
मेरे ऊपर,
इक ककून सा दिखने लगा हूँ
इन दिनों मैं..
शायद नए जनम का मेरे वक्त हो गया.....

कवि: स्वप्निल तिवारी ’आतिश’

देखो! सपने क़ुर्बानी मांगते हैं !

देखा था सपना एक कस्बे ने...

कि वो शहर हो गया!

दौड़ता रहा वो सालों

उस सपने के पीछे

आखिर रंग लाई उसकी उर्ज़ा

रौशन हुआ वो कस्बा….

और शहर हो गया!!!

पर हाय! अब क्या हो?

शहर को भूख लगी थी

उसने निगल ली कई ज़िन्दगियां...

और बढ़ चला तरक्की के रास्ते पर

बढ़ गए सपने

बढ़ गए उन सपनों के दायरे

फिर जब लगती भूख

थमती थीं कुछ ज़िन्दगियां

कस्बा एक महानगर हो गया

और भूख एक नियम

कई गांवों ने...

कई कस्बों ने

आज फिर वही सपना देखा है!

याद रहे ! सपने क़ुर्बानी मांगते हैं

(ग्रामीण विकास को समर्पित पत्रिका ‘कुरूक्षेत्र’ में प्रकाशित कविता)

Monday, April 18, 2011

समय के सदुपयोग की महत्ता समझिये !

समय की बरबादी का अर्थ है, अपने जीवन को बरबाद करना । जीवन के जो क्षण मनुष्य यों ही आलस्य अथवा उन्माद में खो देता है, वे फिर कभी लौटकर वापस नहीं आते । जीवन के प्याले से क्षणों की जितनी बूंदी गिर जाती है, प्याला उतना ही खाली हो जाता है । प्याले की वह रिक्तता फिर किसी भी प्रकार भरी नहीं जा सकती । मनुष्य जीवन के जितने क्षणों को बरबाद कर देता है, उतने क्षणों में वह जितना काम कर सकता था, उसकी कमी फिर वह किसी प्रकार भी पूरी नहीं कर सकता ।
जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की संभावना लेकर आता है । हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती है । मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस समय, जिस क्षण और जिस पल को वह यों ही व्यर्थ में खो रहा है, वही क्षण, वही समय उसके भाग्योदय का समय नहीं है । क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं, वही हमारे लिए अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया है । समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है । जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि वे अपने किसी भी ऐसे कर्तव्य को भूलकर भी कल पर न टालें, जो आज किया जाना चाहिये । आज के काम के लिये आज का ही दिन निश्चित है, और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है ।
सादगी से जीने वाला शांति से मरता है, और शांति से मरना मुक्त होने की सूचना है ।।

दीर्घ जीवन का नहीं, पवित्र जीवन का मूल्य है !

कितना लम्बा जीवन जीये ? यह कोई महत्व की वस्तु नहीं है । कितना जिया के बजाय कैसा जीवन जिया यह अधिक महत्व की वस्तु है ।
इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों की ओर दृष्टि करेंगे तो कई ऐसी विभूतियों के दर्शन होंगे, जिनका आयुश्य बहुत ही परिमित था, परंतु उस परिमित आयुष्य में भी वे ऐसा महान कार्य करके गये हैं, जिसके कारण भले ही उनका भौतिक अस्तित्व इस दुनिया में नहीं है, परंतु उनका उज्ज्वल यश दिग्दिगान्त तक फैला है ।
सौ किलो लोहे से भी एक किलो सोने का मूल्य अधिक होता है और एक किलो सोने से भी दस-बीस ग्राम हीरों का मूल्य अधिक होता है । अतः अपवित्र तथा कलंकित जीवन के सौ वर्ष के बजाय पच्चीस वर्ष की पवित्र जिन्दगी का मूल्य अधिक है ।
पवित्र जीवन जीने वाले, अल्प जीवन जीने पर भी युगो-युगों तक अपना नाम अमर कर जाते हैं, जबकि दुष्ट पुरुष दीर्घ-काल तक जीये तो भी उसकी जिन्दगी अन्य जीवों के लिये दुःखदायी एवं भारभूत ही होती है । अतः दुर्लभता से प्राप्त मानव-जीवन को पवित्र बनाने के लिये अपने जीवन को सदाचारी और सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करना चाहिये ।
भगवान का सारा विधान जीवों से
वास्तविक कल्याण के लिए होता है ।

बुराई के सम्पर्क से हमारी अच्छी आदतें भी दूषित हो जाती हैं ।

इस बात की कोई चिंता न करे कि आप ठोकर खाकर गिर पड़े ।
गिरो मगर गिरे मत रहो, फिर खड़े हो जावों और बढ़ जावों ।।

महात्मा !

