Monday, December 31, 2012
आगंतुक का - स्वागत हो !
इतना सुन्दर भी नहीं था
की जाने का शोक होता .
इतना बुरा भी नहीं था की -
चला जाता तो अच्छा था.
जैसा भी था मेरा कल
जो अब नहीं है .
आज मैं जी रहा हूँ - जैसा भी है
ये नया कल - अभी आया नहीं है
जाने कैसा होगा -कौन जाने .
पर - आशाएं अभी से
हम क्यों छोड़ें .
अपना आशावादी -
दृष्टिकोण आखिर क्यों तोड़ें .
आगंतुक का - स्वागत हो
आरती का थाल सजाने दे .
वो अपने साथ - ख़ुशी या गम
ज्यादा या कम - जो भी
ला रहा है - उसे लाने दे !
- सतीश शर्मा
Monday, December 24, 2012
पहले इंसान बनाया जाए !
सारी दुनिया में - धर्म कुछ ऐसा चलाया जाए .
बाकी सब छोडिये -पहले इंसान बनाया जाए .
रफ्ता रफ्ता टुकड़ों में बंट गया आइना-ए-इन्सां
कांच की किरंचों को - होशियारी से उठाया जाए .
टूटते जुड़ते - बिखर जाते हैं जाने क्यों लोग .
भला किस शय से अब इनको मिलाया जाए .
बड़ा बेगाना सा लगता है - इंडिया-ओ -हिन्दुस्तां यारो
आने वाले हरेक मेहमाँ को-अब भारत से मिलाया जाए !
- सतीश शर्मा
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके,मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शाबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,वक़्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से,दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
.......... गोपाल दास नीरज
Tuesday, December 18, 2012
कैसे हुई रबड़ की खोज....?
अमेरिका में रबड़ सबसे ज्यादा पाई जाती है क्योंकि रबड़ की जन्मभूमि ही अमेरिका है। बावजूद इसके पैंसिल के निशान मिटाने के लिए सबसे पहले रबड़ लंदन और पैरिस में बिकता था अगर इसके इतिहास पर नजर डालें तो विलक्षण तथ्य पता चलते हैं। प्राचीन समय में रबड़ जंगली पेड़ों से खुद-ब-खुद प्राप्त होता था लेकिन इसकी बढ़ती मांग और खपत के कारण इसकी उपज होने लगी। इस सिलसिले में और भी ऐसे पेड़ों की तलाश होने लगी। अमेरिका के मूल निवासी ग्यारहवीं सदी से पहले ही इसके गुणों को जानते थे।
उस जमाने की बनी रबड़ की वस्तुएं आज भी उपलब्ध हैं। सन् 1493 में कोलम्बस ने अपनी हेती यात्रा दौरान यह वर्णन किया था कि वहां के आदिवासी पेड़ से प्राप्त गोंद से बनी गेंद से खेलते थे। फ्रांस के खगोल शास्त्रियों ने सन् 1735 में दक्षिणी अमेरिका में देखा था कि विशेष प्रकार के पेड़ से गोंद जैसा रस प्राप्त होता है जो कुदरती रूप में रंगहीन होता है लेकिन गर्म करने पर या धूप में रखने से ठोस रूप धारण कर लेता है। वहां के आदिवासी उस समय इस रबड़ का उपयोग जूते और बोतलें बनाने के लिए करते थे। फ्रांस के यात्री इस पदार्थ (रबड़) को साथ ले गए और खोज करते रहे। एशिया में भी यह रबड़ पेड़ों से उत्पन्न होती थी। ये लोग रबड़ के बर्तन या गेंदें बनाते थे। यूरोपीय लोगों को अमेरिका से ही रबड़ के बारे में जानकारी मिली थी। अमेरिका में इसकी पैदावार सबसे अधिक है। अच्छी और उत्तम किस्म की रबड़ दक्षिणी अमेरिका में अमेजन के जंगलों में ‘हीबीया’ नामक पेड़ से प्राप्त होती है। अमेरिका निवासी चाल्र्स गुडईयर ने सन् 1831 में रबड़ के उपयोग से संबंधित शोध में काफी मेहनत की थी। उसने अपना पूरा जीवन इस क्षेत्र में खोजों के लिए ही गुजार दिया।
