Sunday, September 18, 2011

सामानों का बलात्कार !

उफ्फ ये पकौड़े क्यों जल गये
क्योंकि जब मैं कढ़ाई में पकौड़े तल रही थी
मानस में रात की फिल्म चल रही थी
वो अभिसार था या था वो व्याभिचार...
पकौड़े अब जल कर काले हो गये थे
हां रात जब तुहारी इच्छा मेरी अनिच्छा पर भारी थी
क्या मैं समझौता कर हारी थी
पकौड़ों से अब धुआं निकल रहा था...
मानस कर रहा था कुछ प्रश्न
क्या विवाह का पर्याय है रति
क्या सेक्स ही है सात फेरों की परिणिति ।
मैं गैस पन्द कर सोचने लगी.....
जब भी मेरी अनिच्छा पर तुम्हारी इच्छा बली हुयी है
तब पतिव्रता की तमाम बातें मुझे बेहद खली हैं
हां मैं अगर हारी हूं
तो जीता कौन है???
अन्दर तो कोलाहल है
लब लेकिन मौन हैं।
बलात्कारी कब किससे जीत पाया है
सर्वप्रथम वह तो खुद से ही हारता आया है।
गणिका की भले ही इच्छा नहीं लेकिन सहमति तो होती है।
मैं तुम्हारी सहचरी की न इच्छा,न सहमति सिर्फ दुर्गति होती है।

मेरी इच्छा और दुर्गति के अन्तराल को

समाज समझे या न समझे
तुम तो समझ लो
प्यार और बलात्कार में फर्क होता है
तुम्हारे मन में भले ही प्रेम का भ्रम पला हो
मैं जानती हूं कि मैने
मौन रह कर भी
सिर्फ तुम्हें छला है।
लेकिन तुम भला कैसे जान पाते
ये बातें
क्योंकि तुम मुझसे नहीं,
सिर्फ मेरी देह से बातें कर रहे थे
तुमने तो सुना ही नहीं मेरे नयन क्या कह रहे थे ।
सुनते तो क्या सह पाते मेरे अंतर्नाद को
शायद बधिर होना आक्रान्ता की पहली आवश्यकता है
अब दोबारा बेसन घोल कर एक नयी सूर्य की अभ्यर्थना
के साथ एक नया निश्चय
अब और ऐसा नहीं चलने दूंगी
न मैं जलुंगी
न मेरे पकौड़े जलने दूंगी।


कविता की समाधि !

तुम वह जो टीला देख रहे हो
वह कविता की समाधि है।
कविता जो कभी वेदनाओं का मूर्त रुप हुआ करती थी
उपभोक्तावाद की संवेदनहीनता ने
उसकी हत्या कर दी है।
कविता जो चित्र बनाती थी
कविता जो संगीत सृजन करती थी
कविता जो भाव उद्वेलित करती थी
अब टी वी के हास्य मुकाबलों ,
मञ्चीय हास्य कवि सम्मेलनों
और ब्लौग्गरस की दुनिया में
शेष हो गयी है।
आज का युवा
बारहवीं पास या फेल
काल सेन्टर में बैठ
अमीरीकियों की नकल कर
शिकागो में होने की गलतफहमी का शिकार
विवेकानन्द हो गया है।
भाव कविता की पंक्तियों से निकल
शेयर बाजार और सेन्सेक्स के पर्याय हो गये हैं।
कविता अब प्रेम की भाषा नहीं
सड़क छाप Romeo’s की सेक्सी शायरी हो गयी है।
आज विवाह जब evolution के प्रकरण से दूर
वाणिज्यिक गठ बन्धन हो गया है
और तमाम सम्बन्धों की नींव
स्वार्थ की सीमेंट से जुड़ी हों
नित नये नये भगवानों
व आराध्यों के गढ़ने की प्रक्रिया में
हनुमान चालीसा से लालु चालीसा
का सफर तय करने में
कविता की मौत एक स्वाभाविक उपसंहार है।


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त्रिशंकु !