महात्मा या महापुरुष का उपदेश उनकी वाणी से नहीं, वरन् उनके जीवन कृत्यों से होता है । उनकी एक-एक चेष्टा सहज ही सांसारिक विपत्तियों के विनाश का रास्ता प्रशस्त करती है । कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगाती है, और महान कल्याण की प्राप्ति कराने में अहम् भूमिका निभाती है । उनका मूक व्याख्यान जितना प्रभावशाली होता है, उतना संसारासक्त मानवों के लाख-लाख कलापूर्ण व्याख्यान नहीं होते । वस्तुतः उनके जीवन में घटित उपदेशों की तुलना केवल वाणी के उपदेशों से नहीं की जा सकती ।
महात्मा या महापुरुष के लिए यह आवश्यक नहीं कि भौतिक जगत में उनकी प्रसिद्धि हो ही और वे लोगों में महात्मा या महापुरुष माने जाते हों । वरन् कहे माने जाने वाले महात्माओं में वास्तविक महात्मा बिरले ही होते हैं । सच्चे महात्मा को सर्वत्र, सर्वस्व, मात्र वासुदेव भगवान के अतिरिक्त और कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता । जहाँ देखो, वहाँ उन्हें प्रभु स्वरूप ही नजर आता है ।
महात्मा न तो अपने महात्मापन ढ़िढ़ोरा पीटा करते हैं, न विज्ञापन करते हैं उनका सहज स्वाभाविक अस्तित्व जगत के जीवों का कल्याण करने वाला होता है । वे चाहे प्रगट रहे या अप्रगट, लोग उन्हें जाने या न जानें, वे जहाँ, जिस जगह होते हैं, वहाँ दैवी सम्पत्ति और भगवद्भाव प्रागरय होने लगता है, और उनकी आध्यात्मिक सुरभि फूलों के बगीचे की स्वाभाविक सुगन्ध की तरह चारों ओर महकने लगती है, और वातावरण को देवत्व प्रदान करती है ।

रे माखन की चोरी छोड़ सांवरा मैं समझावु तोय ।

मैं तो सोच्यो गयोरे गयन में रहयो खीरक मैं सोय ।
कोऊ एक ग्वालिन मोहे बतलायो देयी कमरीया खोय ।.....

नव लख धेनु नन्दघर दुझे नीत नयो माखन होय ।
बड़ो नाम तरे नन्दबाबा को हंसी हमारी होय ।.....

बरसाना तेरी भई रे सगाई नीत नई चरचा होय ।
बड़े घरन की राज दुलारी नहीं बेरागी तोय ।.....

यह चोरी नहीं छुटे मेरी मैया होनी हो सो होय ।
सुर श्याम मैया का आग दीयो नैयव भर रोय ।.....

- श्री श्रीजीबाबा महाराज

Saturday, April 16, 2011

यह जाते हुए चैत्र की शाम है !

आज आलोक श्रीवास्तव की कविताएँ. ‘वेरा उन सपनों की कथा कहो’ नामक अपने पहले ही संग्रह से खास पहचान बनाने वाले इस कवि का नया संग्रह हाल में ही आया है ‘दिखना तुम सांझ तारे को’। प्रस्तुत हैं उसी संग्रह की कुछ चुनी हुई कविताएँ-

1
तुम्हारे वसंत का प्रेमी

मैं तुम्हारे वसंत का प्रेमी
तुम्हारी ऋतु का गायक हूँ

तुम कहीं भी जाओ
तुम्हारे होने की खुशबू
मुझ तक आती रहेगी
हवाएं तुम्हारे गीत बांधकर
दिशाओं के हर कोने से मुझ तक लायेंगी

मैं तुम्हारे खिलाये फूलों में
तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श चूमूंगा
तुम्हारी पलक छुऊंगा
तुम्हारे स्वप्न से भरी कोंपलों में

झरनों के निनाद में
तुम्हारी हँसी गूंजेगी
पलाश-वन को निहारेंगी मेरी आँखें
जो रंगी हैं तुम्हारी काया की रंगत में
मैं तुम्हें खोजने
देशावर भटकूंगा

तुम मुझे भूलना मत
लौटना हर बार
मैं तुम्हारी राह तकूंगा...

मैं तुम्हारे वसंत का प्रेमी
तुम्हारी ऋतु का गायक हूँ.

2
कनेर का एक पेड़ और एक रास्ता...

एक शाम याद आती है
धूसर रंगों में डूबी
तुम्हारा चेहरा नहीं
एक रास्ता याद आता है
जिसे चलते हुए
मैंने तुम्हारा शहर छोड़ा था

तुम किन अंधेरों में जीती रहीं
मैं कभी नहीं जान पाया
तुम्हारी अंतरात्मा का संगीत
कितना जिंदा रहा, कितना मर गया
इसकी मुझे कोई खबर नहीं

तुम्हारे जिन कनेर फूलों की ओट से
रात के चांद की ओर
अपनी बाहें फैलाई थीं
एक दृश्य की तरह मन में
वह अब भी अटका हुआ है

मैं तुम्हारे बरसों पुराने उस रूप को
देखता हूँ- अपने एकांत में
और मेरी आँखें आंसुओं से भर उठती हैं
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रोने का मन होता है

यह उजाड़ –सा बीता मेरा जीवन
तुम्हें आवाज़ देता है
तुम हो इसी दुनिया में पस्त और हारी हुई
मुझसे बहुत दूर!

मेरी थकी स्मृतियों में
अब तुम्हारा चेहरा भी मुकम्मल नहीं हो पाता

दिखता है सिर्फ
कनेर का एक पेड़
और एक रास्ता...

3
चैत्र की यह शाम

यह जाते हुए चैत्र की शाम है

झरे पत्तों की उदास
रागदारी बजती है
मन के उदास कोनों में
जाते चैत्र का यह दृश्य
ठहरा रहेगा ताउम्र
ऐसे ही याद दिलाता
किसी सूने रास्ते
और पर्वतश्रेणी के पीछे
खोती शाम का!

4
यह कौन राह

यह कौन राह मुझे तुम तक लाई
सूर्यास्त का यह मेघ घिरा आसमान विलीन हो रहा है
एक नौका के पाल दिखते हैं सहस्राब्दियों के पार
और तुम्हारा उठा हाथ...