उसने रबड़ की दूसरे पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। रबड़ गर्मी में पिघल जाती है सो इसकी स्थिरता को कायम रखने के लिए उसने इसमें तेल, साबुन, चीनी, नमक आदि मिलाकर प्रयोग किए। उसने काफी कोशिशों के बाद स्थिर रहने वाली रबड़ तैयार कर ली। फिर उसने इसकी वस्तुएं बनानी शुरू कर दीं लेकिन गॢमयों के मौसम में उन वस्तुओं से बदबू आने लगती और ये चिपकने लगतीं। सो उससे तैयार किए बर्तन और जूते बिकने बंद हो गए। उसकी मशीनें बंद हो गईं। यहां तक कि उसे लोगों से अपनी जान बचानी कठिन हो गई। गुडईयर को बहुत कष्ट सहने पड़े। उसे इतना बुरा समय देखना पड़ा कि उसे अपने परिवार का पेट पालना कठिन हो गया लेकिन वह बुरे वक्त में भी प्रयोग करता रहा। रबड़ के प्रचार के लिए उसने कई ढंगों का प्रयोग किया। एक बार तो उसने रबड़ की चादर से अपना शरीर ढंक लिया। उसकी पहचान यह थी कि जिस शख्स ने रबड़ का कोट, बूट और टोपी पहनी हो, जिसकी जेब में रबड़ का पर्स हो, पर पर्स में एक भी सिक्का न हो तो समझो वह गुडईयर ही है। गुडईयर दिन-रात रबड़ के साथ प्रयोग करता रहता था।
एक दिन रबड़ एवं गंधक का मिश्रण गुडईयर अपने दोस्तों को दिखा रहा था कि अचानक वह मिश्रण हाथ से गिर कर जलते स्टोव की आंच पर गिर गया। नमूना आग से बाहर निकाला तो वह हैरान रह गया कि वह बिल्कुल भी चिपकता नहीं था। उसने परिणाम निकाला कि कुदरती रबड़ को गंधक के साथ मिलाकर उसे खास तापमान पर गर्म करके, फिर उसे ठंडा कर लिया जाए, इस प्रकार रबड़ की उत्तम किस्म पैदा की जा सकती है। यही क्रिया बाद में विज्ञान की भाषा में ‘वल्केनाइङ्क्षजग’ नाम से प्रसिद्ध हुई। फिर गुडईयर ने इस सफल रबड़ से अनेकों वस्तुओं का निर्माण किया, जिनकी कोई शिकायत नहीं थी। गुडईयर की लगातार मेहनत से रबड़ का सुंदर रूप आज हमारे सामने है। रबड़ हेतु उसके महान योगदान के कारण एक बड़ी टायर निर्माता कम्पनी का नाम गुडईयर के नाम से प्रसिद्ध है। रबड़ की वस्तुएं अमेरिका में इतनी प्रसिद्ध हुईं कि दूसरे देशों ने भी इसके उत्पादन के बारे में सोचना शुरू कर दिया। उधर ब्राजील ने रबड़ के वृक्षों के बीज पर प्रतिबंध लगा दिया।
इंगलैंड ने भी बहुत कोशिश की कि रबड़ के पेड़ों के बीज प्राप्त हो सकें लेकिन उसके हाथ असफलता ही लगती रही। फिर एक अंग्रेज ‘हैनर विकहेम’ सन् 1876 में हीबीया पेड़ के बीज चोरी छिपे इंगलैंड ले जाने में सफल हो गया। लंदन के क्यू बाग में उसने 70 हजार बीच बोए। उनमें से लगभग तीन हजार पौधे उगे, फिर ये पौधे दूसरे देशों को दिए गए। भारत में बेशक रबड़ के पेड़ आदिकाल से उपलब्ध हैं लेकिन व्यापारिक दृष्टि से उस समय भारत ने इनका इतना महत्व नहीं समझा। भारत में रबड़ का उत्पादन आजादी से कुछ समय पहले ही शुरू हुआ है लेकिन आज भारत रबड़ के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रबड़ के मुख्य स्रोत पेड़ हैं। अब तक लगभग 500 ऐसे पेड़ों का पता लगाया जा चुका है जिनसे निकलते ‘लेटैक्स’ नामक द्रव्य से रबड़ बन सकता है। ‘हीबीया’ नामक पेड़ से सबसे ज्यादा रबड़ प्राप्त होता है। ‘हीबीया’ किस्म