मैं भी आज त्रिशंकु सा
विमूढ
टंगा हुआ हूं
एक नितान्त व निजी
व्यक्तिगत स्वर्ग के भ्रम में
मन रोजमर्रे की जिन्दगी
से उपर
कुछ उठना चाहता है।
मन नहीं मानता
गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सहज नियम।
लेकिन मानस तो मानता है
सिर्फ दृष्टिगोचर को
अगोचर व्योम को पाने की
आकांक्षायें लिये
लियोनार्डो सा पंख फड़फड़ाता हूं
यह विश्वमित्र की समिधा की शक्ति है
या मेरी अपनी हठधर्मिता
व्योम हठात कुछ पास चला आता है।
मैं विगत कल
व आगामी कल
के मध्य तलाश रहा हूं
सत्य का धरातल॥
मिथ्या जगत से
सत्य या ब्रह्म
तक पहुंचने की उड़ान
में मुख्य व्यवधान
स्वयं मैं हूं।
मेरा अहम्
अपने स्थूल स्वरूप से बद्ध
गुरुत्वाकर्षण शक्ति की परिधि से
निकल नहीं पाता है
और मेरा आरोहण
बीच में थम जाता है।

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आजकल !

जब कई हाथ
उठते हैं साथ साथ
और कुछ उंचे स्वर में
हो रही हो बात
तब सत्ता चौंक कर
ढुंढती है
कहां बिछी है बिसात
उसे तो दिखती है सिर्फ शह और मात
सत्ता के अन्य संवेदना तंतु
तो दफ़न हैं बर्फ के नीचे
सत्तधारियों को सिर्फ
उठती हुयी हथेलियों की
उष्मा से बचा रखना है
उस संवेदना तंतु के उपर जमीं बर्फ को
यह बर्फ अगर पिघल गयी तो
सत्ता की सुरक्षा खतरे में होगी
बचा कर रखें उस बर्फ को
संवेदना तंतुओं को जिन्दा होने से रोके
तब ही यह सत्ता की कागज की नाव
अगले चुनाव तक
तैरती रह पायेगी
जब चुनाव जीतना
साधन न हो साध्य हो जाता है
तब चाहे कोई जीते
राष्ट्र हर हाल में
हारता आता है।
जब चारण चाणक्य का पद पाता है
तब नीति शास्त्र के नाम
प्रशस्ति गीत गाया जाता है
जब इन्दिरा इन्डिया का पर्याय कहाती हैं
तब भूखे अधनंगे भारत की थाली में
आंकड़ों की रोटी परोसी जाती है।
जन साधारण की जिजिविषा
में उन्हे दिखता है राजद्रोह
इस दृष्टिभ्रम की
वजह है सत्तधारियों की
पैसे की भूख
और सत्ता का मोह
जब नागरिकों के विरोध के स्वर को
को कानुन व सुरक्षा
के डण्डे से शान्त किया जाता है
तब जलियां वाला बाग याद आता है।
लेकिन सत्तधारी नहीं मानते
जिये हुये ऐतिहासिक सत्य को
कि निरीह जनता जब
राष्ट्र या राष्ट्रीयता से विमुख हो जाती है
तब ही विदेशी शक्तियां दांत गड़ाती हैं
कोई सैन्य दल तब काम नहीं आता है
और देश पर बाह्य शक्तियों का कब्जा हो जाता है।



केशव तिवारी की एक कविता !

केशव तिवारी समकालीन कविता में लोक चेतना को आवाज़ देने वाले महत्वपूर्ण कवि हैं । समय का दंश उनकी इस कविता में रेखांकित करने लायक है ।
हम खड़े थे (केशव तिवारी की एक कविता)
किससे बोलता झूठ
और किससे चुराता मुँह
किसकी करता मुँहदेखी
किसके आगे हाँकता शेखी
हर तरफ़ अपना ही तो चेहरा था
नावे तों बहुत थी
नदारद थी तो बस नदी
चेहरों पर थी दुखों की झाँई
जिसे समय ने रगड-रगड़ कर
और चमका दिया था
सारी कला एक अदद
शोकगीत लिखनें में बिला रही थी
जिसने भी रखा पीठ पर हाथ
बस टटोलने लगा रीढ़
हम खड़े थे समय के सामने
जैसे लगभग ढह चुकी
दीवारों वाले घर की चौखट पर
खड़ा हो कोई एक
मज़बूत दरवाज़ा ॥

इतना भी न हुआ..

