Tuesday, March 29, 2011

ब्रजबासिन संग जो होरि मनाहि !

ब्रज की होरी का आनंद, उसमें छुपी ब्रज की संस्‍कृति, जो आज भी युगों से राधा-कृष्‍ण के निश्‍छल प्रेम की अनुपम सौगात है। उसी होली को समर्पित छंदात्मक शैली में गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' की यह मौलिक रचना आप सभी के लिए प्रस्तुत है। सभी लोगों ने इस शैली की कविताएँ अपने पाठ्यक्रम में पढ़ी होंगी, फिर भी यदि किसी शब्द, किसी छंद का भावार्थ न समझ में आये तो टिप्पणी में पूछ लें, आकुल समाधान लेकर हाज़िर रहेंगे।


भोर भई खग नीड़ सूं छूटे
भयो कलरव कहीं टेर सुनायो.
होरि है आज भई सिहरन
अंग-अंग पुलकित मन-मन लहरायो. (1)

मन सौं न हटै, दृगअन में बसै
मनमोहिनी सूरत श्‍याम दुलारे.
कब कौन घड़ी पट थाप पड़ै
नहीं सूझ पड़ै, नहीं काज संवारे. (2)

बरजोरी करेंगी सखिअन सब
कहनो ही पड़ैगो बात बनाहि्.
पहलो रंग श्‍याम पड़ै अंग-अंग
यही श्‍याम सौं, होरि पे सौंह है खाहि.(3)

सब काज धरे, कल नाहीं पड़ै
कछु आहट पे दृग द्वारहि जाहि.
ओट सूं देखि, न श्‍याम हते
नहीं सखिअन टोली, सबै भरमाहि. (4)

देर भई कहीं बात न जाय
नाहिं सखिअन गईं, नाहि सखिअन आहि.
कहीं कोइ सखि आय तो, भेजूं संदेश मैं
श्‍याम कूं, कि कैसेहि, लाय बुलाहि. (5)

पहलो पग आंगन भी न पड्यो
रंग-रंग सौं भर्यो, जाहिं देखो सब ताहिं.
मातु, जनक हरसे मोहि देख के
का न खेलुं, सखिअन संग जाहि. (6)

कोई है पत्‍यो, ये अंग है रच्‍यो
रंग मन में बस्‍यो, बस तन है बच्‍यो.
बस एक बेर नैनन से रंगूं
नैनन से कहूं, हिय जाय खिंच्‍यो.(7)

सैं भोर कहि, आवन रसिया
रंग रसिक शिरोमणि, अजहूं न आये.
अब धूप चुभे, कल नाहिं छुपे
थके नैन बिकल, कहूं आये न आये.(8)

आई टोलि सखिन, बरजोरि करी
मैं नायं करी, सौंह याद कराहि.
जाओ सखि कहो, ब्रजसुंदर सौं
कैसेहि पिंड, छुड़ावन आहि.(9)

चल बृषभानुजा, खेलहि होरि
चढ्यो दिन कब तक, बाट निहारहि.
नाहि पड़ी निर्मोहि श्‍यामहि
ज्‍यों तू टक-टक, नैन निहारहि.(10)

ज्‍यों ‘आकुल’ मैं, श्‍यामहि ‘आकुल’
होंगे सखि कछु और निहारहि.
जाओ तुमहि, भजि कै दैखो
सखि श्‍याम तो नाहिं फंसे, कित माहि.(11)

ललिता सखिअन, सब कूं सौं है जो
एक भी बूंद, कै रंग लगाहि.
सौं लीनी मैं, रंग रसिया सूं
पहल करूं फिर, गाम समाहि.(12)

होरि है, होरि है तान पड़ी
कानन सखिअन सब, चीस के नाहि.
देख गवाख मुंडेरन द्वारहि
शयाम को टोला तो, आवहि नाहि.(13)

झांई पड़ी, जो अबीर छटी
घनश्‍याम घिरे, ब्रजबासिन माहि.
राह बने नहिं, घिरि-घिरि सब जन
पोतहि रंग-बिरंगे श्‍यामहि.(14)

टीस पड़ी सखि कौनहु अंग
बच्‍यो बे रंग कैं, रंग समाहि.
जा सखि बोल, बचा मैं राख्‍यो
हिय ‘आकुल’ पर, अब कब ताहिं.(15)