के पेड़ दक्षिणी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाए जा चुके हैं जिससे लाखों टन रबड़ प्राप्त होती है। माइकल फैराडे ने रबड़ को एक यौगिक कहा है। रबड़ आज हरेक क्षेत्र में प्रधान है। इसके प्रायोगिक कार्य आज भी जारी हैं। वैज्ञानिक ‘पील’ ने सबसे पहले तारपीन के घोल में रबड़ घोली और इसके लेप को कपड़ों पर फेरा। इस प्रकार वाटरप्रूफ कपड़ा तैयार किया गया। फिर रबड़ के घरेलू उपकरण बनाए जाने लगे।
उस जमाने की बनी रबड़ की वस्तुएं आज भी उपलब्ध हैं। सन् 1493 में कोलम्बस ने अपनी हेती यात्रा दौरान यह वर्णन किया था कि वहां के आदिवासी पेड़ से प्राप्त गोंद से बनी गेंद से खेलते थे। फ्रांस के खगोल शास्त्रियों ने सन् 1735 में दक्षिणी अमेरिका में देखा था कि विशेष प्रकार के पेड़ से गोंद जैसा रस प्राप्त होता है जो कुदरती रूप में रंगहीन होता है लेकिन गर्म करने पर या धूप में रखने से ठोस रूप धारण कर लेता है। वहां के आदिवासी उस समय इस रबड़ का उपयोग जूते और बोतलें बनाने के लिए करते थे। फ्रांस के यात्री इस पदार्थ (रबड़) को साथ ले गए और खोज करते रहे। एशिया में भी यह रबड़ पेड़ों से उत्पन्न होती थी। ये लोग रबड़ के बर्तन या गेंदें बनाते थे। यूरोपीय लोगों को अमेरिका से ही रबड़ के बारे में जानकारी मिली थी। अमेरिका में इसकी पैदावार सबसे अधिक है। अच्छी और उत्तम किस्म की रबड़ दक्षिणी अमेरिका में अमेजन के जंगलों में ‘हीबीया’ नामक पेड़ से प्राप्त होती है। अमेरिका निवासी चाल्र्स गुडईयर ने सन् 1831 में रबड़ के उपयोग से संबंधित शोध में काफी मेहनत की थी। उसने अपना पूरा जीवन इस क्षेत्र में खोजों के लिए ही गुजार दिया।
उसने रबड़ की दूसरे पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। रबड़ गर्मी में पिघल जाती है सो इसकी स्थिरता को कायम रखने के लिए उसने इसमें तेल, साबुन, चीनी, नमक आदि मिलाकर प्रयोग किए। उसने काफी कोशिशों के बाद स्थिर रहने वाली रबड़ तैयार कर ली। फिर उसने इसकी वस्तुएं बनानी शुरू कर दीं लेकिन गॢमयों के मौसम में उन वस्तुओं से बदबू आने लगती और ये चिपकने लगतीं। सो उससे तैयार किए बर्तन और जूते बिकने बंद हो गए। उसकी मशीनें बंद हो गईं। यहां तक कि उसे लोगों से अपनी जान बचानी कठिन हो गई। गुडईयर को बहुत कष्ट सहने पड़े। उसे इतना बुरा समय देखना पड़ा कि उसे अपने परिवार का पेट पालना कठिन हो गया लेकिन वह बुरे वक्त में भी प्रयोग करता रहा। रबड़ के प्रचार के लिए उसने कई ढंगों का प्रयोग किया। एक बार तो उसने रबड़ की चादर से अपना शरीर ढंक लिया। उसकी पहचान यह थी कि जिस शख्स ने रबड़ का कोट, बूट और टोपी पहनी हो, जिसकी जेब में रबड़ का पर्स हो, पर पर्स में एक भी सिक्का न हो तो समझो वह गुडईयर ही है। गुडईयर दिन-रात रबड़ के साथ प्रयोग करता रहता था।