जीने की तरह जीना,
मरने की तरह मरना
इतना भी न हुआ
कि बोलूं तो सुना जाऊं दूर तक
चलूं तो पथ में न आएं बाधाएं
गाऊं अपनी पसन्द के गीत कभी भी
बनाऊं कहीं भी सपनों का नीड़
इतना भी न हुआ.. न हुआ इतना भी
कि विश्वास के बदले पाऊं विश्वास
श्रम के बदले रोटी-पानी ।

गहराती रात जैसी नींद से निकल
पलकों की पीठ पर
सपनों की गठरी लिए
चल पड़ूं उछलता-कूदता
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ
बांझ कोख सी उदासी में
डूबी है दुनिया
जिसकी बेहतरी की उम्मीद में
जागती आंखें झुकी रहती हैं
क्षमा-प्रार्थना की मुद्रा में इन दिनों
होठों से धीमे- धीमे
निकलता है स्वर,
क्षमा ! क्षमा ! बस क्षमा !! कहते हैं हम एक-दूसरे से ।

क्षमा हे पितरों
तार नहीं सके हम तुम्हें
मुक्त न कर सके तुमको
आवागमन के दुश्चक्र से
कुन्द पड़ चुके हमारे इरादे
कौंधते और बुझते रहे अंधेरों में
हमारी स्मृतियों की गंगा में
आज भी तैरते हैं शव तुम्हारे
जिन्हें खींच कर तट पर लाएं
यह साहस हम जुटा ही नहीं पाए ।
क्षमा हे पृथ्वी
जल पावक गगन समीर
तुम्हारी विस्फोटक रोशनी में
चमक न सके हम कुन्दन बन
कात न सके चदरिया झीनी,
मिठास बिना ही ज़िन्दगी जीनी
नागवार हमें भी गुजरती थी।

क्या करें, कि एक शीर्षक-हीन कविता थे हम
पढ़े जा सकते थे बिना ओर-छोर
कहीं से भी, बीच में छोड़े जा सकते थे हम,
ज़िल्दों में बन्द, कुछ शब्द, हमें पता नहीं था
आलोचकों की भूमिका के बारे में
जैसे पता नहीं था पितरों को
मुक्ति का खुफ़िया रास्ता ।
एक शब्द चमक सकता था
अंधेरे में जुगनू बन
एक शब्द कहीं धमाके के साथ
फट सकता था
सोई चेतना के ऊसर में
एक शब्द को लोहे में
बदल सकते थे हम
धारदार बना सकते थे उसे
हमसे नहीं हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ।

क्षमा ! हे शब्द-ब्रह्म, क्षमा !!
बहुत पीछे छूट चुका बचपन
ठिठका खड़ा है
अन्धे कुंए की ओट पर
विस्फ़ारित मुंह उस कुंए के
एक अधर पर धरे पांव
अड़ा है, कहां है सुरसा मुंह कुंए का
दूसरा अधर
शून्य में उठा दूसरा पांव
आकाश में लटका पड़ा है ।
समय की तेज रफ़्तार सड़क पर
कई प्रकाश वर्ष पीछे
ठिठका खड़ा बचपन
भींगता है अदद एक
बरसाती घोंघे के बिना
गल जाती हैं किताबें
स्कूल जाने के रास्ते में
खेत की डांड़ पर
भींग जाता है किताबों का बेठन,
किताबों से प्रिय थे जिसे
इमली बेर आम चिलबिल
और रेडियो पर बजता विविध-भारती
उस बचपन से क्षमा,
कि हम अपराधी उस बचपन के
कुंए की तरह खड़े रहे हम
उसके रास्ते में
बिछ सकें नर्म घास की तरह
उभर सकें पांवों तले
ज़मीन की तरह
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ.. ।

पेड़ पर आधा अमरूद !

एक सुन्दर कविता की तरह
वह लटका है
पेड़ की कमसिन शाख पर

आते-जाते रहते हैं
फलों के आलोचक
कभी सुग्गे की तरह
तो कभी गौरैया की तरह

मुझे इतना पता है
कि परिन्दे जब आते हैं
पेड़ों पर, अपनी नुकीली ठोर से
कुरेदते हैं जब किसी
मीठे फल की पीठ,
तो उनके इस सुलूक में
उनके विवेक की भूमिका
उतनी नहीं होती
जितनी कि उनकी भूख की
हो सकती है

और, इतना तो आप भी
देख ही रहे होंगे
कि पेड़ पर कुछ अमरूद हैं
आधे खाए-जा-चुके

यह पूस का महीना है
एक फलते-फूलते मौसम में
यह कविता के अमरूद होने का समय है

एक दिन आऊंगा !