देख बिकल, नैनन अंसुअन, सखि
दौड़ि सबै पट, खोल किवारहि.
भागि ज्‍यूं पवन चले, बरखा ऋतु
टीस सूं भर हिय, कौन दिशा रहि.(16)

बेग सूं टोला, भर्यो सखिअन
सब ब्रजबासिन के बीच में जाहि.
कैसो सिंगार रच्‍यो है निसर्ग कि
ग्‍वाल बाल सब, सखिअन माहि.(17)

सखिअन पोति, ग्‍वाल लिपटाहि सब
ग्‍वाल के होश है, राखि बिगाड़हि.
श्‍यामहि राह करी, करि सैन सूं
बात कहि, कोउ बाट निहारहि.(18)

रंगरेली रंग देखि के कामत
आन पड़े सब, बीचन माहि.
श्‍याम चले ढक पीताम्‍बर
इक ग्‍वाल के माथे पे, डार के नाहि.(19)

कह ‘आकुल’ सब द्वार खुले
दस दिशा खुली, जो दृश्‍य दिख्‍यो.
भरि-भरि अंग-अंग रंग-रंग में रच्‍यो
संग-संग सब ब्रज, हरसाय खिल्‍यो.(20)

छिपे कहां घनश्‍याम घनन
वृषभानुजा ओट छिपे सकुचाहि.
ढूंढ सकौ तो ढूंढ लो आवन
बैठि पलक पल नैन बिछाहि.(21)

ओट सूं देखहि श्‍याम बिकल
हिय हाथ में आय पड्यो अब नाहि.
’श्‍याम’ कहि, निक ध्‍यान बटायो
दौड़ पड़ि, घनश्‍याम सराहि.(22)

ठिठक निअर खड़ि, श्‍याम निहारन
लागि तबहि, नैनन भर आहि.
हाथ उठैं, जैसे हि रंग ले वहिं
श्‍याम ने करि, बरजोरि उठाहिं.(23)

बाहु मैं लै कसि, लाल कपोल
गुलाबी करे, तब भींच के नाहिं.
तन स्‍वेद भर्यो, मन भेद भर्यो
रंग सेज कर्यो, रंगरेज की नाहिं.(24)

‘होरि’ है टोला घुस्‍यो, घर गूंज्‍यो
मृदंग, ढप, झांझ की ताल सुनाहि.
हर ग्‍वाल बन्‍यो, एक श्‍याम सुंदर
हर सखी खड़ी, राधा बन आहि.(25)

गोकुल, बिंदावन, बरसाने वा
नंद के गाम की होरी मनाहि.
आज भी रेणु अबीर बने
जमुना जल की रंगरोरी बनाहि.(26)

कह ‘आकुल’ महारास रच्‍यो
ब्रजबासिन संग जो होरि मनाहि.
आज भी प्रेम के पथिक कहें
ब्रज की हर नारि में राधा समाहि.(27)

होली के कई रंग (छोटी कविताएँ और क्षणिकाएँ)

गुलाल की छींटें
जो बिखराए थे कभी राहों में
मेरा फागुन
आज भी महका जाती हैं
छूती हैं हौले से मुझे
मन चन्दन हो जाता है
-------------------------------
सामने थाल में हो जब
बर्फी, गुझिया रसीले
तो मीठी है होली
पर हो जब उसमें
भूख, बेबसी, गरीबी
तो कहो कैसी है होली?
------------------------------
रंग तुम्हारे
चुपचाप मेरे जीवन में
चले आते हैं
बेनूर चूनर पर
बरस
मुझ में समा जाते हैं
मै सतरंगी हो जाती हूँ