मैंने कहाँ तलाशा था तुम्हें
किस युग के किस वान-प्रांतर में?

कहाँ खोई थीं, तुम ऋतुओं का लिबास ओढ़े
हिमान्धियों के पार...

स्वप्न और सत्य की परिधि पर टूट जाता है जीवन
राहें बन जाती हैं गुंजलक
एक विशाल गह्वर अन्धकार का घेर लेता पूरी पृथ्वी!

मैं तुम्हें नहीं
तुम्हारे भीतर किसी को तलाशता
शताब्दियों भटका हूँ...!

5
एक गीत, जो फूल बन खिलता

मैंने इतने झरे पत्ते देखे हैं
खिले फूल देखे हैं
बहती नदियाँ देखी हैं
वीरान पहाड़ियां
निर्जन मैदान
बहारों का स्वागत करते दरख़्त
समंदर की ऊंची लहरें
गुंजान हवाएं
रंगों में डूबी धरती की अम्लान छवि
उमड़ते बादल
सूनी राहें

काश गूंथ पाता
किसी एक गीत में
जो फूल बन खिलता
तुम्हारी हँसी में!

6
प्रेम
दुःख ही लाया प्रेम
पर यह भी तो था जीवन का एक रंग
और हर रंग का अपना ही तिलिस्म होता है
रंगों के भीतर होते हैं कई रंग...

7
क्या होता है एक स्त्री का मन?

कितने फूल गुंथे होते हैं उसमें
कितने रंग, कितने राग
कितने स्वप्न अस्फुट

या कितने भय
कितने विकल स्वर
असुरक्षित वन

कितना छूटा बालपन
बीती किशोर वय
सुदूर देखती
अधेड़ दिनों की ठहरी कतार

पूरब के एक उदास देश में
दुःख का एक गीत रोता है
पथ पर

तुम पूछते हो
क्या होता है प्रेम!

8
मिटा नहीं तुम्हारे होने का जादू

तुम्हारी छवि दीप्त हो उठती है
दुःख के इन दिनों में

कहीं नहीं हो तुम
पर तुम्हारे होने का जादू अब भी है

भावना के वे दिन बीत गए
रंग से सराबोर दिशाएँ घुल गई
रात के वीरान रहस्यों में

कोई एक पुकार
खो गई
मिट गया कोमलता का पूरा एक संसार
जीवन दुःख की कथाएं लिखता रहा
जिन हवाओं में तुम्हारे होने का गीत था
उनमें सिर्फ वीरानी बची
चैत के पत्तों का गिरना
और धूसर पलाश बचे वसंत के वन में

गहरे दुखों की लकीरें छूट गईं
बदल गया कितना कुछ
पर क्यों नहीं मिटा
तुम्हारे होने का जादू?

9
एक लहर विशाल...

तुम मुझे ले जाती हो इस पृथ्वी की निर्जन प्रातों तक
अक्लांत धूसर गहन रातों तक

तुम्हारे होने से ही खिलता है नील-चंपा

मैंने तुम्हें देखा, पाया वह उन्नत भाव समन्वित
जो मानवता का अब तक का संचय

तुम नहीं रूप, नहीं आसक्ति, नहीं मोह, नहीं प्यार
जीवन का एक उदास पर भव्य गान
अम्बुधि से उठी एक लहर विशाल
जिसमें भीगा मेरा भाल...


Thursday, April 14, 2011

मनोहर श्याम जोशी का अंतिम साक्षात्कार !

३० मार्च २०११ को लेखक मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि थी। देखते ही देखते उनकी मृत्यु के पांच बरस बीत गए। विश्व कप का सेमीफ़ाइनल शुरु होने से पहले पढ़ लेते हैं उनका अंतिम साक्षात्कार जो प्रसिद्ध पत्रकार अजित राय ने किया था। १९-३-२००६ को यानी उनकी मृत्यु से केवल ११ दिनों पहले बहुत साफ़गोई के साथ उन्होंने इस बातचीत में अनेक बातें पहली बार ही कही थीं। इसी बहाने उनको थोड़ा याद भी कर लेते हैं। हिंदी के उस बहुआयामी लेखक को- हमारा नमन।