एक दिन रबड़ एवं गंधक का मिश्रण गुडईयर अपने दोस्तों को दिखा रहा था कि अचानक वह मिश्रण हाथ से गिर कर जलते स्टोव की आंच पर गिर गया। नमूना आग से बाहर निकाला तो वह हैरान रह गया कि वह बिल्कुल भी चिपकता नहीं था। उसने परिणाम निकाला कि कुदरती रबड़ को गंधक के साथ मिलाकर उसे खास तापमान पर गर्म करके, फिर उसे ठंडा कर लिया जाए, इस प्रकार रबड़ की उत्तम किस्म पैदा की जा सकती है। यही क्रिया बाद में विज्ञान की भाषा में ‘वल्केनाइङ्क्षजग’ नाम से प्रसिद्ध हुई। फिर गुडईयर ने इस सफल रबड़ से अनेकों वस्तुओं का निर्माण किया, जिनकी कोई शिकायत नहीं थी। गुडईयर की लगातार मेहनत से रबड़ का सुंदर रूप आज हमारे सामने है। रबड़ हेतु उसके महान योगदान के कारण एक बड़ी टायर निर्माता कम्पनी का नाम गुडईयर के नाम से प्रसिद्ध है। रबड़ की वस्तुएं अमेरिका में इतनी प्रसिद्ध हुईं कि दूसरे देशों ने भी इसके उत्पादन के बारे में सोचना शुरू कर दिया। उधर ब्राजील ने रबड़ के वृक्षों के बीज पर प्रतिबंध लगा दिया।
इंगलैंड ने भी बहुत कोशिश की कि रबड़ के पेड़ों के बीज प्राप्त हो सकें लेकिन उसके हाथ असफलता ही लगती रही। फिर एक अंग्रेज ‘हैनर विकहेम’ सन् 1876 में हीबीया पेड़ के बीज चोरी छिपे इंगलैंड ले जाने में सफल हो गया। लंदन के क्यू बाग में उसने 70 हजार बीच बोए। उनमें से लगभग तीन हजार पौधे उगे, फिर ये पौधे दूसरे देशों को दिए गए। भारत में बेशक रबड़ के पेड़ आदिकाल से उपलब्ध हैं लेकिन व्यापारिक दृष्टि से उस समय भारत ने इनका इतना महत्व नहीं समझा। भारत में रबड़ का उत्पादन आजादी से कुछ समय पहले ही शुरू हुआ है लेकिन आज भारत रबड़ के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रबड़ के मुख्य स्रोत पेड़ हैं। अब तक लगभग 500 ऐसे पेड़ों का पता लगाया जा चुका है जिनसे निकलते ‘लेटैक्स’ नामक द्रव्य से रबड़ बन सकता है। ‘हीबीया’ नामक पेड़ से सबसे ज्यादा रबड़ प्राप्त होता है। ‘हीबीया’ किस्म के पेड़ दक्षिणी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाए जा चुके हैं जिससे लाखों टन रबड़ प्राप्त होती है। माइकल फैराडे ने रबड़ को एक यौगिक कहा है। रबड़ आज हरेक क्षेत्र में प्रधान है। इसके प्रायोगिक कार्य आज भी जारी हैं। वैज्ञानिक ‘पील’ ने सबसे पहले तारपीन के घोल में रबड़ घोली और इसके लेप को कपड़ों पर फेरा। इस प्रकार वाटरप्रूफ कपड़ा तैयार किया गया। फिर रबड़ के घरेलू उपकरण बनाए जाने लगे।
- सौ० पंजाब केसरी
काव्य संग्रह ‘निशीथ’ का विमोचन !
इलाहाबाद। गुफ्तगू पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित डा. नन्दा शुक्ला के काव्य संग्रह ‘निशीथ’ का विमोचन 20 दिसंबर को सायं 4:30 बजे हिन्दुस्तानी
एकेडेमी के सभागार में होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर इतिहासकार एवं
साहित्यकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा करेंगे, जबकि मुख्य अतिथि इलाहाबाद
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रवीन्द्र सिंह होंगे। विशिष्ट अतिथि के रूप में
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र और हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष
रविनंदन सिंह मौजूद रहेंगे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी करेंगे। इस अवसर
पर अशोक कुमार स्नेही, यश मालवीय, तलब जौनपुरी, अखिलेश द्विवेदी, नायाब
बलियावी, अजीत शर्मा ‘आकाश’,रमेश नाचीज़, विमल वर्मा, शैलेंद्र जय, शाहिद
अली शाहिद और अजय कुमार काव्य पाठ करेंगे।
हसरतें !