एक दिन आऊंगा
खटखटाऊंगा तुम्हारा दरवाज़ा
मुझसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में
तुम पूछोगे मेरे आने का मकसद
विरक्ति में डूबी आंखों से ।

उस दिन धीरे से चुपचाप
थमा जाऊंगा तुम्हें
जो कुछ भी होगा
मेरी झोली में ।

वह अगरबत्ती का एक
पैकेट भी हो सकता है
या फिर आधी-जली
मोमबत्ती का टुकड़ा, कोई मुरझाया सा फूल
या पुरानी ज़िल्द वाली
कोई किताब ।

कुछ नहीं पूछोगे तुम मुझसे
अगरबत्ती के बारे में, कि वह
जलेगी तो कमरों में कितनी
देर तक रहेगी सन्दल की ख़ुशबू
या कितनी दूर तलक जाएगी
मोगरे की गन्ध ।

मुझे यह भी बताने की
जरूरत नहीं होगी बाकी
कि मोमबत्ती के भीतर की
सुतली के जलने के दरम्यान
कितनी मोम पिघल कर
फैल गई है हमारे एकान्त में
या फिर कालिख की तरह
जम गई है हमारी सांसों में ।

और ताज्जुब तो यह कि
तुम जानना भी नहीं चाहोगे
कैसे मुरझा जाते हैं फूल दबे-दबे
किताबों के भीतर, और फैल जाता है
एक हाहाकार शब्दार्थों के बाहर की दुनिया में ।

उस दिन, न तो पूछ ही सकोगे तुम
न ही बता सकूंगा मैं
एक किताब की ज़िल्द के
पुराने होते जाने की इतिकथा, उस दिन, अभिव्यक्ति पाए बिना ही उठेंगी
कुछ कविताएं , भाप बन कर , पुरानी ज़िल्द वाली किताब से
और फुसफुसाती हुई कानों में
बताएंगी मेरे आने का मकसद ।

मुझसे पीछा छुड़ाना
नहीं होगा इतना आसान
कि मेरे पास होंगी कुछ
मामूली चीजें, मसलन एक अगरबत्ती का पैकेट
एक आधी-जली हुई मोमबत्ती
एक मुरझाया-सा फूल , या
पुरानी ज़िल्द वाली एक किताब ।

चुपचाप थाम लोगे तुम कोई एक

मामूली सी चीज मेरे हाथों से
और मैं लौटूंगा अपनी झोली में
सहेज कर कोई बहुत पुराना ख़त
जिसे तुमने संभालकर रखा होगा
मेरे लिये स्मृतियों के सन्दूक में ।

उस दिन
, आंखों में झिलमिलाते
तरल सन्धिपत्रों पर होंगे हमारे
अमिट हस्ताक्षर ।

कैसा यह देना
-लेना साथी, कैसा नक़द - उधार
कैसा अद्भुत यह जीवन व्यापार ।
नीलम सिंह की कविताएँ

नीलम सिंह का जन्म १३ जुलाई १९६७ को वाराणसी, उत्तर-प्रदेश में हुआ।पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से ये कविताएं लिख रही हैं।इन्हें मुक्तिबोध स्मृति सम्मान (१९९१),राजीव गांधी युवा कवि पुरस्कार(१९९१) आदि महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है।इनका पहला काव्य संग्रह"शब्द ईश्वर होते हैं" २००८ में प्रकाशित हुआ। नीलम सिंह ने "प्रेमचंद की कथा-भाषा एवं कथा-संवेदना" विषय पर डा. परमानन्द श्रीवास्तव के निर्देशन में शोध-कार्य किया और सम्प्रति कोलकाता में अध्यापन-कार्य से जुड़ी हैं।नीलम सिंह मूलत: भाव-बोध की कवि हैं।समकालीन कविता परिदृश्य में उपस्थित स्त्री-चेतना की कवियों के बीच इनकी कविताएं अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम हैं। प्रस्तुत हैं नीलम सिंह की कुछ कविताएं


१.एक पैगाम आकाश के नाम

आकाश, कब तक ओढ़ोगे
परंपरा की पुरानी चादर,
ढोते रहोगे
व्यापक होने का झूठा दंभ,
तुम्हारा उद्देश्यहीन विस्तार
नहीं ढक सका है
किसी का नंगापन
छोड़कर कल्पना, वास्तविकता पर उतर आओ,
भाई, अपने नीले फलक पर
इन्द्रधनुष नहीं
रोटियां उगाओ।