प्रश्न- आपको साहित्य अकादेमी पुरस्कार की फिर से बधाई. बात यहीं से शुरु करें. साहित्य के लिए आपको बहुत कम पुरस्कार मिले हैं. इतने दिनों बाद इस महत्वपूर्ण पुरस्कार को पाकर कैसा लगा?
जोशीजी- जो मैं कहने जा रहा हूँ उस पर तुम हंसोगे. लेकिन इससे पहले दो बातें. एक, जैसा कि उस दिन साहित्य अकादेमी में अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा भी- कि मेरे मित्र सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कहा करते थे, जो लाख समझाने के बावजूद लिखता ही चला जाए उसे कभी-कभी इस ढिठाई के लिए भी पुरस्कृत कर दिया जाता है. तुम ठीक कहते हो, साहित्य का एक यही बड़ा पुरस्कार मुझे मिला है. मुझे खुशी भी हुई. अंततः बात यहाँ टूटती है कि निर्णायक कौन-कौन थे. आम सहमति से फैसला हुआ या नहीं. बहुधा होता यह है कि निर्णायक मंडल में कुछ लोग पहले से तय करके आते हैं कि ‘इस जनम में फलां को पुरस्कार नहीं देंगे.’ मैं यह इसलिए जानता हूँ कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार के निर्णायक मंडल में मैं भी कई बार रहा हूँ. इस चक्कर में कोई तीसरा पुरस्कार पा जाता है. यह अजीब है कि वहां निर्णायक मंडल को अकादेमी एक सूची थमाकर कहती है कि किसी को चुन लो. इस बार हालांकि जिन लोगों ने मेरे नाम का फैसला किया वे तीनों तटस्थ थे, विवादस्पद नहीं थे, उनका कोई पक्ष या नामवर सिंह या अशोक वाजपेयी की तरह कोई गुट नहीं था- नन्दकिशोर आचार्य, गोविंद मिश्र और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी.
अब एक किस्सा सुनो. पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में एक बैंड मास्टर ने कोई अनाम सा पुरस्कार साहित्य, कला, संस्कृति के लिए शुरु किया. बाद में मध्यप्रदेश के एक ट्रांसपोर्टर ने उस पुरस्कार का अधिग्रहण कर लिया. वे कांग्रेस को काफी चंदा देते थे. उन्होंने केंद्र सरकार के दो-दो कैबिनेट मंत्रियों को बुला रखा था पुरस्कार वितरण समारोह के लिए. चूँकि उनमें से एक सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे तो दूरदर्शन, रेडियो और अखबारों के पत्रकारों की भीड़ थी. पुरस्कार में पैसा तो था नहीं, कोई ढंग का प्रतीक चिह्न भी नहीं था. थोक के भाव पुरस्कार बनते. दूरदर्शन समाचारों में मुझे भी दिखाया गया. मित्रों के बड़े फोन आये कि चेक कितने का मिला. पुरस्कार पाने वालों में आस्क उत्तर-छायावादी कवि सम्मेलनी मशहूर कवयित्री भी थी जिनका महत्व सिर्फ इसलिए था कि उनकी दो सुन्दर बेटियां थीं. एक अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टर ने मुझसे पूछा कि इस महिला का साहित्य में क्या योगदान है? मैंने जवाब दिया- ‘ये अभी तक जीवित चली आ रही हैं, यह योगदान क्या कम है?’ तो पुरस्कारों की यही हालत है.

प्रश्न- आपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने के बाद अपने वक्तव्य में कहा था- ‘साहित्यकार बन बैठने के बाद मुझे अपना साहित्य और अपनी क्रांतिकारी भूमिका दोनों ही व्यंग्य के पात्र प्रतीत होने लगे.’ इसका क्या मतलब है? क्या आपका इशारा मार्क्सवादी विचारधारा के असफल या विघटन की ओर है?
जोशीजी- देखो, विचारधारा तो अब भी ठीक है. हमारा खुद को क्रांतिकारी होने का दावा करना पाखंड है. आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में सामंती मानसिकता छोड़ नहीं पा रहे हैं और वामपंथी बनते हैं. यह कैसे संभव है? अधिकतर लेखक गांव से दौडकर दिल्ली आ गए, उन्हें भोग की सारी सुविधाएँ- कार, बंगला, पैसा चाहिए था- तो क्रांतिकारिता कैसी? न केवल आचरण क्रांतिकारी नहीं है, बल्कि उनके साहित्य से भी क्रांति नहीं हो रही है. मैं तुम्हें बताऊँ, जैसे हमारे ज़माने में मलयालम में एक नाटक लिखा गया था जिसका शीर्षक था- ‘तुमने मुझे कम्युनिस्ट बना दिया.’ उस नाटक को देख केरल में हज़ारों लोग कम्युनिस्ट बन गए थे. तुम बताओ, हिंदी में कौन सी ऐसी कृति है जिससे आप हिल जाएँ.

प्रश्न- आपने यह भी कहा है कि मेरी और मेरे मित्रों की प्रयोगधर्मिता पश्चिम से आयात की हुई है और क्रांति कल्पना बुर्जुआ आत्मदया से उपजी भावुकता पर है.’
जोशीजी- हिंदी लेखक आम मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी है जिसके पास अपनी दुखद स्मृतियों- माँ गुज़र गई, पिता भले आदमी थे. रघुवीर सहाय ने लिख दिया था न, ‘यही मैं हूँ.’ तो आप भावुक बुर्जुआ हैं और फ़ालतू का महान होने का दावा कर रहे हैं. आप सीधे-सादे दुनियादारी के धंधे में हैं, आपको फेलोशिप, पुरस्कार, विदेश्यात्राएँ चाहिए. आप बोहेमियन तक तो हो नहीं पाए, क्रांतिकारी होना तो दूर की बात है. आप आधुनिक भी नहीं हो पाए हैं जैसे यूरोप में होते हैं. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मजाक करता था कि यदि आपने सच-सच संघर्ष लिख दिया तो आपका बायोडाटा ‘डल’ हो गया. शैलेश मटियानी पश्चिम में होते तो बर्तन मांजने और बकरा काटने के लिए ही पूजे जाते. जब हिंदी लेखकों ने कोई नई खोज वास्तव में की ही नहीं तो गर्व काहे का.
मैं यह नहीं कहता कि पश्चिम में लेखक बड़बोले नहीं होते. पर वे वैसा सचमुच का जीवन जीते हैं. एक तो उन्होंने कुछ नया किया होता है, दूसरे जनता को अधिकार होता है कि वह उसका मजाक उडाये.