सुनो
मुझ पर उँगलियाँ उठाने से पहले ,
अपनी शराफत मे कुछ रौशनी घोलो और नमी भी
फिर अपने हिस्से की शाइस्तगी तुम रखो
मेरे हिस्से की सियाही मै रखती हूँ ,
जिस्म धागों मे बंधा कोई धर्मग्रंथ नहीं होता
प्रकृति को जीना कोई त्रासदी नहीं होती
और हसरतें एक उम्र के बाद भी हसरतें ही होती हैं ,
रगों मे उगी धूप किसी साये की तलाश मे है
जिस तरह समंदर को थामना कभी मुमकिन नहीं होता
वैसे ही जिस्म छीली हुई ख़्वाहिशों की कब्रगाह नहीं होती ,
तकलीफ अब लहू मे सुलगने सी लगी है
हमनफ़ज मेरे !!!
- अर्चना राज
फिर अपने हिस्से की शाइस्तगी तुम रखो
मेरे हिस्से की सियाही मै रखती हूँ ,
जिस्म धागों मे बंधा कोई धर्मग्रंथ नहीं होता
प्रकृति को जीना कोई त्रासदी नहीं होती
और हसरतें एक उम्र के बाद भी हसरतें ही होती हैं ,
रगों मे उगी धूप किसी साये की तलाश मे है
जिस तरह समंदर को थामना कभी मुमकिन नहीं होता
वैसे ही जिस्म छीली हुई ख़्वाहिशों की कब्रगाह नहीं होती ,
तकलीफ अब लहू मे सुलगने सी लगी है
हमनफ़ज मेरे !!!
- अर्चना राज
!! विमोचन !!
सुपरिचित
लेखिका एवं गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार की अध्यापिका डॉ.
मृदुला जोशी की आलोचनात्मक कृति 'कविता की अंतर्यात्रा' हाल ही में
प्रगतिशील प्रकाशन, दिल्ली से छप कर आयी है । कृति में कबीर, प्रसाद,
दिनकर, नागार्जुन, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, डॉ. जगदीश गुप्त को नये
दृष्टिकोण से देखा-परखा गया है । साध ही समकालीन हिंदी कविता पर गंभीर
विश्लेषण भी पठनीय है । इस कृति का विमोचन 12 से 19 तक यूएई में होनेवाले 6
ठा अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में होना सुनिश्चित हुआ है । कृतिकार को
बधाई ।
Monday, December 17, 2012
मेरी बेटी ससुराल जाने लग गई !
एक लडकी ससुराल चली गई,
कल की लडकी आज बहु बन गई.
कल तक मौज करती लडकी,
अब ससुराल की सेवा करती बन गई.
कल तक तो ड्रेस और जीन्स पहनती लडकी,
आज साडी पहनती सीख गई.
पियर मेँ जैसे बहती नदी,
आज ससुराल की नीर बन गई.
रोज मजे से पैसे खर्च करती लडकी,
आज साग-सब्जी का भाव करना सीख गई.
कल तक FULL SPEED स्कुटी चलाती लडकी,
आज BIKE के पीछे बैठना सीख गई.
कल तक तो तीन टाईम फुल खाना खाती लडकी,
आज ससुराल मेँ तीन टाईम का खाना बनाना सीख गई.
हमेशा जिद करती लडकी,
आज पति को पुछना सीख गई.
कल तक तो मम्मी से काम करवाती लडकी,
आज सासुमा के काम करना सीख गई.
कल तक तो भाई-बहन के साथ झगडा करती लडकी,
आज ननंद का मान करना सीख गई.
कल तक तो भाभी के साथ मजाक करती लडकी,
आज जेठानी का आदर करना सीख गई.
पिता की आँख का पानी,
ससुर के ग्लास का पानी बन गई.
फिर भी लोग कहते मेरी बेटी ससुराल जाने लग गई !
- सतीश शर्मा
Tuesday, December 11, 2012
एक फकीर !