२.कविता

शब्दों के जोड़-तोड़ से
गणित की तरह
हल की जा रही है जो
वह कविता नहीं है
अपनी सामर्थ्य से दूना
बोझ उठाते-उठाते
चटख गयी हैं जिनकी हड्डियाँ
उन मजदूरों के
जिस्म का दर्द है कविता
भूख से लड़ने के लिये
तवे पर पक रही है जो
उस रोटी की गंध है कविता
उतार सकता है जो
खुदा के चेहरे से भी नकाब
वो मजबूत हाथ है कविता
जीती जा सकती है जिससे
बड़ी से बड़ी जंग
वह हथियार है कविता
जिसके आंचल की छाया में
पलते हैं हमारी आँखों के
बेहिसाब सपने
उस माँ का प्यार है कविता
जिसके तुतलाते स्वर
कहना चाहते हैं बहुत कुछ
उस बच्चे की नयी वर्णमाला का
अक्षर है कविता
कविता एकलव्य का अँगूठा नहीं है
कि गुरुदक्षिणा के बहाने
कटवा दिया जाय
वह अर्जुन का गाण्डीव है, कृष्ण का सुदर्शन चक्र।
कविता नदी की क्षीण रेखा नहीं
समुद्र का विस्तार है
जो गुंजित कर सकती है
पूरे ब्रह्माण्ड को
वह झंकार है कविता।

३.याचना

पुरवा, जब मेरे देश जाना
मेरी चंदन माटी की गंध
अपनी साँसों में भर लेना,
नाप लेना मेरे पोखर मेरे तालाब की थाह
कहीं वे सूखे तो नहीं,
झाँक लेना मेरी मैना की कोटर में
उसके अण्डे फूटे तो नहीं, लेकिन पुरवा
जब चंपा की बखरी में जाना
उसकी पलकों को धीरे से सहलाना
देखना, उसके सपने रूठे तो नहीं,
मेरी अमराईयों में गूँजती कोयल की कूक
कनेर के पीले फूल
सबको साक्षी बनाना
पूछना, धरती आकाश के रिश्ते
कहीं टूटे तो नहीं, क्या, मेरी सोनजुही
मुझे अब भी याद करती है
उसके वादे,झूठे तो नहीं।

४.भूल जाओ वामन

नहीं काट सकते
अतल में धँसी
मेरी जड़ों को
तुम्हारी नैतिकता के
जंग लगे भोथरे हथियार
मत आँको मेरा मूल्य
धरती आकाश से नहीं
आकाश धरती से सार्थक है
तुम्हारे पाँव हर बार की तरह
आदर्श का लम्बा रास्ता भूलकर
मेरे अस्तित्व की छोटी पगडण्डी
पर ही लौट आयेंगे
अपना विस्तार,भूल जाओ वामन
मेरी अस्मिता नापने में
तुम्हारे तीन पग छोटे पड़ जायेंगे।

Tuesday, September 13, 2011

माँ !


कब्र के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ,
तब कहीं जा कर, ज़रा थोड़ा सुकूँ पाती है माँ।

फिक्र में बच्चों की कुछ ऐसी घुल जाती है माँ,
नौजवाँ हो कर के भी, बूढ़ी नज़र आती है माँ।

रूह के रिश्तों की ये गहराइयाँ तो देखिये,
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ।

कब ज़रूरत हो मेरी बच्चों को इतना सोच कर,
जागती रहती हैं आँखें और सो जात है माँ।

चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जायें दोस्तों,
जब मुसीबत सर पे आ जाए, तो याद आती है माँ।

लौट कर सफर से वापस जब कभी आते हैं हम,
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ।

हो नही सकता कभी एहसान है उसका अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ।

मरते दम बच्चा अगर आ पाये न परदेस से,
अपनी दोनो पुतलियाँ चौखट पे धर जाती है माँ।

प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूँछो, जिनकी मर जाती है माँ। —

Sunday, September 11, 2011

सुरेश सेन निशांत की कुछ कविताएँ !!

गोपी ढाबे वाला !