प्रश्न- तो क्या यह मान लिया जाए कि हिंदी साहित्य में कोई मौलिक काम नहीं हुआ. नई कहानी, नई कविता, प्रयोगवाद आदि.
जोशीजी- (बीच में रोककर)- बस! बस! बस! क्या बात करते हो? जिसे ‘नई कहानी आंदोलन’ कहा जाता है, उसके तीन प्रमुख नाम, जिनमें से एक गुज़र गए(मोहन राकेश), दो अभी हैं- राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर(तब वे जिंदा थे). तीनों मेरे मित्र. खुद को स्थापित करने के लिए आंदोलन चलाया, एक दूसरे से श्रेय छीनने के लिए लड़ते रहे. क्या कभी इस आंदोलन का कोई घोषणापत्र छपा? नहीं. नई कविता की बात लो. कैसी नई कविता? क्या इससे जुड़े कवियों ने कभी लिखकर बताया कि उनकी कविता पहले से क्यों और कैसे भिन्न है? जैसे फ़्रांस में कविता में प्रतीकवाद आंदोलन चला तो अब हिंदी में भी प्रतीकवाद. हिंदी लेखकों की सारी प्रयोगधर्मिता पश्चिम से उधार ली गई है.

प्रश्न- हिंदी में आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता, जादुई यथार्थवाद का कोई असर दिखता है?
जोशीजी- जब हिंदी में सही मायने में आधुनिकता और यथार्थवाद ही नहीं आया तो उत्तर-आधुनिकता और जादुई यथार्थवाद कैसे आ सकता है. जैसा कि मैंने पहले कहा, हमारे यहाँ आधुनिकता पश्चिम से आयात की हुई है. आते ही हमारी प्रतिक्रिया दो स्टारों पर हुई. पहली यह कि ‘आधुनिक होने दो हमें क्या करना, हम तो पहले से ही महान हैं. क्या कभी यह आंदोलन होता है कि ‘हम भ्रष्ट हैं’ हमें आधुनिक हो जान चाहिए. दूसरी प्रतिक्रिया यह कि हम यथार्थ से घबड़ाते रहे पर लोक-आख्यान शैली से भी परहेज़ करते रहे. हमने बीच का रास्ता चुना- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद. यानी न आदर्शवादी न यथार्थवादी. हमारे यहाँ संस्कृत का घोंटा लगाये पंडित और मार्क्स का घोंटा लगाए तथाकथित क्रांतिकारी दोनों को स्वीकृति प्राप्त है. यदि कोई लेखक सेक्स की, वेश्याओं की, हिजडों की, समलैंगिकों की बात लिख दे तो उसे दोनों खेमा अस्वीकृत कर देगा. स्वयं मार्क्स की टिप्पणी है कि ‘आदर्श यथास्थितिवादी होता है जसी पर लीपापोती करने से अच्छा है तोड़फोड़ करना.

प्रश्न- आपके लेखन पर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता रहा है. खासतौर पर ‘हमजाद’ उपन्यास पर. हालांकि इसे उदयप्रकाश हिंदी का पहला ऐसा महत्वपूर्ण उपन्यास मानते हैं जिसमें पॉपुलर कल्चर की आलोचना की गई है, जो आज हमारे चारों ओर अराजक रूप में पैठ जमा चुका है.
जोशीजी- हमजाद को लिखते समय मेरे दिमाग में आदमी के अस्तित्व को लेकर कई बातें थीं. मैं उसके अँधेरे पक्षों की ओर गया. आदमी के अस्तित्व में ही जो घटियापन, दुष्टता या एविल है, दूसरे रचनाकारों-कलाकारों के भीतर भी एविल है और तीसरे खुद लेखक यानी मैं भी उसका एक पात्र है, जो कहानी कहता है- उसके भीतर भी एविल है, शैतानियत है. हमजाद पर विजयमोहन सिंह ने लिखा- ‘मनोहर श्याम जोशी उन अमेरिकी लेखकों की तरह हैं जो ‘पोर्न’ लिखकर नाम और पैसा कमाते हैं. मुद्राराक्षस कि सुनिए- ‘भांग की पकौड़ी’ और ‘हमजाद’ में अंतर नहीं. बटरोही ने ‘हरिया हरक्युलीज़ की हैरानी’ उपन्यास को धारावाहिक प्रकाशित करने वाली पत्रिका ‘इण्डिया टुडे’ के संपादक को लिखा- इसे पढकर मुझे उलटी हो गई, बंद कीजिये. मैंने एक पारिवारिक महिला मित्र को उपहार दिया तो उन्होंने पढ़ने के बाद फोन किया- बकवास है.
मैं विद्यानिवास मिश्र जी का बड़ा आदर करता था। उनको हमजाद पढ़ने के लिए दिया। पुस्तक पर लिखकर- ‘बहुत संकोच और भय के साथ।’ उन्होंने पढ़ने के बाद बहुत गंभीरतापूर्वक कहा- ‘तुम्हें यह नहीं लिखना चाहिए था।’ मैंने पूछा- ‘क्या उपन्यास अश्लील है?’ उन्होंने कहा- ‘नहीं, पर यह हिंदी भाषी समाज की मानसिकता से मेल नहीं खाता. यदि यह मराठी, बंगला या मलयालम में लिखा गया होता तो ठीक था. मैंने मन ही मन कहा कि यह क्या बात हुई. पर आज मुझे लगता है कि उनकी बात में दम है. हिंदी वाले आज भी चुटकुले, लतीफे, आत्मप्रवंचना ही पसंद करते हैं. कटु बात को स्वीकार नहीं कर सकते. मैं मानता हूँ कि मैंने कुछ भी अश्लील नहीं लिखा. यदि आपका आशय है कि इशारे से भी सेक्स की बात करना अश्लील है, वर्जित है तो मैं इसे नहीं मानता. एक ज़माने में द्वारिका प्रसाद जी के दो उपन्यास इसी कारण चर्चित हो गए थे- ‘मम्मी बिगड़ेगी’ और ‘घेरे के बाहर’. आप बताइए कि ‘चित्त्कोबरा’ में ऐसा क्या था कि उसकी लेखिका मृदुला गर्ग को लोग जेल भिजवाने पर तुल गए थे. हम हिंदी वाले क्या कोई दुनिया से न्यारे हैं. मुझे इन आरोपों से ज़रा सी भी परेशानी नहीं. मैं हिंदी में कुछ भी लिख दूँगा तो मुझे कुछ खास मिलना नहीं है- न बड़ा पाठक वर्ग न पैसा. मुझे हिंदी की सीमा का पता है-