-------------------------------
रंग पर चढ़ के
शब्द तुम्हारे
गलियारे में उधम मचाते हैं
रात डेवड़ी पर
औंधेमुँह सो जाते हैं
फींके सपने मेरे
इन्द्रधनुषी हो जाते हैं
-------------------------------
बचा सबकी नज़र
मुझ पर फेंका
प्रेम रंग
उस का अभ्रक
चुभता है आज भी आँखों में
हर होली आँखें बरस जाती हैं
-------------------------------
पकवानों की मेज पर
कहकहों की भीड़ में
उन मासूम हाथों ने कुछ माँगा
झिड़कियां, दुत्कार, फफ्तियाँ
सभ्य लोगों की सभ्यता
कुछ यूँ मिली उसको
नौकर ने हाथ पकड़
बाहर का रास्ता दिखलाया
वो सहमी टुकुर-टुकुर देखती रही
महक से ही पेट भरती रही
यहाँ रंग और भंग का
खेल चलता रहा
वो भूख के अंधियारों में भटकती रही
-------------------------------------
होली की मस्ती में
खेला खूब रंग
उधड़ी त्वचा बाल गिरा
आँखें हो गईं लाल
टेसू के रंग नहीं
रसायनिक हैं अबीर गुलाल
---------------------------------------
महँगाई की मार
गरीबों के रसोई पर पड़ती है
इनके घर
गुझिया कहाँ तलती है
रंग है नहीं
तो कीचड़ से चलते हैं काम
सोचती हूँ
क्या त्यौहार में भी नहीं आते हैं
इनके घर भगवान
-------------------------------------
बुराई जली
प्रह्‌लाद बचा
तो होली का रंग सजा
आज चहुँओर है
होलिका का राज
कोने में जल रहा प्रह्‌लाद
फिर कैसी होली है आज

रचना श्रीवास्तव

तब समझना कि यार होली है !

गुरु देव पंकज जी ने अपनी ग़ज़लों की कक्षा में एक होम वर्क दिया था.तभी "होली" काफिये पर ये ग़ज़ल लिखी थी.उस काफिये पर बहुत से सहपाठियों ने बहुत उम्दा रचनाएँ लिखीं. उम्मीद करता हूँ कि मेरा प्रयास भी शायद पसंद आए.

प्यार जिनके लिए ठिठोली है
सोच उनकी हुजूर पोली है

बर्फ रिश्तों से जब पिघल जाए
तब समझना की यार होली है

याद का यूँ नशा चढ़े तेरी
भंग की ज्यूँ चढाई गोली है

गुफ्तगू का मज़ा कहाँ प्यारे
बात गर सोच सोच बोली है

मस्तियां देख कर नहीं आतीं
ये महल है कि कोई खोली है

बोल कर झूट ना बचा कोई
सोच मेरी जनाब भोली है

आप उस पर यकीन मत करना
वो सियासत पसंद टोली है

खूब रब ने दिया तुझे नीरज
दिल मगर क्यों बिछाए झोली है

- कवि कुलवंत सिंह

किससे खेलूँ होली रे !

वैसे तो होली जा चुकी है..लेकिन रंग अभी भी चढ़े हुए हैं...

पी हैं बसे परदेश,

मै किससे खेलूँ होली रे !

रंग हैं चोखे पास

पास नही हमजोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

देवर ने लगाया गुलाल,

मै बन गई भोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

ननद ने मारी पिचकारी,

भीगी मेरी चोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

जेठानी ने पिलाई भाँग,

कभी हंसी कभी रो दी रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

सास नही थी कुछ कम,

की उसने खूब ठिठोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

देवरानी ने की जो चुहल

अंगिया मेरी खोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

बेसुध हो मै भंग में

नन्दोई को पी बोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

- कवि कुलवंत सिंह

दोहा गाथा सनातन गोष्ठी ८ दोहा है रस-खान !

होली रस का पर्व है, दोहा है रस-खान.
भाव-शिल्प को घोंट कर, कर दोहा-पय-पान.

भाव रंग अद्भुत छटा, ज्यों गोरी का रूप.
पिचकारी ले शिल्प की, निखरे रूप अनूप.

प्रतिस्पर्धी हैं नहीं, भिन्न न इनको मान.
पूरक और अभिन्न हैं, भाव-शिल्प गुण-गान.

रवि-शशि अगर न संग हों, कैसे हों दिन-रैन?
भाव-शिल्प को जानिए, काव्य-पुरुष के नैन.

पुरुष-प्रकृति हों अलग तो, मिट जाता उल्लास.
भाव-शिल्प हों साथ तो, हर पल हो मधु मास.

मन मेंरा झकझोरकर, छेड़े कोई राग.
अल्हड लाया रंग रे!, गाये मनहर फाग

महकी-महकी हवा है, बहकी-बहकी ढोल.
चहके जी बस में नहीं, खोल न दे, यह पोल.