पीपल, बरगद, महुआ, नीम,
धीमर, छिप्पी, टौंक, हकीम,
पंडित, ठाकुर, राम, रहीम,
धीमर, छिप्पी, टौंक, हकीम,
पंडित, ठाकुर, राम, रहीम,
कैसे सबकी बदल गई है देखो तो तकदीर,
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
रामू पंडित, भोला धोबी,
दल्लू धीमर, कालू छिप्पी
बलबीरे ठाकुर की खोली
वो बदलू कुम्हार की बोली
जात बताते नाम नहीं ये
व्यक्ति की पहचान बने थे
अब से पहले कभी नही यूं
जात के नाम पे लोग तने थे
कुछ पढे लिखे पैसे वालों ने रची नई तहरीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
अपनी किस्मत, अपना हिस्सा,
सबका अपना अपना किस्सा,
कोई बडी जमीं का मालिक
कोई बोये बिस्सा बिस्सा,
खेत किसी के किसी की मेहनत
फसलें सब साझी होती थीं
सारे गांव की जनता मिलकर
खेतों में फसलें बोती थीं
ऊंच नीच, बडके छोटे की खिंच गई एक लकीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
पाठशालाओं के रस्ते अब,
कालेज पहुंच रहे हैं गांव.
सभ्य होने की इस कोशिश में
सभ्यता की डूबी नांव
अफसर, मालिक और अमीर,
बनते देखें गांव के लोग.
धीरे धीरे से हमने अब,
छंटते देखे गांव के लोग
आपसदारी और प्रेम की टूट गई तस्वीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर !
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
रामू पंडित, भोला धोबी,
दल्लू धीमर, कालू छिप्पी
बलबीरे ठाकुर की खोली
वो बदलू कुम्हार की बोली
जात बताते नाम नहीं ये
व्यक्ति की पहचान बने थे
अब से पहले कभी नही यूं
जात के नाम पे लोग तने थे
कुछ पढे लिखे पैसे वालों ने रची नई तहरीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
अपनी किस्मत, अपना हिस्सा,
सबका अपना अपना किस्सा,
कोई बडी जमीं का मालिक
कोई बोये बिस्सा बिस्सा,
खेत किसी के किसी की मेहनत
फसलें सब साझी होती थीं
सारे गांव की जनता मिलकर
खेतों में फसलें बोती थीं
ऊंच नीच, बडके छोटे की खिंच गई एक लकीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर.
पाठशालाओं के रस्ते अब,
कालेज पहुंच रहे हैं गांव.
सभ्य होने की इस कोशिश में
सभ्यता की डूबी नांव
अफसर, मालिक और अमीर,
बनते देखें गांव के लोग.
धीरे धीरे से हमने अब,
छंटते देखे गांव के लोग
आपसदारी और प्रेम की टूट गई तस्वीर
गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर !
- राजीव यादव
विमोचन !
इलाहाबाद। कवयित्री डॉ. नन्दा शुक्ला की कवितायें जीवंत हैं, उन्होंने
अपने आप-पास के परिदृश्य को जिस रूप में देखा है उसी रूप में रेखांकित कर
दिया है, समाज को आईना दिखाने का भूरपूर प्रयास किया है। इस हिसाब से इनकी
कवितायें बेहद महत्वपूर्ण हैं, हमें ऐसे लोगों के साहित्य आने का स्वागत
करना चाहिए। गुफ्तगू पब्लिकेशन ने इनकी कवितायें प्रकाशित करके एक अच्छा
संदेश दिया है। यह बात प्रसिद्ध साहित्यकार अजामिल ने डॉ. नन्दा शुक्ला के
काव्य संग्रह ‘नेह निर्झर’ के विमोचन अवसर पर कही। गुफ्तगू द्वारा रविवार
को महात्मा गांधी अंतरराश्टीय विश्वविद्याल के क्षेत्रीय सभागार में विमोचन
समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें श्री अजामिल मुख्य अतिथि के रूप में
मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। मेयर अभिलाशा