(जानकी पुल से साभार प्रकाशित)

'इक प्यार का नगमा' के गीतकार संतोष आनंद !

संतोष आनंद मंचों के एक लोकप्रिय गीतकार तो हैं ही, उन्होंने अनेक फिल्मों में दिल को छू लेने वाले गीत भी लिखे. खासकर मनोज कुमार की फिल्मों के लिए या राज कपूर की फिल्म 'प्रेम रोग' के लिए. उनके फ़िल्मी गीतों का दिलचस्प विश्लेषण किया है दिलनवाज़ ने- जानकी पुल.

गीतकार संतोष आनंद ने अपना फ़िल्मी सफ़रनामा अभिनेता मनोज कुमार की सन 1970 मे रिलीज़ हुई हिट फ़िल्म ‘पूरब और पश्चिम ‘से शुरु किया| फ़िल्म मे युवा संतोष को कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन मे एक अच्छा मंच मिला | इससे उन्हे और भी जाने-माने संगीतकारों के साथ सुर-ताल मिलाने का अवसर मिला | इस कडी मे सन 1974 मे रिलीज़ और लक्ष्मीकांत –प्यारेलाल के संगीत से सुसज्जित ‘रोटी कपडा और मकान’ के गीत संतोष जी ने लिखे | पूरब और पश्चिम के बाद मनोज कुमार ने एक बार फ़िर संतोष आनंद पर भरोसा किया | ‘रोटी कपडा और मकान’ के लिए गीत लिख कर संतोष ‘फ़िल्मफ़ेयर ’ पुरस्कार की स्वर्णिम परम्परा एवं परिवार का हिस्सा बने | फ़िल्म के गीत ‘मै ना भुलूँगा, मैं ना भूलूंगी’ के लिए 1974 का बेस्ट गीत पुरस्कार मिला | मनोज कुमार ने इस प्रतिभावान गीतकार को अपने प्रोडक्शन की और भी फ़िल्मो जैसे क्रांति, शोर और प्यासा सावन मे भी काम किया| सन 1981 मे रिलीज़ हुई क्रांति से संतोष एक बार फ़िर रजत पटल पर सितारे बने | इसी समय निर्देशक राज कपूर की फ़िल्म ‘प्रेम रोग’ निर्मित हो रही थी| शैलेन्द्र को गुज़रे वर्षो हो गए ,ऐसे मे राज जी को गीतकार की ज़रुरत पडी जो उनके लिए गीत लिखे| राज कपूर संतोष आनंद के गानो से बहुत प्रभावित थे| राज जी ने संतोष को इस फ़िल्म के लिए गीत लिखने को कहा | लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ संतोष ने एक बार फ़िर कलम का जादू बिखेरा और ‘मुहब्बत है क्या चीज, हम को बताओ’ के लिए 1982 का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार ले गए |


संतोष आनंद के शब्दो से सजे कुछ बेहतरीन गीत :--

तेरा साथ है तो ( प्यासा सावन )
तेरा साथ है तो, मुझे क्या कमी है
अंधेरो से भी मिल रही रोशनी है
कुछ भी नही तो कोई गम नही
हाय यक बेबसी बन गई चांदनी है

टूटी है कस्ती तेज़ है धारा
कभी ना कभी तो मिलेगा किनारा
बही जा रही यह समय की नदी है
इसे पार करने की आशा जगी है

हर इक मुश्किल सरल लग रही है
मुझे झोपडी भी महल लग रही है
इन आंखों मे माना नमी ही नमी है
मगर इस नमी पर ही दुनिया थमी है


मेरे साथ तुम मुस्कुरा के तो देखो
उदासी का बादल हटा के तो देखो
कभी हैं यह आंसू कभी यह हंसी हैं
मेरे हमसफ़र बस यही ज़िन्दगी है|