कहे बिन कहे अनकहा, दोहा मनु का पत्र.
कई दुलारे लाल हैं, यत्र-तत्र-सर्वत्र.

सुनिये श्रोता मगन हो, दोहा सम्मुख आज।
चतुरा रायप्रवीन की, रख ली जिसने लाज॥

बिनटी रायप्रवीन की, सुनिये शाह सुजान।
जूठी पातर भखत हैं, बारी बायस स्वान॥

रसगुल्‍ले जैसा लगा, दोहे का यह पाठ ।
सटसट उतरा मगज में, हुए धन्य, हैं ठाठ ॥

दोहा के दोनों पदों के अंत में एक ही अक्षर तथा दीर्घ-लघु मात्रा अनिवार्य है.

उत्तम है इस बार का,
२ १ १ २ १ १ २ १ २ = १३
दोहा गाथा सात |
२ २ २ २ २ १ = ११
आस यही आचार्य से
२ १ २ १ २ २ १ २ = १३
रहें बताते बात |
१ २ १ २ २ २ १ = ११

सीमा मनु पूजा सुलभ, अजित तपन अवनीश.
रवि को रंग-अबीर से, 'सलिल' रंगे जगदीश.

चलते-चलते फिर एक सच्चा किस्सा-

अंग्रेजी में एक कहावत है 'power corrupts, absolute power corrupts absolutely' अर्थात सत्ता भ्रष्ट करती है तो निरंकुश सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है, भावार्थ- 'प्रभुता पाहि काहि मद नाहीं' .
घटना तब की है जब मुग़ल सम्राट अकबर का सितारा बुलंदी पर था. भारत का एकछत्र सम्राट बनाने की महत्वाकांक्षा तथा हर बेशकीमती-लाजवाब चीज़ को अपने पास रखने की उसकी हवस हर सुन्दर स्त्री को अपने हरम में लाने का नशा बनकर उसके सिर पर स्वर थी. दरबारी उसे निरंतर उकसाते रहते और वह अपने सैन्य बल से मनमानी करता रहता.
गोंडवाना पर उन दिनों महारानी दुर्गावती अपने अल्प वयस्क पुत्र की अभिभावक बनकर शासन कर रही थीं. उनकी सुन्दरता, वीरता, लोकप्रियता, शासन कुशलता तथा सम्पन्नता की चर्चा चतुर्दिक थी. महारानी का चतुर दीवान अधार सिंह कायस्थ तथा सफ़ेद हाथी 'एरावत' अकबर की आँख में कांटे की तरह गड रहे थे क्योंकि अधार सिंग के कारण राज्य में शासन व्यवस्था व सम्रद्धता थी और यह लोक मान्यता थी की जहाँ सफ़ेद हाथी होता है वहाँ लक्ष्मी वास करती है. अकबर ने रानी के पास सन्देश भेजा-

अपनी सीमाँ राज की, अमल करो फरमान.
भेजो नाग सुवेत सो, अरु अधार दीवान.

मरता क्या न करता... रानी ने अधार सिंह को दिल्ली भेजा. अधार सिंह की बुद्धि की परख करने के लिए अकबर ने एक चाल चली. मुग़ल दरबार में जाने पर अधार सिंह ने देखा कि सिंहासन खाली था. दरबार में कोर्निश (झुककर सलाम) न करना बेअदबी होती जिसे गुस्ताखी मानकर उन्हें सजा दी जाती. खाली सिंहासन को कोर्निश करते तो हँसी के पात्र बनाते कि इतनी भी अक्ल नहीं है कि सलाम बादशाह सलामत को किया जाता है गद्दी को नहीं. अधार सिंह धर्म संकट में फँस गये, उन्होंने अपने कुलदेव चित्रगुप्त जी का स्मरण कर इस संकट से उबारने की प्रार्थना करते हुए चारों और देखा. अकस्मात् उनके मन में बिजली सी कौंधी और उन्होंने दरबारियों के बीच छिपकर बैठे बादशाह अकबर को कोर्निश की. सारे दरबारी और खुद अकबर आश्चर्य में थे कि वेश बदले हुए अकबर की पहचान कैसे हुई? झेंपते हुए बादशाह खडा होकर अपनी गद्दी पर आसीन हुआ और अधार से पूछा ki उसने बादशाह को कैसे पहचाना?