बहुत दिनों बाद हुआ आना
इस पुराने शहर में
वहीं रुकता हूँ
वहीं खाता हूँ खाना
उसी बरसों पुरानी मेज पर
उस पुराने से ढाबे में।

कुछ भी नहीं बदला है

नहीं बदली है गोपी ढाबे वाले की
वह पुरानी-सी कमीज
काँधें पे पुराना गमछा
बातचीत का उसका अंदाज।

वैसा ही था

तड़के वाली दाल का भी स्वाद
तंदुरी रोटी की महक।

कुछ भी नहीं बदला

यहाँ तक की ग्राहकों की शक्लें
उनकी बोल-चाल का ढंग
ढाबे के बाहर खड़े सुस्ता रहे
खाली रिक्शों की उदासी तक।

उस कोने वाली मेज पर

वैसे ही बैठा खा रहा है खाना
चुपचाप एक लड़का
कुछ सोचता हुआ-सा, चिन्तित
शायद वह भी ढूँढ़ रहा है ट्यूशन
या कोई पार्ट टाईम जॉब
शायद करना है जुगाड़
अभी उसे कमरे के किराया का।

सोच-सोच कर कुम्हला रहा है उसका मन

कि कर भी पाएगा पढ़ाई पूरी
या धकेल देगा वापिस यह शहर
उन पथरीले पहाड़ों पर
जहाँ उगती है ढेर सारी मुसीबतें-ही-मुसीबतें
जहाँ दीमक लगे जर्जर पुलों को
ईश्वर के सहारे लाँघना पड़ता है हर रोज।

जहाँ जरा-सा बीमार होने का मतलब है

जिन्दगी के दरवाजे पर
मौत की दस्तक।

हैरान हूँ और खुश भी

दस वर्षों के बाद भी
नहीं भूला है गोपी
अपने ग्राहकों की शक्लें
पूछता रहा आत्मीयता से
घर-परिवार की सुख शान्ति।

इस बीच बहुत कुछ बदल गया

इस शहर में
बड़े-बड़े माल सेन्टरों ने
दाब लिया है
बड़े-बड़े लोगों का व्यापार
बड़ी-बड़ी अमीर कंपनियाँ
समा गई हैं बड़ी विदेशी
कंपनियों के पेट में।

नाम-निशान तक नहीं रहा

कई नामचीन लोगों का।

पुराने दोस्त इस तरह मिले

इतना भर दिया वक्त
जैसे पूछ रहा हो कोई अजनबी उनसे
अपने गंतव्य का पता।

निरन्तर विकसित हो रहे इस शहर में

उस गोपी ढाबे वाले की आत्मीयता ने
बचाए रखी मेरे सामने मेरी ही लाज।

सभी पुराने दोस्तों के बारे में भी

पूछता रहा बार-बार।

खास हिदायत देकर कहा उसने

रोटी बाँटने वाले लड़के को
बाबू जी खाना खाते हुए
पानी में नींबू लेते हैं जरूर।

मैं हैरान था और खुश भी

कि इस तरह की बातें तो
माँएँ ही रखती हैं याद
अपने बेटों के बारे में।

क्या इतना गहरे बैठे हुए थे

उसके अंतस में हम।

खाने के बाद गोपी ढाबे वाले ने

मुझसे पैसे नहीं लिये रोटी के
मेरे लाख अनुनय के बावजूद।

मैं इस तरह निकला वहाँ से

आँखें पोंछता हुआ
जैसे माँ की रसोई से निकला होऊँ
बरसों बाद खाना खा कर।

पहुँचना !

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे दिन भर
काम पे गयी
थकी माँ पहुँचती है
अपने नन्हे बच्चे के पास।

सबसे कीमती पल होते हैं
इस धरती के वे
उसी तरह के
किसी कीमती पल-सा
पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे बरसों बंजर पड़ी
धरती के पास पहुँचते हैं
हलवाहे के पाँव
बैलों के खुर
और पोटली में रखे बीज
धरती की खुशियों में उतरते हुए
मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।

मैं चाहता हूँ
बारिश के इस जल सा
धरती की नसों में चलते-चलते
पेड़ों की हरी पत्तियों तक पहुँचूँ
फलों की मुस्कुराहट में उतरूँ
उनकी मीठास बन
तुम्हारे ओंठों तक पहुँचना चाहता हूँ

अँधेरे घर में
ढिबरी में पड़े तेल सा
जलते हुए
तुम्हारे साथ-साथ
अँधेरे से उजाले तक का
सफर तय करना चाहता हूँ।

निराशा भरे इस समय में
मैं तुम्हारे पास
संतों के प्रवचनों-सा नहीं
विज्ञापनों में फैली
व्यापारियों की चिकनी भाषा-सा नहीं
मैं कविता की गोद में बैठी
किसी सरल आत्मीय पंक्ति-सा
पहुँचना चाहता हूँ।

मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।

आँखों में खुशी के आँसू छलकता
एक उम्मीद-सा
मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारी आँखों में।

दुखों भरी बर्फ !

दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
इन घासनियों में
उग आएगी नर्म हरी घास खूब
हम खुशी-खुशी घूमेंगे
इन घाटियों में अपने मवेशियों संग
मन पसंद गीत गुनगुनाते हुए।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
दोस्त बिना बुलाए ही
आ जाएँगे हमारे घर
अचानक आ मिली खुशी की तरह
आ बैठेंगे हमारी देहरी पर
गुनगुनी धूप-सा मुस्कराते हुए।
हवा में भीनी गंध
अपने पंखों पे लादे
आ बैठेगी बसंत की चिड़िया
हमारे आँगन में
चहल कदमी करता
दूर से देखेगा हमें
हमारा छोटा-सा शर्मिला सुख।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
हमारी जंग लगी दरातियों के चेहरों पर
आ जाएगी अनोखी उत्साह से भरी चमक
खेतों के चेहरे खिल उठेंगे
धूप हमारी आगवानी में
निखर-निखर जाएगी
हम मधुमक्खियों की तरह गुनगुनाते हुए
निकलेंगे अपने काम पर
नहीं फिसलेंगे
उस फिसलन भरी पगडंडी पर
किसी मवेशी के पाँव
नहीं मरेगी किसी की दुधारू गाय
नहीं बिकेगा कभी किसी का कोई खेत।
दुख भरी बर्फ का रंग
पहाड़ों पर गिरी इस मासूम बर्फ-सा
सफेद नहीं होता।
वह बादलों से नन्हें कणों के रूप में
नहीं झरती हमारे खेतों, घरों और देह पर
वह गिरती है कीच बनकर
धसकते पहाड़ों पर से
वह गिरती है शराब का रूप धर
पिता के जिस्म पर
माँ के कलेजे पर
हमारे भविष्य पर।
बदसलूकी की तरह गिरती है
जंगल में लकड़ियाँ लाने गई
बहिन की जिंदगी पर।
दुखों भरी बर्फ रोक देती है
स्कूल जाते बच्चों के रास्ते
उनके ककहरों के रंगों को
कर देती है धुंधला
छीन लेती है उनके भविष्य के चेहरों से
मासूम चमक
उनके हथेलियों को
बना देती है खुरदरा
भर देती है जख्मों से
उनके नन्हें कोमल पाँव।
दुखों भरी बर्फ पर
सूरज की तपिश का
नहीं होता कोई असर
अपने आप नहीं पिघलती।
वह पिघलती है
बुलंद हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज से।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।

- सुरेश सेन निशांत

इंद्रियाँ और दिमाग़ !

इंद्रियाँ तो कठपुतलियाँ हैं
सबसे ऊपर बैठे दिमाग़ की
उसी के इशारों पर नाचती हैं
इंद्रियों को तो पता भी नहीं होता
कि वो आखिर कर क्या रही हैं
आवश्यकता से अधिक सुख सुविधाएँ
जिन्हें वो गलत तरीके से इकट्ठा कर रही हैं
उन्हें या तो निकम्मा बना देंगी
या रोगी
और अगर पकड़ी गईं
तो सारी सजा मिलेगी इंद्रियों को
बलि की बकरियाँ हैं इंद्रियाँ।

इंद्रियाँ करें भी तो क्या करें

आदिकाल से
नियम ही ऐसे बनते आये हैं
जिससे सारी सजा इंद्रियों को ही मिले,
हर देवता, हर महात्मा ने
हमेशा यही कहा है
कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखो
दिमाग़ की तरफ़ तो
कभी भूल कर भी उँगली नहीं उठाई गई
कैसे उठाई जाती
उँगली भी तो आखिरकार
दिमाग़ के नियंत्रण में थी।