संतोष आनंद ने जिस किस्म के गीत लिखे उनमें तत्कालीन सिनेमा और समाज की एक खास समझ दिखाई देती है| प्यासा सावन के लोकप्रिय गीत ‘तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी’ में संतोष जी ने ज़िन्दगी को आशा, उल्लास, हिम्मत और सादगी के साथ जीने की प्रेरणा दी है | गीत मे जीवन साथी के महत्त्व को भी बडी सादगी के साथ बताया गया है , किसी का साथ आदमी को हर मुश्किल से लडकर निकलने का हौसला देता है| आशावादी पंक्तियो मे ‘हर इक मुश्किल सरल लग रही है, झोपडी भी महल लग रही है’ और कभी हैं यह आंसु कभी यह हंसी, मेरे हमसफ़र बस यही ज़िन्दगी है’ सर्वाधिक आकर्षित करती हैं | इस गीत को सुनकर जीवन की व्यापकता का अनुभव होता है | मध्यमवर्गीय पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन को सुन्दर बनाने मे यह गीत जादुई भुमिका अदा कर सकता है| गीत को गरीबी, लाचारी, तकलीफ़ , मनमुटाव और जीवन परीक्षा से लडकर सहयोग, रचनात्मकता, निर्माण, आशा के साथ विजयी होने के लिए सुनना चाहिए | संतोष आनंद इस गीत में मध्य वर्गीय आकांक्षाओं को ‘सरल जीवन उच्च विचार’ की शक्ति बता रहे हैं | गीत मे इस बात को बडे ही बेबाक ढंग से कहा जा रहा है कि जीवन को खुशी-खुशी जीने के लिए ‘सुविधाओं’ की नहीं अपितु प्रेम और विश्वास की ज़रुरत है| जीवन की हर परीक्षा को उत्साह, सहयोग एवं मनोबल की सहायता से पास किया जा सकता है | ‘अंधेरो से भी मिल रही रोशनी’ का ज़ज़्बा लेकर हम हर बाधा को ‘मील का पत्थर’ बना सकते हैं | इस तरह से बाधाओं को भी ‘सकारात्मक’ होकर अपनाने से भविष्य की राहें सरल हो जाती हैं|


मै ना भूलूंगा (रोटी कपडा और मकान )

मै ना भूलूंगा
मै ना भूलूंगी
इन रस्मों को, इन कसमों को, इन रिश्ते-नातों को

चलो जग भूलें, ख्यालों मे झुलें
बहारो मे डोले, सितारों को छु लें
आ तेरी मै मांग संवारू तु दुल्हन बन जाए
मांग से जो दुल्हन का रिश्ता मै ना भूलूंगी..

समय की धारा मे उमर बह जानी है
जो घडी जी लेंगे वही रह जानी है
मै बन जाऊं सास आखरी, तु जीवन बन जाए
जीवन से सांसो का रिश्ता मै ना भूलुंगी

गगन बनकर झूमे, पवन बनकर झूमे
चलो हम राह मोडें, कभी ना संग छोडे
तरस चख जाना है, नज़र चख जाना है
कहीं पे बस जाएंगे,यह दिन कट जाएंगे
अरे क्या बात चली, वो देखो रात ढली
यह बाते चलती रहें, यह राते ढलती रहें |

मै ना भूलूंगा ,मै ना भूलूंगी..|

मनोज कुमार की फ़िल्म ‘रोटी कपडा और मकान’ का गीत ‘ मै ना भुलूंगा’ हिन्दी सिने संगीत इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण गीत कहा जा सकता है | गीतकार संतोष आनंद के सिने कैरियर मे भी यह गीत मील के पत्थर के रुप मे देखा जाता है | इस गीत पर उन्हे ना केवल कैरियर का पहला ‘फ़िल्मफ़ेयर’ पुरस्कार मिला अपितु इस गीत के साथ उनकी ख्याति एक ‘समर्थवान’ गीतकार के रुप मे हुई | इस गीत को सुनकर राजकपूर जैसे फ़िल्मकार ने संतोष जी को आर के बैनर की फ़िल्मो के लिए गीत लिखने के लिए बुलाया | यदि श्रोता गीत का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि जीवन को ‘वर्त्तमान’ मे जीने को कहा गया है| ‘समय’ सदैव गतिशील रहा है, मानव-जीवन समय की गति से बंधा हुआ है | जीवन को ‘उत्साह’ के साथ जी कर इसे सफ़ल बनाया जा सकता है| जीवन के सफ़र मे आदमी अनेक लोगो से मिलता है, मेल—मिलाप से ‘सम्बंध’ और एक ‘रिश्ता’ बनता है| रिश्ते को ‘नाम’ देकर उसके नाम की ना जाने कितनी ‘कसमे’ ली जाती हैं , वादा लिया जाता है कि ‘ एक दुसरे को याद रखेंगे’| गीत को उत्साह से बढाते हुए गीतकार सफ़र की हर मुश्किल को अदम्य रचनात्मकता एवं उत्साह के साथ जीने की राह बता रहे हैं| वह कह रहें कि ‘गगन बनकर झूमे, पवन बनकर झूमे’ क्योंकि उत्साह, उमंग और रचनात्मकता मे बीते दिन पलक झपकते बीत जाते हैं, उदासी और आलस्य मे दिन काटना पहाड हो जाता है|


इक प्यार का नगमा है ( शोर )
इक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है
ज़िन्दगी और कुछ भी नही,तेरी मेरी कहानी है ..

कुछ पा कर खोना है, कुछ खो कर पाना है
जीवन का मतलब तो ,आना और जाना है
दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है ..

तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूं
तु मेरा सहारा है, मै तेरा सहारा हूं
आंखो मे समन्दर है, आशाओ का पानी है|
ज़िन्दगी और कुछ भी नही,तेरी मेरी कहानी है|

तुफ़ान तो आना है,आकर चले जाना है
बादल है यह कुछ पल का, छा कर चले ढल जाना है
परछाईयां रह जाती, रह जाती निशानी है ..