अधार सिंह ने विनम्रता से उत्तर दिया कि जंगल में जिस तरह शेर के न दिखने पर अन्य जानवरों के हाव-भाव से उसका पता लगाया जाता है क्योंकि हर जानवर शेर से सतर्क होकर बचने के लिए उस पर निगाह रखता है. इसी आधार पर उन्होंने बादशाह को पहचान लिया चूकि हर दरबारी उन पर नज़र रखे था कि वे कब क्या करते हैं? अधार सिंह की बुद्धिमानी के कारण अकबर ने नकली उदारता दिखाते हुए कुछ माँगने और अपने दरबार में रहने को कहा. अधार सिंह अपने देश और महारानी दुर्गावती पर प्राण निछावर करते थे. वे अकबर के दरबार में रहते तो जीवन का अर्थ न रहता, मन करते तो बादशाह रुष्ट होकर दंड देता. उन्होंने पुनः चतुराई से बादशाह द्वारा कुछ माँगने के हुक्म की तामील करते हुए अपने देश लौट जाने की अनुमति माँग ली. अकबर रोकता तो वह अपने कॉल से फिरने के कारण निंदा का पात्र बनता. अतः, उसने अधार सिंह को जाने तो दिया किन्तु बाद में अपने सिपहसालार को गोंडवाना पर हमला करने का हुक्म दे दिया. दोहा बादशाह के सैन्य बल का वर्णन करते हुए कहता है-

कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान?
कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

इक लख रन मां मुगलवा, दुई लख वीर पठान.
तिन लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान.

असाधारण बहादुरी से लम्बे समय तक लड़ने के बाद भी अपने देवर की गद्दारी का कारण अंततः महारानी दुर्गावती, अधार सिंह तथा अन्य वीर अपने देश और आजादी पर शहीद हो गये. मुग़ल सेना ने राज्य को लूट लिया. भागते हुए लोगों और औरतों तक को नहीं बख्शा. महारानी का नाम लेना भी गुनाह हो गया. जनगण ने अपनी लोकमाता को श्रद्धांजलि देने का एक अनूठा उपाय निकाल लिया. दुर्गावती की समाधि के रूप में सफ़ेद पत्थर एकत्र कर ढेर लगा दिया गया, जो भी वहाँ से गुजरता वह आस-पास से एक सफ़ेद कंकर उठाकर समाधि पर चढा देता. स्वतंत्रता सत्याग्रह के समय भी इस परंपरा का पालन कर आजादी के लिए संग्घर्ष करने का संकल्प किया जाता रहा. दोहा आज भी दुर्गावती, अधार सिंह और आजादी के दीवानों की याद दिल में बसाये है-

ठाँव बरेला आइये, जित रानी की ठौर.
हाथ जोर ठंडे रहें, फरकन लगे बखौर.

अर्थात यदि आप बरेला गाँव में रानी की समाधि पर हाथ जोड़कर श्रद्धाभाव से खड़े हों तो उनकी वीर गाथा सुनकर आपकी भुजाएं फड़कने लगती हैं. अस्तु... वीरांगना को महिला दिवस पर याद न किये जाने की कमी पूरी करते हुए आज दोहा-गाथा उन्हें प्रणाम कर धन्य है.

शेष फिर...

धरा का हो गया तन-मन लाल !

पंछी करें टीका
अम्बर भाल
धरा का हो गया तन-मन लाल
फागुन की
अँगुलियों में
सजा गीतों का छल्ला
नीले पीले
रंग चले
मचाते हुए हो हल्ला
ईद मिल होली से पूछे हाल
धरा का हो गया तन-मन लाल
रंगों भरी
चादर हटा
गुनगुनी धूप झांके
गुलाबी ठण्ड
थाम के चुनर
गलियों गलियों भागे
टेसू खिले हर बाग हर डाल
धरा का हो गया तन-मन लाल
गोरी की
हँसुली टूटी
नील पड़ा था हाथ
सजना की
ठिठोली हुई
पांव फिसला था हाट
लज्जावश हुए सुर्ख उसके गाल
धरा का हो गया तन-मन लाल
पापड़ चिप्स
छज्जे फैले
ताके बैठा कौवा
घर में
गुझिया चहक रही
बाग भटक रहा महुआ
ठंढाई पीके बदली चाल
धरा का हो गया तन-मन लाल

- रचना श्रीवास्तव

हे पुरुष !