मगर कलियुग आने का

पुराने नियमों से विश्वास उठने का
एक फायदा तो हुआ है
अब यदा कदा कोई कोई
उँगली दिमाग़ की तरफ भी उठने लगी है,
ज्यादातर तो तोड़ दी जाती हैं
या जहर फैल जाएगा कहकर काट दी जाती हैं
मगर क्या करे दिमाग़
अनिश्चितता का सिद्धांत तो वो भी नहीं बदल सकता
कि उठने वाली हर उँगली तोड़ी नहीं जा सकती,
कोई न कोई उँगली बची रह ही जाएगी
तथा उस उँगली की सफलता को देखकर
उसके साथ और भी उँगलियाँ उठ खड़ी होंगी,
अन्ततः दिमाग को
उँगलियों की सम्मिलित शक्ति के सामने
सर झुकाना ही पड़ेगा
अपनी असीमित शक्ति का दुरुपयोग
रोकना ही पड़ेगा।

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह

सपना मकान का !

सपना मकान का
अपने मकान का
कैसे हो पूरा
खाली पेट
लंगोटी बांधे
सोच रहा है घूरा
सोच रहा है घूरा कैसे
कटेगी ये बरसात
पैताने बैठा है कुत्ता
नहीं छोडता साथ
घरवालों की होती इज़्ज़त
चाहे हों आवारा
बेघर और बेदर को समझे
चोर ज़माना सारा
खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन
काहे देखे घूरा सपना
काहे दांत निपोरे
कह दो उससे नंगा-बूचा
धोए क्या निचोडे......
सपना मकान का
देख रहा है घूरा!

- अनवर सुहैल

Saturday, September 10, 2011

नई उपमा !

उसकी आँखे
कि बारिश में
भीगी कोई लड़की
बार-बार
बदन को छूते कपड़े
छुड़ाए

उसकी बातें

कि माँ सामने बैठा कर
खाना खिलाए
और रोटी पलटना ही भूल जाए


उसका रूठना
कि मुँह फुलाए बच्चे के गाल पर
काटे चिकोटी,माथा चूमें और मुस्कुरा दे


उसका मनाना
कि कोई हो इतना मजबूर
कि न होंठ हँसे खुल के न आँखों में आँसू आए


उसका चलना
कि उफने कोई बरसाती नदी
और अचानक मुड़ जाए


उसका होना
कि होना हो सब कुछ का


उसका न होना

कि ........

कवि- मनीष वंदेमातरम्

दोस्ती का पैगाम !

दोस्त तुम यादों में हो, वादों में हो, संवादों में हो
गीतों में हो, ग़ज़लों में हो, ख़्वाबों में हो
चुप्पी में हो, खामोशी में हो, तन्हाई में हो
महफिल में हो, कहकहो में हो और बेवफाई में भी हो
तुम उन चिट्ठियों में हो जो तुम्हें दे न सका
तुम उस टीस में भी हो जो तुम देते रहे
और मैं उस मीठे दर्द को अल्फाजों में बदलता रहा
तुम उस खुशी में भी हो जो तुमने मुझे अनजाने में दी
...इतना कुछ होने के बाद तुम अगर मुझसे रूठ भी जाओ
तो अलग कैसे हो पावोगे?
नाराज होकर फेसबुक से अन्फ्रेंड कर दोगे
डायरी से फाड़ दोगे, ग्रीटिंग्स कार्ड जला दोगे
लेकिन मेरी यादें?
जानते हो...
यादें और चुप्पियाँ एक-दूसरे की डायरेक्टली प्रपोशनल होती हैं
चुप्पियाँ, यादों के समन्दर में डूबोती चली जाती हैं
कहते हैं... खामोशी और बोलती है... प्रतिध्वनि भी करती है
पगला देती है आदमी को
इसलिए शब्दों का और आँसुओं का बाहर निकलना बहुत जरूरी है
मैं बाहर निकल आया हूँ, तुम भी बाहर आ जाओ
अपने ईगो के खोल से
मैं भी सॉरी बोलता हूँ, तुम भी बोलो
...बोलो, तुम्हारा भी कद ऊँचा हो जाएगा
अब छोड़ो भी इन बातों को, गलती किसी की भी हो
पर हत्या तो दोस्ती की हुई न?
...और हमारी दोस्ती इतने कमजोर धागों से नहीं बँधी है
कि एवीं टूट जाय
न दोस्ती को एवीं टूटने देंगे... न जिन्दगी को
क्योंकि दोनों अनमोल हैं।

कवि- मनोज भावुक