जो दिल को तसल्ली दे वो साज़ उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही आवाज़ उठा लाओ
खुशियों की तमन्ना है, अश्को की रवानी है ..
ज़िन्दगी और कुछ भी नही, तेरी मेरी कहानी है…

मनोज कुमार की एक और यादगार पेशकश ‘शोर’ का गीत ‘ज़िन्दगी तेरी मेरी कहानी’ संतोष आनंद के गीत लेखन में रचनात्मकता की नवीन ऊंचाई का झरोखा है | हिन्दी सिने संगीत इतिहास मे ‘ज़िन्दगी’ की समझ पर अनेक गीत लिखे गए, यह गीत उसी परम्परा का वाहक है | समकालीन गीतकार इन्दीवर के शब्दों से सजे ‘ज़िन्दगी का सफ़र, यह कैसा सफ़र’ में ‘ज़िन्दगी’ को ‘अनसुलझी पहेली’ कहा गया था ,संतोष आनंद का गीत ‘ज़िन्दगी’ को बडी सरलता से सुलझाकर उसे ‘ हर आदमी की कहानी’ कहता है | मानव जीवन ‘नश्वर’ है, जो कल था वह आज नही और जो आज है, वह कल नही होगा | इस तरह ‘परिवर्तन’ ही संसार का नियम है, संसार की ‘क्षणिकता’ को स्वीकार करते गीतकार भी कह रहा है ‘ कुछ पा कर खोना है, कुछ खो कर पाना है,जीवन का मतलब तो आना और जाना है’| इस छोटी सी ज़िन्दगी मे किसी का साथ मिल जाने से जीना सफ़ल हो जाता है, जो एकांत जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन्हे उस साथी की प्रतीक्षा करनी चाहिए क्योकि ‘आंखो मे समन्दर है, आशाओ का पानी है’| मुश्किल की घडियों मे किसी का पास होना भर जीवन को हौसला देता है, कभी-कभी तो यह भी कहा जाता है कि ‘पास ना हो दूर ही होता, लेकिन कोई हमारा अपना’| संतोष जी भी इस संदर्भ मे कह रहे हैं ‘तु मेरा सहारा है,मै तेरा सहारा हूं’| गीत के अतिम छ्न्दों मे गीतकार ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ को बरकरार रखते हुए तमाम गमो को तिलांजलि देने की बात कही है ‘जो दिल को तसल्ली दे वो साज़ उठा लाओ, दम घुटने से पहले ही आवाज़ उठा लाओ’| हर इंसान को खुशियो की तमन्ना होती है, खुश रहने के लिए ज़िन्दगी की ‘सार्थक’ समझ’ लाज़मी है |

कुछ और उल्लेखनीय गीत:

मुहब्बत है क्या चीज़, हम को बताओ ( प्रेमरोग )

यह दिन क्यो निकलता है, यह रात क्यो होती है
यह पीड कहां से उठती है, यह आंख क्यो रोती है ?


ओ मेघा रे, मेघा रे (प्यासा सावन )
ओ मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे
आज तु प्रेम का संदेश बरसा रे |
मेरे गम की तु दवा दे
आज तु प्रेम का संदेश बरसा रे |

चलो और दुनिया बसाएंगे हम-तुम
यह जन्मों का नाता निभाएंगे हम-तुम
ओ मेघा रे, मेघा रे हमको तु दुआ दे
आज तु प्रेम का संदेश बरसा रे

ओ मेघा रे मेघा रे……

संतोष आनंद का कैरियर ‘पोपुलर सिनेमा’ की परिभाषा मे ‘हिंसक’ फ़िल्मो के दौर के साथ शुरु हुआ, लेकिन पूरब पश्चिम ने ‘देशभक्ति’ का विषय उठाया | इस तरह ‘आरंभ’ मे ही उन्हे गीत लेखन के लिए एक अच्छा ‘प्रोजेक्ट’ मिला | मनोज कुमार की ‘फ़िल्म मेकिंग स्कूल’ से संतोष बेहद प्रभावित रहे, उनके कुछ बहुत ही खास गीतों का मनोज कुमार की फ़िल्मो मे मिलना इस निकटता का प्रमाण है | संतोष आनंद का फ़िल्म चयन ‘ज़िन्दगी’ और ‘देश-समाज’ के करीब रहा, गीत लेखन मे भी यह सामाजिक पक्ष स्पष्ट देखा जा सकता है |इसे महज संयोग तो नही माना जा सकता जब संतोष ने‘ प्रेमरोग, शोर, रोटी कपडा और मकान जैसी पारिवारिक-सामाजिक फ़िल्मो मे गीत लिखें | यह फ़िल्मे उनके सामाजिक संदर्भो की पहचान मानी जा सकती हैं| संतोष आनंद के गीत ज़िंदगी’ के बहुत से पक्षों को समझने मे श्रोताओं के सहायक से हैं |

संतोष आनंद के गीतो मे देशभक्ति ,रिश्तो की झनक, प्यार का संसार, ज़िन्दगी की जीत पर अप्रतिम भरोसा, मानवीय प्रेम ,सांसारिक मोह ,नैतिकता की राह, मोह-भंग जैसे सामाजिक-सामयिक विषयों का प्रयोग मिलता है | मनोज कुमार और राज कपूर जैसे सफ़ल फ़िल्म निर्माताओ के साथ काम कर संतोष ने एहसास के सभी पक्षो को छुकर अपनी विशेष पहचान बनाई |रोटी कपडा और मकान,शोर, क्रांति ,प्रेम रोग, साजन बिन सुहागन, प्यासा सावन, संगीत जैसी फ़िल्मो के गीतो के बोल आज भी हमे मीडिया मे रेडियो और टेलीविज़न पर नज़र आते है तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी, इक प्यार का नगमा है’ जैसे गाने आज भी सुने जाते हैं |

(जानकी पुल से साभार)