हरसिंगार के फूलों से
आँगन में झरते हैं सपने
उनको समेटने में
कितना बिखरते हो तुम
नौकरी पर
अवहेलना और चुनौतियों का लावा
अंदर जज्ब करके
सुषुप्त ज्वालामुखी की तरह
शान्त सुलगते हो तुम
ममता की गुहार ,
और प्रेम की तकरार
के बीच
बेवख्त आये मेहमान की तरह
उपेक्षित होते हो तुम
अपनों में खिलते
उम्मीद के फूलों को
सीचने के लिए
श्रम की बूंदों में
पिघलते हो तुम
घर की धारा में बहते
चट्टानों से टकराते हो
पर बड़े होते बच्चों से
जब कुछ कहते हो
भिखारी के गीत की तरह
सुने जाते हो तुम
फिर भी प्रेम की चांदनी
आँगन में उतारने को
चौखट की हवा सवारने को
गुलमोहर सा
मुस्कुराते हो तुम

(कवियत्री-रचना श्रीवास्तव)

Monday, March 28, 2011

धूल, धूप, दोपहर !

प्रस्तुत कविता सनी कुमार की है। अपने बारे में बताते हुए ये कहते हैं कि नाम सनी है(जिससे आप लोगों का पहले ही तार्रुफ़ है)। पढ़ाई के नाम पे इग्नू से बी।ए का फॉर्म भर दिया है। ऐसा शायद इसलिए कहना पड़ रहा क्योंकि कॉलेज(रेगुलर) में फेल हुआ, तो कॉलेज छोड़ दिया था। उर्दू ज़ुबान के प्रति लगाव था, सो इसी साल उर्दू में डिप्लोमा(मज़ाक़-मज़ाक़ में) मुक्कमल कर लिया। बारिश में फुटबाल खेलना और भीगना पसंद है। ख़ाली वक़्त में कभी-कभार शतरंज(ग़लती से बचपन में एक दोस्त से सीख लिया था) खेल लेता हूँ। दिल्ली में ही पला-बढ़ा हूँ और पढ़ (हिंदी साहित्य पढने का शौक़ है मुझे) रहा हूँ। मालवीय नगर के एक मोहल्ले (जिसे लोग झुग्गी कहते है) में रहता हूँ। फिलहाल इस कमजात परिचय से ही काम चलाइये। फोटो (जिसमें मेरी शक्लोसूरत थोड़ी सी ठीकठाक हो) कभी आगे भेज दूँगा।
ईमेल- halfmoon_sunny@yahoo.इन

जल रहीं हैं दोपहरें
तवे-सी तप रहीं हैं सड़कें भी
खौल रहें हैं बी.आर.टी. बस स्टैंड
दिल्ली सरकार के

हवा धूल चखाती चल रही है

इसी नंगी धूप वो में आदमी बेंचता है
धूप के चश्मे
पसीने में तर एक लड़का लग रहा है आवाजें---
"रुमाल ले लो... रुमाल"

यहीं पे बैठा है मोची भी
अपनी छतरी को सूरज की तरफ़ करके
मुँह में बीड़ी दबाए हुए
धुँए से ज़्यादा धूल फाँक रहा है

भगवान जाने सूरज बाबा से
क्या डील हुई है इनकी


गाड़ियों के इंजन आग उगलते चल रहे हैं
जितनी महँगी गाड़ी
उतनी गर्म हवा...

मंटो ने लिखा है कहीं
"बम्बई में इतनी शदीद बारिश पड़ती है कि
आप की हड्डियाँ तक भिगो दे"
दिल्ली की गर्मी आपकी हड्डियाँ तो नहीं पिघलाती
आपकी चमड़ी से धुँआ ज़रूर उठा देती है...