गुप्ता ने कहा कि साहित्य जगत में एक और महिला आना बेहद सुखद संदेश है,
उन्होंने कहाकि महिलायें समाज के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, और यह
संवेदनशीलता नंदा शुक्ला की कविताओं में स्पश्ट रूप स दिख रहा है। डॉ. ने
अपने वक्तव्य में काव्य सृजन के शुरूआती दिनों की बात की और अपनी प्रतिनिधि
कवितायें सुनाईं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिश्ठ शायर इक़बाल दानिश ने कहा कि पुलिस विभाग में दारोगा के पद पर कार्यरत सुश्री शुक्ला ने बहुत अच्छी कविताओं का सृजन किया है, हमें ऐसी कविताओं का तहेदिल से स्वागत करना चाहिए। हां एक बात जरूर है कि उन्हें छंदबद्ध कविताओं का भी सृजन करना चाहिए। कार्यक्रम के संयोजक शिवपूजन सिंह ने लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य के बरगद के नीचे बहुत से कोंपलें पल्लवित होती हैं उम्मीद है कि डा नन्दा की काव्य रचना भी उसी तरह से पल्लवित होगी। सह संयोजक वीनस केसरी ने बताया विमोचन समारोह में हर बार कुछ चुए लोगों कवियों-शायरों से ही काव्य पाठ कराया जाएगा। कार्यक्रम के दूसरे दौर में एहतराम इस्लाम, अख़्तर अज़ीज़, रीतंधरा मिश्रा, स्नेहा पांडेय, डा. मोनिका नामदेव और अनुराग अनुभव ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर शैलेंद्र जय, रमेश नाचीज,तलब जौनपुरी,विपीन श्रीवास्तव,शुभ्रांशु पांडेय,सुशील द्विवेदी, राजेश कुमार, शाहनवाज आलम, हुमा अक्सीर, शादमा बानो, शाहिद इलाहाबादी, विवके सत्यांशु, राजेन्द्र कुमार सिंह, सौरभ पांडेय, जयकृश्ण राय तुशार, दिव्या सिंह, वंदना कुशवाहा आदि प्रमुख रूप से मौजूद थे। अंत में कार्यक्रम के संयोजक शिवपूजन सिंह ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।
कलम क्यूं बेबाक हो जाती है ?
ये कलम भी न मानती ही नहीं
क
जानती है इसे पता है ये आभासी दुनिया है
यहाँ कभी कभी तो इंसान की पहचान ही संदिग्ध होती है
क्या बुरा मानना क्यूं दुखी होना
क्या बुरा मानना क्यूं दुखी होना
illusion - world --मतलब ही यही होता है
कुछ भी बोल दो
कुछ भी बोल दो
ये तो दस्तूर है यहाँ का
पर बेचारी कलम क्या जाने उसे नहीं आती हिप्पोक्रेसी
वो बोली मुझे क्या पता
वो बोली मुझे क्या पता
मुझे तो लगा ये सपनों की दुनिया है
यहाँ मै आराम से चल सकती हूं
यहाँ मै आराम से चल सकती हूं
और तुम्हारी जो वाल है
वो डायरी है तुम्हारी
वो डायरी है तुम्हारी
सफे दर सफे सैर करना ह्क़ है मेरा
फिर भडक कर बोली कलम मुझसे
फिर भडक कर बोली कलम मुझसे
क्या करना है तुम्हें
मेरा जो दिल करेगा
मेरा जो दिल करेगा
लिखूंगी कभी तुम्हारे दिल की बात
तो कभी आसपास की हलचल
क्यों परेशान हो
तुम लेखक कवि
या साहित्यकार नहीं हो तो क्या
कलम हूं मै तुम्हारी
कलम हूं मै तुम्हारी
जब तक मेरी तुम्हारी निभेगी
मै तुम्हारी डायरी पर चलती रहूंगी
मै तुम्हारी डायरी पर चलती रहूंगी
हाँ ये बात और है थोड़ी बेबाक हूं मै
लिख देती हूं
पर किसी का अपमान तो नहीं करती
पर किसी का अपमान तो नहीं करती
अपनी ही वाल पर चलती हूं न
अपने सफे पर सैर करना कोई गुनाह है क्या
चलो छोडो जाने दो
क्या सोचना इस पर
कुछ तो लोग कहेंगे
कुछ तो लोग कहेंगे
लोगो का काम है कहना !
- दिव्या शुक्ला
Wednesday, December 5, 2012
जय श्री श्याम !