भंवे सिकुड़ आईं हैं
चेहरे चिलचिलाये हुए हैं
लड़कियों की बगलें
और औरतों के ब्लाउज पसीने से परेशान हैं

सूरज आसमान पर नहीं
सब के चेहरे पे उग आया है जैसे
हलक़ में काँटे भी चुभ रहे हैं या यूँ कहूँ कि जैसे
मधुमक्खी ने डंक मारा हो

ब्लू लाइन बस का कंडक्टर
खा के गुटखा
छोड़ रहा है भभका
वो लड़की मुँह बिचकाती है
और दूर जाके खड़ी हो जाती है
बस पीटते हुए कंडक्टर
कान पे चिल्ला रहा सबके---
"आई.टी.ओ...आई.टी.ओ...मटरो...दिल्ली गेट...ऐ बस अड्डा..बस अड्डा..
बैठो.. ऐ आओ..आओ..आओ बस अड्डे वाले...

बस आ रहीं है लाल वाली
ए.सी. वाली है
चढ़ रहे है वो
जिनकी थोड़ा पैसा है जेब में
उतर रहें है दुगनी तेज़ी से
क्यूँकि ए.सी. बस का
ए.सी. ख़राब है

इसी बीच गुज़र रहा
दिल्ली जल बोर्ड का टैंकर
जीभ चिढ़ता हुआ...
पानी बिखेरता हुआ...

मुआवज़े !

मुआवजा ...
हाँ ठीक सुना तुमने
मुझे मुआवजा चाहिए
मुझे मुआवजा दो...
म्में...म्में...
मैं चीख़ रहा हूँ
चिल्ला रहा हूँ
हाँ.. हाँ मैं चिल्ला रहा हूँ
चीख़ रहा हूँ
मेरे गले की नसें
चटख कर
ढीली पड़ने से पहले तक
मैं चीखता रहूँगा
मेरी आँखों में उतर आया
ख़ून
बहने
टपकने
क्यों न लगे
मैं उसके बाद तलक चिल्लाता रहूँगा ...
मुआवजा बांटने का
बड़ा शौक़ है न तुम्हे
अब देते क्यों नही मुझे मुआवजा...!

रेल या बस दुर्घटना...
सड़क या कोई और दुर्घटना..
या किसी फर्जी मुठभेड़ में..
किसी जहरीले गैस काण्ड में...
नहीं...नहीं..शायद किसी
आतंकी या नक्सली हमले में..
या फिर किसी अंधी भीड़ ने ही..
पता नहीं ..?
मुझे ठीक से याद भी नहीं
इसलिए कि वक़्त मुझे बूढ़ा करके गुज़र गया...

लेकिन, अपनी लिजलिजी और झुर्रीदार
छाती ठोक कर कहता हूँ ..
मेरे बेटे की मौत मुआवज़े लायक है
इनमें से किसी एक में मेरा बेटा मर-खप गया..
दे दो हरामखोरों...
जिससे अपनी बेटी की शादी करा सकूं..

- सनी कुमार

बेलें !

ठूंठ था
नामालूम क्या नाम था उसका
खोखले से जिस्म से
अपनी उचटती हुई
सूखी छालें
टपकाया करता था
तेज़ हवाओं में


उन गुलाबी फूलों वाली

बेलों को
पता ही न चला
बस लिपटती चली आई
इस खोखले से जिस्म पे
लम्हा-लम्हा करके शरारती बेलें----
कभी छेडती उसके खुरदरे से
बदन को गुदगुदा के

और कभी ---

सुन लेती सारी दस्तानें उसकी
सहलाकर उसके जिस्म को
बड़ा खुश-खुश सा दिखता था
बेलों की बुनी
शॉल ओढ़कर वो

उस गली के कोठीवालों ने

कटवा दिया उसे

उस रोज़ बहुत रोया वो

ठूंठ पेड़
आखिर क्यूँ काटी जा रही हैं
गुलाबी फूलों वाली बेलें भी ??

-सनी कुमार

Saturday, March 26, 2011

कुछ भूलें कुछ याद रहा...

" सूरज चांद सितारे मेरे साथ में रहे
जब तक तेरे हाथ मेरे हाथ में रहे
शाख से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम
आंधियों से कह दो औकात में रहे "

तुम होते तो...

सपनों के महल में हम भी रहतें
चलते आसमान में
सितारों के पदचाप के साथ
हम भी मिलातें सुरताल
देखतें,
इस झिलमिल दुनिया को
अगर तुम होते...
और ही होता मेरे बहकने का अंदाज़
ज़ुबां पर यूं न पसरा होता सन्नाटा
चीरते हुए जो हर शोर को
आज दे रहा है यूं चुनौति
काश...
कि तुम होते
दुलारते,
मुझे पुचकारते
तो शायद मैं यूं ढीढ न होती
अक्खड़
जैसे पठार खड़ा हो
तूफान, बरसात
बदरंग कर देने वाले
थपेड़ों के बावजूद
निडर, निष्ठुर
न ख़ुशी में ख़ुशी
न ग़म में ग़म
काश कि तुम होते
मेरी आंखों से आंसू तो छलक गए होते...

ग्लैमर !!

कितना डराता है तुम्हे

तुम्हारा चेहरा???

जब तुम उतार देती हो

रंग-रोगन

चेहरे पर बन आए उस निशान को देखकर

क्या किलस उठती हो तुम...

जिसे झुर्रियां कहते हैं???

शायद दुख से भर जाती हो तुम

इसलिए आंख के तुरंत नीचे

उग आया है काला धब्बा

और कई बार कपाल पर दिखती हैं सिलवटें

दुबली होने का और कितना प्रयत्न करोगी तुम

खुद को बिना साज-सज्जा के

पहचान पाती हो तुम???

बड़ बड़ बड़ बड़ तुम्हारे होंठ

उफ्फ

सुंदर जुल्फों का राज

लोगों को बताओगी कभी???

कितना भ्रम फैलाया है तुमने,

कितनी-कितनी युवती-किशोरी रोज ही देखती है सपने

तुम्हारे जैसा होने का...

तुम कभी आओगी उस मंच पर

जहां से बयां होगा सिर्फ सच

उसे सुनेंगे तुम्हारे बच्चे भी

जो तबतक बड़े हो गए होंगे

लेकिन याद होगा उसे उसका पूरा बचपन

कह पाओगी कभी अपनी व्यथा

या फिर उसे भी ढाप दोगी किसी गाढ़े रंग से

जैसे ढाप देती हो आंखों के नीचे पड़े गढ्ढे को..

या फिर उगल दोगी सच

खत्म करोगी द्वंद

स्त्री, जागो

वस्तु मत बने रहो

वो तो तुम पहले भी थी

फिर आज क्या बदला तुमने ?

मैं बैल हांकूंगा !

बाबू!
यहां मन नहीं लगता
ओझल हो रहा है सबकुछ
बाबू...
बस! बस!
यहां मन नहीं लगता
चलो, चलो...
ये जगमग चांद सितारे नहीं बाबू
मुझे मद्दिम सी डिबिया में रहना है
यहां नहीं बाबू
यहां मन नहीं लगता
चिकनी जुबान, चिकने लोग, चिकना फर्श
मेरा पैर फिसलता है बाबू!
यहां नहीं दोस्त मेरे
मुझे बुद्धू बिल्लू के पास जाना है
नहीं, नहीं बाबू
यहां ना छोडे जाओ
इस शहर में मेरा दम घुटता है
हर कोई तमीज से बोलता है यहां
बाबू यहां मेरा घर नहीं
मुझे घर जाना है
मुझसे न होगी चाकरी
बैल जैसा न होना बाबू
मैं खेतों में बैल हांकूंगा
बस बाबू बस!
मुझे घर जाना है
यहां मेरा घर नहीं

तुम आओगे दोस्त ?

चंद लफ़्ज अब भी है मेरे पास
तुम आओं तो कहूं...
आओ न एक बार
मिलकर बैठें
वैसे ही...
सच पर डालकर पर्दा
देखें सपने जैसा कुछ-कुछ
तुम्हे याद है
क्या-क्या हम सोचा करते थें
देखते-देखते सच हो गए सारे
और हकीकत गुम गया
आओ न!
बैठें,
बातें करें...
शायद दूर हो जाए भ्रम
इस बात का,
कि सपनों के पीछे भागना सच नहीं है
बड़ी कसक है दोस्त...
खैर छोड़ो...
तुम्हें याद है
जब तुमने फोन पर कहा था
जान, कैसे आउं
पैसे खत्म हो गए हैं
फिर तुमने कहा
आने का मन भी है
क्या करूं?
और तुम आ गए थे न
पैसे उधार मांगे थे दोस्त ?
अब तो अपनी गाड़ी भी है तुम्हारे पास
फिर क्यों नहीं आते
आओ न एक बार
चंद लमहें उधार लेकर...