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ भरे तेरी हाजरी,करते हैं तेरा मनुवार
दीन करे तेरी चाकरी,आते दर पर ले परिवार
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ भरे तेरी हाजरी,करते हैं तेरा मनुवार
दीन करे तेरी चाकरी,आते दर पर ले परिवार
एक भरोसा तेरा मुझको, लाज मेरी है तेरे हाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
मैं जो तुझे बुलाना चाहूँ.,घर आँगन में मेरे श्याम
सोच-सोच कर मैं शरमाऊं,कहाँ बिठाऊंगा तुझे श्याम
नहीं बिछाने को है चादर, नहीं है सर पर मेरे छात
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सुदामा के तन्दुल भाये, झूठे बैर शबरी के खाये.....
दुर्योधन का महल त्याग कर,विदुराईन के घर तुम आये
कब आओगे घर तुम मेरे,टीकम' से करने तुम बात
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवर,हो या तुम दीनों के नाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
मैं जो तुझे बुलाना चाहूँ.,घर आँगन में मेरे श्याम
सोच-सोच कर मैं शरमाऊं,कहाँ बिठाऊंगा तुझे श्याम
नहीं बिछाने को है चादर, नहीं है सर पर मेरे छात
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सुदामा के तन्दुल भाये, झूठे बैर शबरी के खाये.....
दुर्योधन का महल त्याग कर,विदुराईन के घर तुम आये
कब आओगे घर तुम मेरे,टीकम' से करने तुम बात
तुम्हीं बताओ सेठ साँवरा,हो या तुम दीनों के नाथ
सेठ कहे तुझे सेठ साँवरा,दिन कहे तुझे दीनानाथ
तुम्हीं बताओ सेठ साँवर,हो या तुम दीनों के नाथ
Tuesday, December 4, 2012
नारी !
जीवन की आपा धापी में ,
अपना ही जीवन जीना भूल गयी |
कभी बेटी,बहन कभी पत्नी ,माँ बन जिया ,
अपने ही जीवन को तूल देना भूल गयी |
जीवन में अपनी कोई कद्र नहीं ,
समाज कहता है हम नहीं स्वतन्त्र कभी |
वसूलों की जंजीरों में जकड़ी ,
जीवन यापन मैं कर रही |
खुशियाँ सारी दूजो पर लुटा ,
गम को अपने सीने से लगा |
खामियों को अपने सर-माथे पर सजा ,
सुखों का दे दूजों को मजा ,
जीवन यापन ही कर रही ,
जीवन के झंझावतों को सह चुप ही रह रही |
||सविता मिश्रा||
अपना ही जीवन जीना भूल गयी |
कभी बेटी,बहन कभी पत्नी ,माँ बन जिया ,
अपने ही जीवन को तूल देना भूल गयी |
जीवन में अपनी कोई कद्र नहीं ,
समाज कहता है हम नहीं स्वतन्त्र कभी |
वसूलों की जंजीरों में जकड़ी ,
जीवन यापन मैं कर रही |
खुशियाँ सारी दूजो पर लुटा ,
गम को अपने सीने से लगा |
खामियों को अपने सर-माथे पर सजा ,
सुखों का दे दूजों को मजा ,
जीवन यापन ही कर रही ,
जीवन के झंझावतों को सह चुप ही रह रही |
||सविता मिश्रा||
थोडा करीब तो आओ !
आधी रात बीत चुकी थोडा करीब तो आओ
लेकर आगोश में अपनें कुछ तो तरस खाओ
लेकर आगोश में अपनें कुछ तो तरस खाओ
मौसम तो आयेंगे और आकर जाते ही रहेंगे
हम एक दूजे से रुठते और मनाते ही रहेंगे
आज शबनमी बूँदे फूलो को तरस रहे हैं
ऋतु है जवाँ आज और उमंगे बरस रहे हैं
" दीश " के उलझन को कुछ तो सुलझाओ
आधी रात बीत चुकी थोडा करीब तो आओ
लेकर आगोश में अपनें कुछ तो तरस खाओ
.....संकलन ॥ मेरी कविता ॥
- जगदीश पांडेय " दीश "
हम एक दूजे से रुठते और मनाते ही रहेंगे
आज शबनमी बूँदे फूलो को तरस रहे हैं
ऋतु है जवाँ आज और उमंगे बरस रहे हैं
" दीश " के उलझन को कुछ तो सुलझाओ
आधी रात बीत चुकी थोडा करीब तो आओ
लेकर आगोश में अपनें कुछ तो तरस खाओ
.....संकलन ॥ मेरी कविता ॥
- जगदीश पांडेय " दीश "
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